प्रश्नोत्तर P18-0121 · भाग 18
गुरु जी, जब आत्मा इच्छा-अपेक्षा में जीव बनी और उसे पता है कि मूल तक पहुंचना है, तो फिर भी वह अपने आप को बचाकर क्यों रखना चाहती है — अपना नाश क्यों नहीं करना चाहती?
क्योंकि यह (बनाया हुआ) अस्तित्व प्रत्यक्ष है, और आत्मा का अस्तित्व अप्रत्यक्ष हो गया है। सत्य अप्रत्यक्ष हो गया है, सच-झूठ प्रत्यक्ष है। अगर वह प्रत्यक्ष हो जाए तो वह तुरंत उसे पकड़कर इसे छोड़ देगा, लेकिन उसे डर है — मिटने के बाद मैं न रहा तो क्या होगा। यह पकड़े हो तो वह गया; यह छोड़ोगे तो वह आएगा। जिस अस्तित्व को इतनी मेहनत से बनाया, उसे मिटा नहीं पा रहा, क्योंकि मूल अस्तित्व की उसे सिर्फ जानकारी है, पता नहीं — मूल उसके लिए एक भ्रम बन गया है, हो भी सकता है नहीं भी। जैसे कोई कहे एक लाख दे दो, एक करोड़ लौटा दूंगा — हाथ में अभी एक है, वह देगा या नहीं, पता थोड़ी है। जब समर्पण हो जाएगा, तब होगा — इतनी आसानी से यह नहीं मिटता।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: जब मैं छोटे दायरे को तोड़ा ? / #योगीजी_का_सत्संग · 2024-12-22