प्रश्नोत्तर P6-0147 · भाग 6
बिना गुरु के नाम जप सफल होगा कि नहीं? गुरु किया नहीं है, तो पहले यह समझना है कि गुरु आखिर है कौन। मैं गृहस्थ जीवन में हूँ। क्या स्त्री को गुरु दीक्षा और मंत्र की जरूरत है? गुरु किए बिना मंत्र कौन सा लूँ? कृष्ण को जगतगुरु मानती हूँ। क्या ऐसा भी है कि जब कुछ नहीं चाहिए, तभी गुरु मिलता है?
बिना गुरु का नाम जप सफल होगा कि नहीं, यह पूछने से पहले गुरु को समझना पड़ेगा कि गुरु आखिर है कौन। कौन है, जो मुझे मुक्त करा दे, वो गुरु है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु शब्द ज्ञान का प्रतीक है। कोई व्यक्ति विशेष नहीं है।
आप गृहस्थ जीवन में हो। गृहस्थ जीवन में स्त्री को गुरु दीक्षा लेने की जरूरत नहीं होती। राम के गुरु वशिष्ठ थे। सीता के गुरु बताओ, हैं ही नहीं। इसके बाद कृष्ण के गुरु थे, रुक्मिणी के गुरु नहीं हैं। सुदामा के गुरु वही थे, उनकी पत्नी के गुरु नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि गृहस्थ जीवन में हो तो स्त्री को गुरु करने की जरूरत नहीं। सीधी सी बात है।
अब बचा पुरुष। पुरुष धन कमा रहा है। अब तो स्त्रियाँ भी कमा रही हैं। अगर घर में आय आ रही है तो पूरी तरह ईमानदारी होनी चाहिए। अपने ऊपर और अपने परिवार पर खर्च करते हुए, उसमें से कुछ हिस्सा सत्कर्म में लगाना चाहिए। सत्कर्म मतलब जरूरतमंद की सेवा। जीवन में इतना अपना लिया तो मुक्ति से मोक्ष तक पहुँच जाओगे।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। रही मंत्र जाप की, तो जिन लोगों ने मंत्र लिया, जैसे वाल्मीकि, ध्रुव, ऐसे कई हुए, उन्हें मंत्र उस स्थिति में मिला जब उन्हें कुछ नहीं चाहिए था। अभी वो स्थिति नहीं आई। अभी तो आपको बहुत कुछ चाहिए। दायित्व है, कर्तव्य है, जिम्मेदारी है। तो ईमानदारी से सत्कर्म अपनाते हुए जीवन जियो, और सत्संग सुनते रहो। गुरु बनाना नहीं है। बनने और बनाने से मुक्त करा दे, वो गुरु है।
मीराबाई ने गुरु बनाया, लेकिन मीराबाई ने गृहस्थ जीवन छोड़ दिया। वे कृष्ण भगवान की भक्ति कर रही थीं, फिर संत रविदास को गुरु बनाया। मीराबाई को कुछ नहीं चाहिए था। जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तब गुरु मिल जाएगा। और ऐसा गुरु ज्ञान का प्रतीक है। सत्संग सुनते रहिए, ज्ञान लेते रहिए, आगे बढ़ते रहिए, ईमानदारी से कर्म कीजिए। स्त्री अगर गृहस्थ जीवन में है तो गुरु खोजने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।
यहाँ तक कि स्त्री को साष्टांग प्रणाम भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्त्री स्वयं शक्ति का स्वरूप है। स्त्री अपने बच्चों को अपने शरीर से पाल सकती है। पुरुष में यह क्षमता नहीं है। धरती को हम माता बोलते हैं। एक माता को दूसरी माता को साष्टांग नहीं करना चाहिए। प्रणाम करना है तो ऐसे करो, साष्टांग प्रणाम नहीं। पुरुष साष्टांग प्रणाम कर सकता है, स्त्री नहीं। गृहस्थ जीवन में स्त्री को गुरु की जरूरत नहीं। मूल है ईमानदारी और सत्कर्म।
अर्जुन के गुरु द्रोणाचार्य थे, लेकिन द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या सिखाई। आध्यात्मिक गुरु कौन हुए, सारथी कृष्ण। जब ज्ञान दिया, उस समय कृष्ण भगवान सारथी थे और ज्ञान दिया। दीक्षा थोड़े दी, माला थोड़े दी, नाम थोड़े दिया। ज्ञान दिया। गुरु वही है, जो बनने और बनाने से मुक्त करा दे। ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो। सत्कर्म करते रहो, सत्संग सुनते रहो, आगे बढ़ते रहो।
रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी हुए, माँ काली की भक्ति के बाद। शारदा माँ के गुरु कहाँ बने? आप लोग तो ऐसे ही तर जाओगे। बस घर में ईमानदारी बनी रहे और सत्कर्म करिए। ऐसे ही अपना उद्धार कर सकती हो। गुरु करने की जरूरत नहीं। कहीं जाकर नाम दान लेने की स्त्रियों को जरूरत नहीं। स्त्री स्वयं शक्ति का स्वरूप है। जन्म देने वाली, पालन करने वाली, और उसके शरीर में ऐसी ताकत दी गई है कि अपने बच्चों को शरीर से पाल सकती है। सत्संग सुनिए। गुरु मतलब बंधन। बंधन की आपको जरूरत नहीं।
आप कहती हो कि गुरु मंत्र देते हैं, उसका जप होता है, गुरु किए नहीं तो मंत्र कौन सा लें। मैं वही कह रहा हूँ। मंत्र की जरूरत आपको नहीं है। आपको ईमानदारी और सत्कर्म की जरूरत है। अगर कोई नाम जप से मुक्त होना चाहता है, तो वह मंत्र तब लेने लायक है जब उसे कुछ नहीं चाहिए। तब वैसा गुरु मिलेगा। अभी मिल जाए तो आप उस स्थिति में नहीं हो। फिर बनावटी गुरु मिल जाएँगे, और गलती आपकी होगी। इतिहास देखिए, मंत्र उस स्थिति में किसी को मिला है जब उसे कुछ नहीं चाहिए था। ध्रुव का नाम लिया, वाल्मीकि जी का नाम लिया।
जब कुछ नहीं चाहिए, तब मंत्र की जरूरत है। और स्त्री गृहस्थ जीवन में है तो उसे तो है ही नहीं। अगर गृहस्थ जीवन छोड़ रही हो, तब ऐसा गुरु मिलेगा। अभी तो ईमानदारी से करो, अपने आप को समझो, सत्संग सुनती रहो। ऐसे ही मंत्र की जरूरत ही नहीं। आप जबरदस्ती गुरु की तलाश में हो। समझ होनी चाहिए। इतिहास में जिन्हें सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, उनका उदाहरण दे दिया, उनकी पत्नियों का उदाहरण दे दिया। अभी भी गुरु की तलाश कर रही हो कि कोई मंत्र दे। ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो, सत्संग सुनो, अपने आप को समझो। सन्यासिनी होना है तो बात अलग है। जबरदस्ती गुरु क्यों खोज रही हो।
सीता ने गुरु नहीं बनाया, रुक्मिणी ने नहीं बनाया, माँ शारदा ने नहीं बनाया। अपने पति के साथ ईमानदारी और सत्कर्म से जीती रहीं, और वहीं से उनका उद्धार हो गया। आप कहती हो कि कृष्ण को जगतगुरु मानती हूँ। जिसको भी मानो, मूल ईमानदारी और सत्कर्म वही है। जगतगुरु सबकी आपको जरूरत नहीं। ले रही हो तो जबरदस्ती कर रही हो। या फिर उस स्थिति में हो जाओ कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, तब ऐसा गुरु मिल जाएगा।
गृहस्थ जीवन में हो तो ज्ञान की जरूरत है, पर इन मंत्र देने वाले गुरु की जरूरत नहीं। आज लोगों ने मंत्र देने का काम बना लिया है। गुरु मंत्र उस स्थिति में दिया जाता था जब उसे कुछ नहीं चाहिए था, जब वह सब छोड़ना चाह रहा था, मुक्त होना चाह रहा था। आपकी स्थिति वो है क्या? इसलिए अपने घर में रहकर ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो। मैंने उनका उदाहरण दिया जिन्होंने अपने पति के साथ रहकर गुरु नहीं बनाया।
समझ में न आए तो जाओ गुरु ढूँढो, हम नहीं रोकेंगे। मंत्र जपो, माला फेरो, अगर आदत में हो तो बात अलग है। जेब काट रहे हैं और गुरु बनाकर बैठे हैं। पहले जेब काटना बंद करो। गुरु के लायक हो क्या तुम? गुरु भी वैसा ही मिल जाएगा। मंत्र दे दिया और कहा, जेब काटो, तुम अस्सी रखना, दस बीस मुझे देना, हम तुम्हारे पाप धोएँगे। ऐसा गुरु भी वैसा ही है। गुरु मंत्र तब देता था जब शिष्य को कुछ नहीं चाहिए था। इतिहास में चले जाओ। तुम गए और कहा आज लो, कल वह कहीं और चला गया। समाज की ऐसी दुर्दशा हो गई है। जैसे मंदिर में पंजीरी बँटती है, वैसे गुरु मंत्र बाँट रहे हैं।
जब गुरु मंत्र देता था तो योग्यता देखता था, सामर्थ्य देखता था। क्या सच में तुम्हें कुछ नहीं चाहिए? पूरी तरह ईमानदारी और सत्कर्म के साथ जीवन जिओगे क्या? पूरी तरह जाँचता था, उसके बाद देता था। राजा जनक को अष्टावक्र ने दीक्षा थोड़े दी थी। सीधा ज्ञान करा दिया। कोई विधि विधान नहीं करवाई। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान, जो बनने और बनाने से मुक्त करा दे, वो गुरु है।
ईमानदारी और सत्कर्म से जियो, ऐसे ही अपने आप को तार लोगे। सत्संग सुनिए। जैसे भोजन रोज करती हो, वैसे सत्संग सुना करो। मंत्र जाप के लिए बहुत लोग भाग रहे हैं। पहले मंत्र जाप के लायक हो क्या? जेब काट रहे हो और मंत्र जाप कर रहे हो। तुम्हारा गुरु भी कैसा है, पता नहीं। मंत्र दे दिया क्योंकि वो गुरु नहीं है। गुरु होता तो तुम्हें सालों घुमाता, पहले पूरी तरह जाँचता, तब जाकर कोई मार्ग बताता। आज तुम गए नहीं कि लो मंत्र। पैसे वाले करोड़पति हों तो एकांत में दे देंगे, और सामान्य हों तो माइक पर बोल देता है, उठा लो जो उठाना है।
जिसका सालों से माला जप रहे हो, उसके दरवाजे पर जाओ। कहो, आज रात बितानी है, मैंने आपका मंत्र लिया है। कहेगा, मंत्र लिया है तो जाकर देख लो, आजमा लो। जिसका मंत्र ढो रहे हो, उसके दरवाजे पर जाकर पूछो, आप मुझे पहचान रहे हो क्या? पहली बात, तुम उन तक पहुँचोगे कि नहीं पहुँचोगे, यह भी पता नहीं। तुमने अपनी दुर्दशा करवा ली है। जब वही तुम्हें नहीं पहचान रहा और उससे मिलने नहीं दिया जा रहा, फिर आगे क्या होगा? इस बात को समझो।
इसलिए जीवन में मूल है ईमानदारी, और सत्कर्म करते हुए अपने आप को निकाल लो। राम का उदाहरण दे दिया, कृष्ण का उदाहरण दे दिया, रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दे दिया, और अभी भी लग रहा है कि नाम दान लेना है। दूसरे के माथे पर सिंदूर लगा देखकर अपना ललाट मत तोड़ो, कपाल मत पटको। अपनी स्थिति और परिस्थिति देखकर, सोच समझकर आगे बढ़ो। ऐसा नहीं कि लोग गुरु मंत्र लेंगे तो आप भी लोगी। आप उस लायक हो क्या? सच में आपको कुछ नहीं चाहिए, क्या इस स्थिति पर आ गई हो?
सच में अब पति और पत्नी का रिश्ता छोड़ना चाहती हो, बस अब वह खत्म हो गया, तब जाकर गुरु खोजो। फिर गुरु मिलेगा। कोई शब्द देगा और बोलेगा, जाओ, अपना कल्याण करो। क्या तुम इस स्थिति में हो? नहीं हो, तो जहाँ हो वहीं से अपना कल्याण कर लो, और पतन मत करो। लोगों ने मतलब ही बदल दिया। नाम, शोहरत और पैसे के लिए, मेरे लाखों शिष्य हैं। अभी तक तो माता पिता गुरु थे, शिक्षक गुरु थे। आध्यात्मिक गुरु आखिर में तब मिलेगा, जब सच में कुछ नहीं चाहिए।
जो भाव में आकर बैठे थे, उन्हें मैंने जानकर कह दिया। मुझे मालूम था वे पचा नहीं पाएँगे, अपना समय बर्बाद न करें। संकोच में न बैठें, इसलिए बोल दिया। वे नहीं सुन पाए। कामनाओं वाली बात होती तो शाम तक बैठते। घर से फोन भी आता तो कहतीं, अभी आ रही हूँ, आज पूरी तरह मिल गए हैं, माल पाने का रास्ता मिल गया। भगाने पर लोग नहीं जाते। कामना हो तो धक्के खाकर भी खड़े रहते हैं।
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वीडियो: बिना गुरु के नाम जप सफल होगा कि नहीं ? | गुरु के बिना नाम जप ! #livesatsangyogijika · 2025-03-10