प्रवचन PV01-0002 · भाग 1
समय पर काम, बेईमानी का फल और सेवा की जिम्मेदारी
9 अक्टूबर 2026 · 16 रात अपनों की कुटिया हरियाणा यमुना तट #योगी
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
मुख्य बातें
- किसी का काम लिया है और उसका मूल्य लिया है तो समय पर कर दो, नहीं तो कोई आपको बचा नहीं पाएगा।
- इस दुनिया में कोई किसी को बचा नहीं सकता — अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ेगा।
- जिस धर्म का भेष धारण किया है, उस भेष का कार्य नहीं कर रहे हो तो दुर्गति होगी।
- ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन; रहो तो सधो नहीं तो भगो — इसमें जीना पड़ेगा।
- सेवा जिम्मेदारी की होती है — काम को परिणाम तक ले जाना है।
- ईमानदार, सत्कर्मी व्यक्ति के साथ बेईमानी की तो पता नहीं कितने जन्मों तक भोगना पड़ेगा।
पैसा लेकर भी समय पर काम नहीं
मैं यह देख रहा हूं कि पैसा लेने के बाद भी लोग समय पर काम नहीं करते। अब वाईफाई वाले का यही हाल है — उसने समय दिया, उस समय पर आया ही नहीं; सुबह आऊंगा, शाम आऊंगा, इंजीनियर नहीं आया। लोगों के रोम-रोम में बेईमानी छिपी हुई है।
तो मैं कह रहा हूं, कोई भी व्यक्ति हो — चाहे मैं रहूं, चाहे आप रहो — अगर आपने किसी का काम लिया है और जितना समय दिया है उसका मूल्य लिया है, तो समय पर कर दो, नहीं तो कोई आपको बचा नहीं पाएगा। अभी ऐसा लगता है जवानी है, आवेश है, जज्बात है; लेकिन जब उसका परिणाम भोगोगे तब पता चलेगा।
मेरे साथ काम में जैसी भी घटना घटती है, कुछ घटनाएं मैं आप लोगों से इसलिए शेयर करता हूं कि आप लोग किसी के साथ ऐसा न करो। अगर आप किसी की अंतरात्मा दुखा रहे हो, उसने ऐसा कुछ किया नहीं और आप उसे दुख दे रहे हो, तो मुझे नहीं लगता कि इस पृथ्वी पर कोई आपको बचा पाएगा। किसी की बददुआ मत लो।
भेष है तो उसमें जियो भी
आप जिस धर्म का, जिस संप्रदाय का अपने आप को बता रहे हो, क्या उस धर्म के नियम मालूम हैं? बस बाहर से आवरण को मजबूत कर लेना — लेकिन क्या उस आवरण में जी भी रहे हो? अगर नहीं जी रहे हो तो एक तरह से तुम अपराधी हो। जैसा आपने वस्त्र पहना है, जैसा भेष धारण किया है, उस भेष का समाज में कोई कार्य है। अगर आप उस भेष का कार्य नहीं कर रहे हो तो समझ लो कि आपकी दुर्गति होने वाली है।
कोई किसी को बचा नहीं सकता
इस दुनिया में कोई किसी को बचा नहीं सकता। यही सबसे बड़ा भ्रम है कि कोई मुझे बचा ले। आपको अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ेगा। बहुत लोग सज्जन बनते हैं और कहते हैं — मैंने कुछ किया ही नहीं, फिर भी भोग रहा हूं। किए हो तभी भोग रहे हो। इसलिए करने से पहले सोचो।
जितने भी साधक-जिज्ञासु मुझे सुनते हैं, मैं हर घटना इसलिए बताता हूं कि आपको प्रेरणा मिले, कुछ सीखने को मिले, और आप ऐसा बर्ताव किसी के साथ न करें। भोगना ही पड़ेगा — बिना भोगे कल्याण नहीं, बिना भोगे मुक्ति नहीं। आप ऐसा न सोचो कि माइनस-प्लस होता है; वहां की गणित अलग है, अपनी गणित से वहां का लेखा-जोखा न करो। इसलिए सोच-समझ के आगे बढ़ो, अपना कल्याण करो।
अपनों की कुटिया — नियम ही मालिक है
अगर आप जिज्ञासु हैं, सत्य के खोजी हैं, तो आश्रम आपका ही है, अपनों की कुटिया आपकी ही है। अगर आप पूरे नियम में जी रहे हैं तो वहां का मालिक नियम है — नियम ही मालिक है, और नियम में रहने वाला मालिक है। तो निसंकोच, किसी से पूछने की जरूरत नहीं।
महाराष्ट्र से फोन आया कि मुझे मराठी आती है, हिंदी उतनी क्लियर नहीं, तो मैं कैसे रहूंगा? हमने कहा — वहां भाषा की जरूरत नहीं है। बनाओ और खाओ; बनाने और खाने में कोई भाषा नहीं लगती। साधना में भाषा की जरूरत नहीं है। आप आत्मिक चिंतन करो, जाके आराम से रहो।
यह कोई साधारण वाक्य नहीं
पहले चैनल का नाम मुझे मिला — आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान — यह प्राकृतिक मिला है। “बेमतलब से आना नहीं, मतलब है तो आना नहीं; रहो तो सधो नहीं तो भगो; ईमानदारी मुक्ति है, बेईमानी बंधन” — इसमें प्रत्यक्ष ज्ञान का सार छिपा हुआ है। यह बेस है, यह आधार है। इसे कोई साधारण वाक्य, साधारण शब्द न समझे — इसमें जीना पड़ेगा।
दर्शन से कुछ नहीं होगा
लोग फोन करते हैं — क्या हम आपके दर्शन के लिए आ सकते हैं? दर्शन देने और लेने से कुछ नहीं होगा। जिसका दर्शन करना चाहते हो, जरूर उससे लाभ हुआ होगा; तो आपने उसके लिए क्या किया? उसके कार्य में आपने क्या सहयोग दिया? एक तो वह काम कर रहा है, अब आपको दर्शन देने के लिए उसका समय बर्बाद करो, उसकी ऊर्जा खराब करो। इसलिए कृपया दर्शन करने न आएं — इस दर्शन से मैं बड़ा दूर हूं। काम की बात करो: क्यों आना चाहते हो? साधना करना चाहते हो, तो ठीक है भाई, आओ साधना करो।
अगर आप सिर्फ अपने मतलब से जीते हो तो मतलब में जियोगे, मतलब में मरोगे और मतलब में जन्म हो जाएगा। इसलिए बेमतलब में आओ। आप लेना तो बहुत कुछ चाहते हो, देने के लिए क्या है? कोई कुछ लाया है तो जरूर उसके लिए उसने मेहनत की, ऊर्जा लगाई — ऐसे तो मिल नहीं जाएगा।
काम को परिणाम तक लाना
सत्संग में तो मैं इस तरीके से बात करता हूं, आपके प्रश्नों के जवाब देता हूं; लेकिन यहां काम करने में लड़ाई, झगड़ा, सब करना पड़ता है। 2024 से पहले मुझे नहीं पता था कि काम करूंगा तो इतना कुछ करना पड़ेगा। आज काम को परिणाम तक लाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है, कल्पना भी नहीं की जा सकती। लोग आकर प्रणाम करते हैं — हम तो सेवा करेंगे, हमें कुछ नहीं चाहिए — और उनका रोम-रोम बेईमान है; वो बेईमानी भी बड़ी ईमानदारी से बोल के करते हैं। समाज में काम करना एक आत्मज्ञानी के लिए बहुत तकलीफ का काम है।
सेवा जिम्मेदारी की होती है
आप किसी को किसी से मिला रहे हो तो जिम्मेदारी फिर आपकी होनी चाहिए। पहले दोनों को पक्का आप करो — सही आदमी को गलत आदमी से न मिलाओ। अगर आप सेवा करते हो तो सेवा समझ के करो। सेवा जिम्मेदारी की होती है, जवाबदारी की होती है; ऐसे ही सेवा का नाम नहीं दे देना। सेवा में बड़ी जिम्मेदारी होती है कि काम को परिणाम तक ले जाना है।
सेवा सही तरीके से हुई तो उसका लाभ भी मिलेगा, और सही तरीके से नहीं हुई तो हानि भी मिलेगी — दोनों मिलेगा। काम न करने वाले को भी भोगना पड़ेगा और लाने वाले को भी, क्योंकि वह भी तकलीफ में सहायक है। चाहे मैं रहूं, चाहे आप रहो — सब सामने आना ही आना है। कोई किसी को बचा नहीं सकता।
करने से पहले सोचो
जैसा करोगे वैसा परिणाम आएगा — आज नहीं तो कल। इसलिए करने से पहले सोच लो कि मैं क्या कर रहा हूं, क्या उसके परिणाम को मैं बर्दाश्त कर पाऊंगा? क्योंकि परिणाम देना हमेशा प्रकृति का काम है, और वो कई गुना देती है। एक बीज बोते हो तो कितने गुना बीज देता है; बीज तो गिना जा सकता है, एक फल में कितने गुना — गिन नहीं सकते।
एक बेईमान आदमी के साथ अगर आप बेईमानी करते हो तो कुछ गुना फल मिलके खत्म हो जाएगा। लेकिन जब आप किसी ईमानदार, सत्कर्मी व्यक्ति के साथ बेईमानी करते हो, तो पता नहीं उसका हिसाब-किताब आपको कितने जन्मों-जन्मों तक भोगना पड़ेगा — कल्पना भी नहीं कर सकते। मानव तन मिला है, समझ है, विवेक है, बुद्धि है, सही-गलत का पता है, अच्छे-बुरे का पता है — तो सोच-समझ के जीवन जियो।