प्रश्नोत्तर P6-0145 · भाग 6
हम कुछ नया बोल भी नहीं सकते, नया कर भी नहीं सकते। सारी चीजें बोली जा चुकी हैं। बस हम समझ सकते हैं। क्या यहां कुछ नया है? आत्मज्ञान, बंधन, परमात्मा के पास जाना, क्या यह हमारे लिए नया है? फिर वहां से लौटकर आना क्यों चाहते हैं?
अज्ञानी होना चाहते हो, यह भी नया नहीं है। हम तो थे ही। मुक्त होना चाहते हो, यह भी आपके लिए नया नहीं है। आप लिप्त हो रहे हो, यह भी आपके लिए नया नहीं है। यहां नया कुछ नहीं है। नया सिर्फ भ्रम है। यह नया है, यह भ्रम भी पुराना ही है। सब मामला पुराना ही है। रूप बदलते रहते हैं। उसे हम ट्रांसफॉर्मेशन कहते हैं। इधर से उधर शिफ्ट होता है, तो हमें लगता है नया हो गया। यहां नया कुछ नहीं है। हर चीज रिसाइकल हो रही है। या तो मुझे कबाड़ बनना है, या कुछ नया रूप लेना है। अगर बीज अच्छी जगह पड़ जाए, तो पौधा बन जाएगा। जो कुछ भी कर रहे हो, नया नहीं है। कुछ बोलो, तो भी कोई शब्द ऐसा नहीं है जो मैं बोल पाऊं और पहले ना बोला गया हो। कुछ भी नया नहीं। मेरे द्वारा ही क्या-क्या बोला गया होगा।
आप समझ पा रहे हो, इसका मतलब आपके अंदर समझने की क्षमता है। तभी तो समझ पा रहे हो। अगर क्षमता ही नहीं होती, तो समझ भी नहीं पाते। कहने का मतलब, यहां कुछ नया नहीं है। ना तो आपके लिए आत्मज्ञान नया है, ना फंसना नया है, ना बंधन नए हैं। आपके लिए नया कुछ नहीं है। आप कभी उधर से होते हो, इधर आते हो। आप इधर थे, तो उधर गए। तुम ही तो गए। यही तुम्हारा काम चल रहा है। जब ज्यादा बेचैन होते हैं, तो कहते हैं, यह वाला देख लें। जब यहां ज्यादा त्राहिमाम हो जाती है, तब सोचते हैं, चलो देख आते हैं। जब ज्यादा त्राहिमाम हो जाती है, तब सोचते हैं, पूरी जिंदगी मशकत लगाई, पूरी जिंदगी समर्पण कर दी, अब आखिर में चलो परमात्मा के पास चलते हैं। लेकिन आखिर कभी था ही नहीं। परमात्मा के पास कभी तो होगे, तभी तो आज जा रहे हो। तो आपके लिए नया थोड़ी है।
क्या पता, परमात्मा भेज देता हो, बेटा, काफी दिन हो गए पड़े-पड़े, जा, थोड़ा घूम आ। हम ही थक जाते हैं। आप कहीं भी, किसी जगह जाते हो, तो कहते हो क्या। शहर वाले गांव में जाते हैं, वाह, क्या पेड़ हैं, क्या पौधे हैं। दो दिन बाद कहते हैं, मम्मी, चल। फिर मम्मी पापा से कहती है, चल। तो पापा कहता है, कुछ दिन हम गांव में रुक जाते हैं। तो मम्मी कहती है, नहीं, चलो, अब घुटन हो रही है। पहले दिन गए, वाह, क्या कच्चा मकान है, दादी है, दादी के साथ रहेंगे, अब तो बड़ी सभ्य है। जरा तीन दिन किसी भी व्यक्ति के साथ रहो, जिसको तुम अच्छा कहते हो, चाहे वो जगह हो, चाहे वो कोई व्यक्ति हो। तीन दिन तो क्या, तीन घंटे में पता चल जाएगा।
जो हमें नया लगता है, वो हमारे लिए नया नहीं है। हमारे लिए यहां कुछ नया नहीं हो रहा है। आज हम परमात्मा की यात्रा करें, यह कोई नया नहीं है। हम उससे बिछड़े, यह कोई नया नहीं। बस इतना है कि हमें थकान हो जाती है। ज्यादा त्राहिमाम करते हैं, परेशान हो जाते हैं, तो शिफ्ट करते हैं। अब वहां रेस्ट करते हैं, तो फिर दोबारा आना क्यों चाहते हैं। यह तो अब वहां से पता चलेगा। बहुत सारी चीजें हम भूल गए। जब वहां जाएंगे, तब जाके पूरा क्लियर होगा कि हम आए क्यों। अभी तो यात्रा में हैं। अभी तो जहां जाना है, वहां भी भूल गए हैं। जिसके पास जाना है, उसको भी भूल गए हैं। कैसा है वो, रास्ते भी भूल गए हैं। जिसके पास जाना है, उसको भी भूल गए हैं। तो हमें यह याद कैसे रहेगा कि मैं क्यों कूद पड़ा था। वो तो बहुत पुरानी बात है। वो तो वहां जाके पता चलेगा कि हम यहां आए क्यों थे। इतना तो पता चल रहा है कि हमें यहां से जाना है। यहां मन नहीं लग रहा। यहां हम जाना चाहते हैं।
यहां इच्छा रहेगी। राग, द्वेष, मोह आ सकते हैं। एक दिन देखो। आज जिस परिचय को छोड़ना चाह रहे हैं, वही परिचय बनाने के लिए कितनी मेहनत की है। सोच रहे हैं, जिन लोगों की याद आ रही है, उन लोगों की याद ना आए। लेकिन उन यादों के लिए हमने कितना काम किया है। बड़ी मेहनत की है। जिनको आज मैं भुलाना चाहता हूं, उनके लिए मैंने काम भी तो किए हैं। बहुत ज्यादा। जब मिल जाती है, तब लगता है, यह क्या, गले में घंटी बांध ली। और गले की घंटी खुलती नहीं, वो बजती रहती है।
हमारे लिए कुछ नया नहीं है। इसीलिए तो मैं आपको कल ही कह रहा था, बहुत सरल है। बहुत ही सरल है, क्योंकि मैं उसमें कभी था। मैं बताता हूं कैसे। मैं यहां हूं। यहां से छुड़ा दो। बस, बात खत्म। लेकिन तुम यहां से बिना छुड़ाए अपने आप को आत्मज्ञान कराना चाहते हो। संभव नहीं है। आप जहां लिप्त हो, वहां से अपने आप को छुड़ा लो। बात खत्म हो जाएगी। तो सबसे सरल आत्मज्ञान है। लेकिन सरल कब है। जब आप छुड़ाना चाहते हो, तब सरल बन जाएगा। लेकिन आप उसमें रख के अपने आप को आत्मज्ञान चाहते हो, तो संभव नहीं है।
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