प्रश्नोत्तर P6-0148 · भाग 6
कामनाओं के लिए गुरु के पास धक्के और गाली सहकर क्यों खड़े रहते हैं? गाली को गुरु का आशीर्वाद कह देते हैं, द्वार पर धक्का भी मिलता है। यह आत्मकल्याण के लिए है या माल के लिए? क्या हमने अपने आप को कुत्ते जैसा नहीं बना लिया?
हो सकता है उसमें से आप भी हो। ये कुत्ते होते हैं ना, इन्हें कितना भी डंडा मारो, आ जाते हैं। ऐसे ही कामनाओं वाले व्यक्ति की हालत है। बस पता चल जाए कि कामना पूरी होगी, जूते भी मारो तो खड़े रहेंगे। और पता चल जाए कि कामना पूरी नहीं होगी, तो हार भी पहना दो तो नहीं रुकेंगे। यह मैं अनुभव बता रहा हूँ, और आपको भी इसका अनुभव है। आज नहीं हो तो कुछ साल पहले हो सकते हो।
लोगों ने कह भी दिया कि कुत्ते की तरह वफादार होना। हमारी हालत कुत्ते की तरह हो गई है। मेरा कहना है, कभी कुत्ते की तरह मत होना। कुत्ता वफादार तो है, पर उसमें गड़बड़ी यह है कि अच्छा आदमी पाल ले तो बुरे को काटेगा, बुरा आदमी पाल ले तो अच्छे को काटेगा। उसे मतलब नहीं। यह गुण आपमें नहीं होना चाहिए, नहीं तो नाश और पतन हो जाएगा। आपको सिर्फ ईमानदारी देखनी है। बेईमान व्यक्ति का त्याग कर देना, चाहे वह आपका बाप ही क्यों न हो, जैसे प्रह्लाद ने किया, और प्रह्लाद का कल्याण हो गया।
आज हमारी स्थिति यह हो गई है कि हम कुत्ते हो गए हैं। धक्के मारे जा रहे हैं, गाली सुन रहे हैं, झगड़ा भी हो रहा है, फिर भी कामनाओं के लिए खड़े हैं। उतना घर वाला बोल दे तो बर्दाश्त नहीं करोगे। मेहमान आ जाए और उतना बोल दो तो बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। वहाँ जाकर धक्का खा रहे हो, गाली सुन रहे हो, धक्कामुक्की में खड़े हो, मात्र कामनाओं के लिए। सच में उसके लिए गए हो क्या, देख लो। अभी नहीं है तो कभी स्थिति हो सकती है। जाँच लो। हमने अपने आप को कुत्ता बना दिया। सबसे सर्वश्रेष्ठ कहते हैं कि देवता भी इस तन को पाने के लिए तरस रहे हैं, और हम देवताओं के पीछे भाग रहे हैं।
एक तरफ वही शास्त्र, वही गुरु कह रहा है कि देवता भी इस मानव तन के लिए तरसते हैं, और तुमसे देवता की पूजा करने को कह रहा है। तुम दोनों में हाँ कह रहे हो। प्रश्न खड़ा करो। जब देवता भी इस मानव तन को पाने के लिए तरसता है, तो मुझसे देवता की पूजा क्यों करवा रहे हो? यह प्रश्न तब खड़ा करोगे जब ईमानदार होगे, और तुम हो नहीं। सामने झूठ बोला जा रहा है और तुम हाथ जोड़े बैठे हो, क्योंकि तुम बेईमान हो। सोच रहे हो, कैसे भी कुछ मिल जाए।
कुत्ता तो कम से कम जीव है, उसका स्वभाव है। उसमें कर्ता का भाव नहीं। पैदा करके नहीं खा सकता, थाली देख रहा है कि कब देगा। वही हालत तुम्हारी है। तुम्हें सात्विक, राजसी, तामसी, परमात्मा से मिलने के लिए शरीर मिला था। तुम क्या कर रहे हो? हमने अपनी हालत कुत्ते जैसी बना ली है। हम भी ऐसे कभी थे। धीरे धीरे अपने आप को निकाला। तुम भी निकालो।
गाली सुनते हो और कहते हो, गुरु जी का आशीर्वाद। यह कौन सा आशीर्वाद है? गुरु को आशीर्वाद ही देना है तो गाली में देगा क्या? द्वार पर धक्का मिल रहा है, द्वार छोड़ो। किसके लिए खड़े हो, आत्मकल्याण के लिए या माल के लिए? आत्मकल्याण करने वाला गुरु गाली देगा क्या? जितने समाज को भटकाने वाले सिद्ध हैं, उन्होंने समाज को पूरी तरह भटका दिया। ये आत्मा को परमात्मा से नहीं मिलने दे रहे। जितने सिद्ध हैं, वो गिद्ध हैं। गिद्ध बहुत ऊपर उड़ता है, पर जब गिरता है तो सड़े गले मांस पर। जितने सिद्ध हैं, वो नाम, शोहरत और पैसे में चले जाते हैं, और समाज को बर्बाद कर देते हैं। जितने सिद्ध हुए, सबसे ज्यादा समाज को भटकाने वाले यही हैं। नाम और पैसे में उलझाए रखते हैं। आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है, और ये मिलने नहीं देते।
जैसे तुम्हारे छोटे बच्चे हों। उन्हें स्कूल न भेजकर खूब खिलौने दो, सोने के खिलौने दो। वे कहेंगे मम्मी पापा बहुत अच्छे हैं। कब तक? जब तक बच्चे हैं। थोड़ा बड़े होकर समाज में जाएँगे, लोग कहेंगे तू तो गँवार है। तब घर आकर वही मम्मी पापा गंदे लगेंगे। कहेंगे, तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे तो पता नहीं था, आपको पता था। जितने गुरु तुम्हारी कामनाएँ पूरी कर रहे हैं, जिस दिन समझ आ जाएगी, इनको गाली दोगे। इनसे घिन आएगी। जैसे बच्चों को माता पिता से घिन आती है कि तुमने जीवन बर्बाद कर दिया, तुम्हारा काम शिक्षा देना था, समझ थी, मुझे खिलौनों में फँसा दिया। जब बड़े हो गए, तब। वैसे ही जिस दिन तुम्हारी समझ जग जाएगी, कामना वाले गुरुओं से घिन आएगी। यह शरीर परमात्मा से मिलने के लिए मिला था, और तुमने जीवन वस्तुओं और वैभव के लिए बर्बाद कर दिया। अभी बहुत अच्छे लग रहे हैं, पैर धोकर पी रहे हो। समझ आने पर घिन आएगी।
जब तक समझ नहीं आएगी, जैसे उस बालक से कोई समझदार कहे, बेटा खिलौने छोड़, पढ़ाई कर, तो वह बोलेगा तुम गंदे हो, जाओ, मेरे माता पिता बहुत अच्छे हैं, खिलौना देते हैं। बड़ा होगा तो माता पिता से घिन आएगी, और उसी व्यक्ति को ढूँढेगा कि वह सही कह रहा था। कभी न कभी यह बात समझ में आएगी कि हम कुत्ता बन गए, और सिद्ध लोगों ने जिंदगी बर्बाद कर दी। अभी आ जाए तो ठीक है। कभी न कभी तो आनी ही है।
जब मैं साधना में था, लोग आकर साष्टांग प्रणाम कर देते थे। मैंने कहा यह मत करो, यह नहीं चलेगा। मुझे मालूम है तुम मुझे प्रणाम नहीं कर रहे, कामनाओं को कर रहे हो। मैं ज्यादा दिन तक तुम्हारी कामनाएँ पूरी नहीं कर सकता। बाद में वही होता था। साष्टांग करते थे, फिर उँगली उठाकर खड़े हो जाते थे। उँगली उठाना मुझे पहले ही पता था। अभी भी लोग आते हैं। जो ज्ञान को प्रणाम करते हैं, उन्हें मैं जानता हूँ। मुझे तो कोई जानता ही नहीं। तुम ज्ञान को प्रणाम कर रहे हो। तब वे कामनाओं को प्रणाम कर रहे थे, अब तुम इस ज्ञान को प्रणाम कर रहे हो। यह शरीर निमित्त है। मैं इस भ्रम में कभी नहीं फँसा कि मुझे कोई प्रणाम कर रहा है। मुझे कोई जानता ही नहीं, प्रणाम क्या करेगा।
वह मुझसे मिलने आया ही नहीं। नगामा गाँव है, नर्मदा तट पर, अंदर कमरे में मैं था। बच्चों से बोल दिया था, कोई आए तो दरवाजा मत खोलना, उस समय हम अपने आप में रहेंगे। कुछ समय बाद बाहर निकला तो बच्चों ने बताया, महाराज जी आपसे दो लोग मिलने आए थे। क्या बोल रहे थे? बोले, आपके दर्शन करने आए थे। मैंने कहा, अभी तो ऐसा कोई आदमी पैदा नहीं हुआ जो मेरे लिए आया हो। कुछ काम की बात की? बोले, नहीं, बस दर्शन करने आए थे। मैंने कहा, मेरे दर्शन करने ये कहाँ से आ गए। जब से जन्म हुआ, जहाँ तक मैंने समझा, मेरे लिए आज तक कोई नहीं आया। ये दो लोग कहाँ से आ गए। मैं उन्हें ढूँढता हुआ उस जगह पहुँचा। उस गाँव में मेरा परिचय भी था। हनुमान मंदिर और शिव मंदिर है। वहाँ पता किया, दोनों को खोज लिया। बोला, आप मुझसे मिलने आए थे। बोले, हाँ। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझने लगा। अगर कोई मिलने आया है तो साधारण नहीं होगा। या परमात्मा होगा, या परमात्मा से पूरी तरह मिला हुआ होगा। दोनों को देख रहा था। चाय आई। मैंने पूछा, कुछ काम था? बोले, हाँ, एक काम था। बस मेरा भ्रम टूट गया। नहीं तो इस भ्रम को लेकर मैं ढोता रहता। उनके काम की बात की, मार्ग बताया। मैंने कहा, चलो मेरा भ्रम टूटा। मुझे पहले से मालूम है, अगर मेरे पास कोई आता है तो मेरे लिए नहीं आया। उस योग्यता की वजह से आया है। वह मुझे जानता ही नहीं।
मैं चुप हो जाऊँ तो लोग मुझे खड़ा भी नहीं करेंगे। किसी गाँव में आजमाने के लिए गया भी हूँ। चुपचाप हूँ तो कोई मेरी तरफ ठीक से देखता नहीं, उलटी सीधी बात करता है। जब तक मैं बोलूँ नहीं। यहीं चिचली के बगल में, तीन किलोमीटर पर टाकाल गाँव है। वहाँ से आता जाता था। राम मंदिर है। फटे पुराने कपड़े पहनता, इधर उधर घूमता रहता। कोई सत्संग सुनने वाला मिल जाए तो खड़े होकर सुनाता। एक दिन एक लड़के ने रोक दिया। बोला, मैं देख रहा हूँ तुम यहाँ से आते जाते हो, तुम कौन हो। मैंने कहा, क्या बताऊँ मैं कौन हूँ। बताऊँगा तो तुम ऐसे बैठोगे नहीं। वह बोला, तुम बताओ कौन हो। जब मैंने बताया तो भीड़ लग गई, क्योंकि आवाज दूर तक पहुँचती है। उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी, हाथ जोड़कर रोने लगा। उसने पूछा, तुम किस धर्म से हो। मैंने कहा, तुम्हें धर्म के बारे में मालूम है क्या, धर्म क्या होता है। मैंने उसे धर्म की परिभाषा बताई। वह रोने लगा। भीड़ लग गई। फिर उसी गाँव में अपने घर ले गया।
मुझे मालूम है, मुझे कोई नहीं जानता, मुझे कोई प्रणाम नहीं करता, मुझे कोई गाली नहीं देता। मेरे कर्म को देता है। और मैं कर्म नहीं हूँ। चाहे कोई बड़ाई करे, चाहे निंदा करे, चाहे गाली कह दे, मुझे एक प्रतिशत भी फर्क नहीं पड़ता। मुझे पता है यह मुझे नहीं दे रहा, कर्म को दे रहा है, और मैं कर्म नहीं हूँ। मैं तो मैं हूँ। यह बात पूरी तरह समझ में आ गई। कोई कुछ कहता है तो पता है मुझे नहीं कह रहा, क्योंकि वह मुझे जानता ही नहीं। इस शरीर के द्वारा कर्म हो रहा है, कभी अपनी जरूरत में, कभी सामने वाले की जरूरत में। उसकी वजह से वह बोल रहा है। मैं कर्म में हूँ नहीं। हर तरीके से आप मुझे नहीं जानते। कोई कुछ भी कहे, फर्क नहीं पड़ता।
जब तक इस शरीर में हूँ, इस दुनिया में जीने के दो ही रास्ते हैं। एक बेईमानी और दुष्कर्म, एक ईमानदारी और सत्कर्म। मैंने कहा, यह रास्ता ठीक लग रहा है। इससे लोग भी खुश, मैं भी खुश। जब तक शरीर में रहो, यह करते हुए आगे जहाँ जाना होगा जाएँगे। मेरी खोज कुछ नहीं है। मैं पीछे भी नहीं जा सकता, आगे भी नहीं जा सकता। जब तक शरीर में हूँ, बस मुझे यह ठीक लगा।
सबसे जरूरी मैंने यह देखा कि इस जीवन में समाज को अभी ज्ञान चाहिए। उस ज्ञान के लिए मैंने अपने आप को मिटाया। पता चला, ज्ञान के लिए अस्तित्व को मिटाना पड़ेगा। मिटा दिया। पहले धन की सेवा करता था। कमाकर, तनख्वाह पाकर, कर्ज लेकर भी लोगों की धन सेवा भरता रहता था। फिर बोला, यह वह नहीं है। यह तो ऊपर ही ऊपर की चर्चा है। करते करते सोलह सत्रह वर्ष में ये बातें पूरी तरह समझ में आ गईं। साधना में था। फिर लगा, इससे आगे कुछ है। तब समझ में आया कि सबसे जरूरी ज्ञान सेवा है, और ज्ञान सेवा के लिए अपने आप को खत्म करना पड़ता है। फिर मैंने वह किया। इस समय पूरी दुनिया में सबसे जरूरी सत्संग है। धन सेवा और तन सेवा करने वाले बहुत हैं। ज्ञान सेवा करने वाले संख्या में बहुत कम हैं, इक्के दुक्के।
मैंने देखा, सबसे जरूरी यह है। कुछ मिले या न मिले, अपने को कुछ नहीं चाहिए। इस समय न मेरे द्वारा सत्कर्म हो रहा है, न दुष्कर्म, न पाप, न पुण्य। बस हो रहा है, और मुझे लग रहा है यह ठीक है। परिणाम से भी कोई मतलब नहीं। बचपन में अगर कुछ माँगता था तो नरक, क्योंकि स्वर्ग में सब सुखी रहेंगे। मैं सुखी लोगों के साथ नहीं रहना चाहता। मैं हमेशा दुखियों के साथ रहता हूँ, और उनके दुख निकालने का प्रयास करता हूँ। बचपन से दुखियों को, कमजोर को पसंद किया। उनके साथ जिया, उन्हें बढ़ाने का प्रयास किया। बचपन में भी माँग होती तो यही, कि मरूँ तो नरक देना। स्वर्ग में सब सुखी रहेंगे, वहाँ जाकर क्या करूँगा। नरक में कुछ काम मिलेगा। मैंने इस दुनिया में दुख को चुना। सब सुख की तरफ भाग रहे हैं। मैंने दुख को पूरी तरह चुना।
साधना में मैं दुख पैदा करता था। ठंड में रात को ऐसी स्थिति पर ले आता कि कहीं से कुछ मिले नहीं, और फिर ढूँढता भी मैं ही था। दोनों मैं था। अपने आप को फँसाने वाला भी मैं, निकालने वाला भी मैं। इतना फँसा लेता कि तुम निकाल नहीं पाओगे, सुबह तक इंतजार करोगे, और वही होता था। मैं चाहता तो व्यवस्था कर लेता, पर नहीं। व्यवस्था तब कर दी जाती जब व्यवस्था मिल नहीं सकती। जहाँ व्यवस्था थी, उस जगह को छोड़कर आ जाता। ऐसा कर लेता कि दोबारा तू जा नहीं पाएगा। बिस्तर तब ढूँढूँ जब बिस्तर न मिले, बारह एक बजे के बाद। चाहता तो शाम को व्यवस्था कर लेता।
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