आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P17-0041 · भाग 17

गुरु जी, अंतःकरण — जिसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कहते हैं — ये किस तरीके से काम करते हैं? और "मन को मार गगन चढ़ जाई, मानसरोवर पैठ नहाई" — तो क्या मन को मारना पड़ता है?

बस बाहर से — मान लीजिए आप दूर बैठे हो, कोई आपको खटाई दिखाए; आपने उसका स्वाद पहले लिया है, तो आपकी लार खट्टी बनेगी; मिठाई दिखाए तो वैसी। आपके अंदर था, लेकिन बाहर का देखकर जागृत हुआ; अंदर विद्यमान नहीं रहेगा तो जागृत नहीं होगा। मन को नहीं मारना पड़ता — मन जिससे चलता है उसको मारना पड़ता है। जड़ में जाइए — मन किससे चलता है? वो आपसे चलता है। जीव को मिटाना है, बाकी सब मर जाएंगे। ये रहस्यमय ज्ञान है, रहस्य में बोला गया — मन के द्वारा ही अपने आप को मार सकते हो, बिना मन के तो मार भी नहीं सकते। अगर सीधा लिख देते "अपने आप को मारो", तो आप उल्टा-सीधा काम कर लेते, अपने आप को सीधा मारने चल देते; आप इसका दुरुपयोग ना कर पाओ, इसलिए घुमाकर बोला "मन को मार"। लेकिन मन चलता कहां से है, यह देखना है — मन है भी और नहीं भी; जो है भी और नहीं भी, उसे क्या मारोगे? जीव से मन चल रहा है। जिसे "चाहिए" है, उसे मारना है।

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वीडियो: आत्मज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी में क्या भेद है | मन क्या है / #आत्मज्ञानी #ब्रह्मज्ञानी #aadhyatmik · 2024-09-04