प्रश्नोत्तर P1-0164 · भाग 1
जरूरत में रहते हुए भी — मान लीजिए मुझे फॉर्च्यूनर, किसी स्थान या पद की जरूरत है — उसमें रहते हुए अहम भाव को कैसे अलग रखें, कि मैं उससे जुड़ा नहीं हूं, और यह अहंकार न आए कि मैंने इतना इकट्ठा कर लिया तो समाज में मेरा रुतबा बढ़ गया? उन सुविधाओं से अपने आप को डिटैच कैसे रखें?
आपने अपनी जरूरत के अनुसार जिया और ताकत एकत्रित की — चाहे शरीर की हो, समझ की हो, या वैभव की। तो यह समझना है कि मेरे पास इतनी शरीर की ताकत, समझ का बल था कि जितना मैंने सोचा था उससे ज्यादा मैंने अपनी क्षमता के अनुसार एकत्रित कर लिया। तो मुझे क्या करना चाहिए? अपनी जरूरत की पूर्ति करते हुए, जितनी मेरी ताकत है, उसे सत्कर्म में लगा देना चाहिए। तब अहम भाव खड़ा नहीं होगा।
अगर आपने सत्कर्म में नहीं लगाया, तो उस ताकत से आपका अहम भाव खड़ा होगा, क्योंकि वह खर्च नहीं होगी। तो अपनी ताकत को खर्च करो — अपनी जरूरत, और फिर सत्कर्म, जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। जब जरूरतमंद की सेवा करोगे तो आपका आत्मिक स्तर बढ़ेगा, समझ विकसित होगी, लोगों का आशीर्वाद मिलेगा। अपनी ताकत का सदुपयोग करो, सत्कर्म करो, तो आपका अहम भाव खड़ा ही नहीं होगा।
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वीडियो: देखना है मुझे क्या चाहिए ? #योगी · 2026-10-12