प्रश्नोत्तर P6-0149 · भाग 6
कुछ नहीं चाहिए, तो कुछ नहीं चाहिए में कैसे जिएँ? हम किसमें उलझे हैं? बचपन से लगता है सब मैं कर रही हूँ, पर अब सत्संग सुनकर लग रहा है कि इंद्रियाँ निमित्त हैं और करने वाला मैं हूँ। इस गड़बड़ी से कैसे निकलें?
अगर आपको कुछ नहीं चाहिए, तो कुछ नहीं चाहिए में जियो। समझना बस इतना है कि है क्या, किसमें हम उलझे हुए हैं।
आप कहती हो कि बचपन से अभी तक मैं ही थी। समझकर बुरा काम कर रही थी। लिखा हुआ था कि मैं हूँ, यह पता नहीं था। इंद्रियों द्वारा मैंने कर दिया। अब सत्संग सुनते समझते यह आ रहा है कि इंद्रियाँ निमित्त हैं, मैं कर रही हूँ। उस समय यह पता नहीं था। अब समझ में आ रहा है कि इंद्रियाँ निमित्त हैं।
आप भी संसार के लिए निमित्त हो, पर आपने अपने आप को कर्ता मान लिया। गड़बड़ी यह हो गई कि करने वाला मान लिया।
तबीयत की बात भी यही है। तबीयत तब खराब होती जब जीने की इच्छा हो। जीने की इच्छा नहीं तो तबीयत क्यों खराब हो। जब तबीयत खराब होती, उसमें देखता था। पैर सड़ रहे थे, उसको भी देखता था। यहाँ नौ महीने के ऊपर हो गया, मैंने सत्संग कभी बंद नहीं किया। काँपता भी रहूँ तो हो। हो तो हो, क्या फर्क पड़ता है। मैं तब तक काम करता हूँ जब तक यह शरीर अपने आप न गिर जाए। गिर जाएगा, देख लेंगे। मेरे मुँह से आज तक नहीं निकला कि मैं बीमार हूँ। पहले काम। बीमार है तो देख लेंगे। पहले काम तो करो। मैंने अपने आप को पहले काम में रखा, बाद में कुछ और। सर्वप्रथम अपने जीवन में हमने अपने काम को महत्व दिया।
क्रोध की बात लो। क्रोध का पहले भी मैं था, बाद में भी मैं था, क्रोध में भी मैं था। पर वह क्षण क्यों आया? उस क्रोध में वासना थी। वासना की वजह से क्रोध था। क्रोध नहीं था। आपको अपने तरीके से चाहिए था, नहीं हुआ, तो क्रोध आया और चला गया। आप कहाँ थे? वासना में। आप क्रोध में नहीं थे, वासना में थे। वासना की वजह से क्रोध आया, अपना काम करके चला गया। मान की वजह से, उम्मीद की वजह से। उम्मीद और इच्छा छोड़ने से यह खत्म होता है।
कैसे भी अपने आप को निकाल लो। आपके पास समझ है। बहुत समझकर निकालना पड़ेगा। बहुत चिंतन करना पड़ेगा। बहुत समझदारी से निकालना पड़ेगा। ऊपरी ऊपरी मत चलो। गहराई में चिंतन करो। कुछ खा रहे हो तो अपने आप से पूछो, क्या सच में मेरे शरीर को इसकी जरूरत है, या ऐसे ही खा रहा हूँ। अगर ऐसे ही खा रहे हो तो रख दो।
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