नहीं। क्या महापुरुषों ने कर्म नहीं किए — कृष्ण भगवान ने, राम ने कर्म नहीं किया? कर्ता के भाव से मुक्त होना है, अपने तरीके से करवाना है — उस तरीके का त्याग। कर्म तो जब तक रहना है तब तक करना पड़ेगा — ये कर्म भूमि है, बिना किए रह नहीं सकते; या तो अपने लिए, या दूसरों के लिए, कामनाओं-इच्छाओं में या दूसरों के लिए, करना तो पड़ेगा। महापुरुष जितने भी परमानंद को उपलब्ध हुए, भूख लगती थी तभी रोटी खाते थे, और ज्यादा खिलाओ तो कहते थे बस, अब नहीं — उनकी भूख शांत हो गई। तो करने से नहीं, कर्ता भाव से छूट जाओ — "मैं करता हूं" — जो करने का अहंकार धारण किया है, उस भाव से छूट जाओ।
जब हम अपने शरीर की जरूरतों के लिए काम करते हैं तो वो भौतिक है, और जब मैं अपने लिए काम करता हूं तो वो आध्यात्मिक है — मुक्ति-मोक्ष, दुखों से छुटकारा; राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से मुक्त होना; छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता से मुक्त होना। ये संसाधन तो शरीर तक हैं, लेकिन मेरा क्या — मैं कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा — जब इन प्रश्नों का जवाब खोजने के लिए मैं निकलता हूं, तो ये आध्यात्म है।
अगर आप बंधन में भी गए हो तो कोई मिला — अकेले बंधन भी नहीं बांध सकते। बेईमानी भी आप तभी कर पाओगे जब आपके अपोजिट में कोई खड़ा हो, जब वो निमित्त बने। तो बंधन से छुड़ाने के लिए भी कोई चाहिए — वो गुरु है, ज्ञान का प्रतीक; एक बंधन में ले गया, एक बंधन से निकालने के लिए काम करेगा। आप बंधन में फंसे हो तो उसमें हजारों लोग लगे; अब आपके पास बल नहीं कि अकेले आ जाओ, तो ऐसा बलशाली व्यक्ति चाहिए जिसमें उन सारों का बल हो, तब वो आपको निकाल पाए। आपने बेईमानी कर ली तो ईमानदारी के लिए भी कोई निमित्त चाहिए — मुक्ति के लिए गुरु चाहिए, जो आपको मुक्ति का रास्ता बताए। किसी के द्वारा गए हो तो किसी के द्वारा ही आओगे ना।
आप कोई मंत्र करते हो तो उससे ऊर्जा मिलती है। अगर आप ईमानदारी से, सत्कर्म के साथ जीवन जी रहे हो, तो मंत्रों द्वारा मिली ऊर्जा आपकी सहायक होगी — चाहे मूर्ति पूजा हो, चाहे मंत्र जाप। लेकिन कब? जब आप ईमानदारी और सत्कर्म में लगे रहोगे तब। और अगर मंत्र जाप किया और बेईमानी कर रहे हो, तो मंत्रों से मिली ऊर्जा से आप और तेजी से बेईमानी करोगे, और फंस जाओगे। मुक्ति का रास्ता — सर्वप्रथम ईमानदारी, फिर सत्कर्म, क्योंकि कर्म करके हम बंधन में गए हैं तो कर्म करके ही मुक्ति पाएंगे। पहले ईमानदारी-सत्कर्म, फिर चाहे पूजा करो, पाठ करो, मंत्र करो — सब सहायक हो जाएंगे; ईमानदारी नहीं अपनाई तो सब आपके पतन का कारण बन जाएंगे।
एक तो मैं हूं, एक शरीर। शरीर के भी रूप का नाश होता है, तत्व का कभी नाश नहीं हो सकता — वो परिवर्तनशील है; ना शरीर का नाश हुआ, ना मेरा नाश होगा। मैंने इस शरीर को छोड़ा — अगला शरीर तभी धारण करूंगा जब कोई इच्छा-अपेक्षा, कोई कामना होगी। अगर इच्छा-अपेक्षा दोनों नहीं, कोई कामना नहीं, तो मैं अपने मूल की यात्रा करूंगा, जहां से आया हूं; और इच्छा-अपेक्षा रही तो भिन्न-भिन्न शरीर लेता रहूंगा। आप रूप में वशीभूत हो, तत्व में नहीं — शरीर जल जाता है, रूप का जहां नाश हुआ, आप राग छोड़ के चले आते हो; क्या उस राख में वो शरीर नहीं है? है — पंच तत्वों में विलीन हो जाता है। आप इस संसार में तभी तक रहोगे जब तक आपकी कामना है; कुछ नहीं चाहिए तो अगला शरीर धारण नहीं करोगे, जहां से आए हो वहां चले जाओगे।
भला तो तब कर पाओगे जब अपना कर पाओगे। आपको क्या लगता है — वैभव देना भला है? किसी का रोग ठीक करना भला है? ये ज्ञान तो तभी बांट पाओगे जब आप इच्छा-अपेक्षा से मुक्त होंगे, जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे; उसके पहले तो बांट ही नहीं सकते — उसके पहले जितना भी ज्ञान दोगे, शरीर तक रहेगा। आत्म तत्व का ज्ञान तभी दोगे जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे, और वो तभी जब कामनाओं से मुक्त होंगे। तो उसके लिए काम करो कि मैं कामनाओं से कैसे मुक्त होऊं।
जीवन में दुख नहीं है, जीवन में तो आनंद है। जीवन में कहां दुख है? बोरिंग इसलिए लगता है कि आप जैसा चाहते हैं वैसा नहीं होता — बस। आप स्वाद में फंस गए, टेस्ट में फंस गए। जीवन को तो जरूरत में जीना था — एक अपनी जरूरत में और एक सामने वाले की जरूरत में; आप जरूरत से ज्यादा में गए, अपनी चालाकी में, मान-सम्मान के चक्कर में, नाम-शोहरत-पैसे के चक्कर में, बड़ाई के चक्कर में आ गए। गलती तो आप कर बैठे। जो एक अनजाना सा दुख लगा हुआ है, जो गैप है, उसे भरने की कोशिश करते हो — यह भर लो, यह कर लो — फिर पता चलता है फिर खाली का खाली। आप भरना चाहते हैं, जीना नहीं चाहते। जीवन मिला है जीने के लिए, जीवन-मरण आपके हाथ में तो है नहीं; तो जीवन को जियो ना। इस दुनिया में ऐसे भी लोग रहे जो आनंद की मस्ती में जिए। आप जरूरत में जीना चालू कर दो — क्योंकि जीवन है तो एक नहीं, दो हैं: एक अपनी जरूरत देख लो, एक सामने वाले की जरूरत देख लो। जरूरत से ज्यादा चाहिए, वही दुख-सुख है — मिल गया तो सुख, नहीं मिला तो दुख। जीवन में दुख हमने पैदा किया है सुख के चक्कर में। हमें स्वाद लग गया है — मान का स्वाद, बड़ाई का स्वाद, बड़ा-छोटा बनने का स्वाद, योग्यता से ज्यादा पाने का स्वाद — इसी में फंसे हैं, और जब तक यह रहेगा आपके जीवन में दुख ही रहेगा। गाड़ी से कब दुख होता है? जब उससे अच्छी गाड़ी किसी ने ले ली, वह भी आपका परिचित। तो तुलना में सुख-दुख है; जब तक जीवन तुलना में रहेगा आप ऐसे ही दुखी रहोगे, क्योंकि एक से बढ़कर एक है। जरूरत में जियो — जितनी जरूरत है उतने में ही संतोष होना है, उससे ज्यादा तो फिर लालच है। हम अपनी कार में मस्त जा रहे थे, कोई दुख नहीं था; जैसे ही फुर्र से एक बड़ी कार निकली, दिमाग एकदम बौखला गया — यहां बात तुलना की है। अगर तुलना छोड़ दो तो आप जीवन में एकदम मस्ती में हो।
पहले बेकार नहीं लग रहा था, पहले तो उसमें जी रहे थे मस्त। बेकार तब लगने लगा जब समझ में आया कि इसका आखिरी परिणाम यही है — भोग-भोग के बोर हो गए। जब आपने देखा कि सारी मिठाइयों का हाल वही है, बस ऊपर से रूप बदला है; सारे भोजन का, सारे कपड़ों का, सारे मोबाइल का, सारी गाड़ियों का हाल वही है — तो अब उससे छुटकारा कैसे पाऊं, उसके लिए निकल गए। आपने कई वर्षों तक मान के चक्कर में जिया है; अब समझ में आ रहा है कि मैंने स्वाद में क्या-क्या कर दिया। हर लोगों से पहले मिलने में यही कहा कि तुम्हारे जैसा कोई नहीं, और आखिर में छोड़ते वक्त भी यही कहा कि तुम्हारे जैसा कोई नहीं। भोगते-भोगते समझ में आ गया कि है कुछ नहीं — घुमा-फिरा के सब वही है, बस क्षणिक सुख है, चाहे भोजन हो चाहे भोग। अब जितना किया है वह घुटन दे रहा है, क्योंकि आगे स्वाद चाहिए नहीं। अब आप पिछले किए गए कर्म की घुटन से निकलना चाहते हो, वह आपको अशांति दे रहा है। जिन-जिन से जो वादे किए, वे याद आ रहे हैं, दबोच रहे हैं — क्योंकि वादा भी हम अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए ऐसा करते हैं जो पूरा नहीं होगा: "चांद-तारे तोड़ के लाएंगे", "तुम्हारे बिना जी नहीं सकते", "तुम्हारे लिए प्राण दे देंगे" — कब तक? बस भोग के लिए; भोग मिल गया, बात खत्म। आप वादा पूरा नहीं कर पाए, आपने उसे यूज किया — वहां से नेगेटिव वाइब्रेशन आ रहा है। आपके परेशानी का कारण आपका अतीत है, यानी आपका किया गया कर्म। विचारों से कोई परेशानी नहीं — जितना तुमने कर्म किया उन विचारों से परेशानी है। विचार तो ऑप्शन हैं: बाजार में अनेक दुकानें खुली हैं, भीड़ है, कोई दुकान आपको परेशान नहीं करती; लेकिन वहीं एक शत्रु दिख जाए तो परेशान कर देता है। ये विचार अतीत के हैं, तुम्हारे किए गए कर्म से अंदर से आ रहे हैं, बाहर के विचार परेशान नहीं कर रहे।
आप काम को जरूरत में करो, खुशी के लिए क्यों करते हो? खाली को भरना — यह पागलपन है। उसकी जरूरत है क्या? क्यों खरीद रहे हो? जरूरत नहीं है तो मत खरीदो, बात खत्म; बैठो अपने आप में। बैठा भी नहीं जाता, क्योंकि अंदर से खींचता है कि बैठे क्यों हो, कुछ करो। कुछ करना ही तो दुख है — आपके तरीके से होगा तो सुख, नहीं होगा तो दुख। तो जरूरत में जीना चालू करो, कुछ करने से मुक्त हो जाओ; क्योंकि जब तक कुछ करना चाहोगे तब तक दुख है। आप सुख की इच्छा में कर रहे हो, सुख मिल नहीं रहा — क्षण भर मिलेगा, बाद में वही दुख देगा। तो सुख की इच्छा का त्याग करो; जितना गहरा सुख होगा उतना गहरा दुख है। जरूरत में जियो — ना सुख है ना दुख। सुख-दुख एक ही चीज है, वह है ही नहीं। श्मशान में बैठे रहते हो, चिता आती है, जलती है, आपको दुख नहीं होता; कोई बोल दे तुम्हारे रिश्तेदार की है तो जैसा लगाव रहेगा वैसा दुख होगा — जितना गहरा सामने वाले से जुड़ाव, उतना दुख, उतना सुख।
एक फकीर अपने आप को बादशाह सा कह सकता है, उसके पास कुछ भी नहीं है; और एक बादशाह होते हुए अपने आप को फकीर सा कर ले — उसके पास कुछ नहीं है, कुछ नहीं चाहिए — तब वह फकीर है। कुछ नहीं है और कुछ नहीं चाहिए — इस स्थिति में है तो फकीर है। फकीर का मतलब — जिसने अपनी लकीर को मिटा दिया। अगर लकीर है तो फकीर नहीं, वह लकीर का फकीर है। जिसने अपने आप को जन्म-मरण से मुक्त करा लिया, वह है फकीर — ना उसका जन्म रहा ना मरण। इस स्टेटस में आने के लिए बस उम्मीद छोड़ दो, बात खत्म। उम्मीद ही सुख है, उम्मीद ही दुख है — जब आपके तरीके से हुआ तो सुख, नहीं हुआ तो दुख।
बात यह है कि पहली बार उसी ने सुख दिया था, अब उससे थक गए हो, कुछ नया चाहिए। यह भोग-भोजन में ही होता है — रोज वही रोटी-चावल खाओ तो थक जाते हो, फिर पुलाव चाहिए, उसी का परांठा चाहिए, पूड़ी चाहिए, बदल-बदल के चाहिए। ऐसे ही रिश्तों से लोग थक जाते हैं, नया-नया चाहिए — उसमें मीठी बातें होती हैं, जैसा तुम चाहते हो वैसा सामने वाला कुछ दिनों तक बोलेगा। बस "अपने तरीके से चाहिए" का त्याग करो, बात खत्म। जरूरत में जियो — ना सुख है ना दुख। ईमानदारी-सत्कर्म करोगे तो विचार अच्छे आएंगे; ईमानदारी-सत्कर्म तो फाइनल निकलने के लिए है, लेकिन जीवन जीने के लिए जरूरत में जीना चालू करो — ना सुख, ना दुख।
यह आपको पता करना है कि जीवन का लक्ष्य क्या है। सबके जीवन का लक्ष्य अलग-अलग है — कोई राजगद्दी पाके खुश है, कोई राजगद्दी छोड़ के खुश है। मेरे समय से जितना मैंने समझा, इस मानव तन का मतलब यह है कि इसमें आने वाला उस परम सत्ता से मिलना करा ले — बस यही लक्ष्य होना चाहिए, इसीलिए शरीर मिला है। बाकी जितने भी अन्य जीव हैं, भोग-भोजन कर रहे हैं, उनके लिए प्रकृति की निशुल्क व्यवस्था है; मानव ही ऐसा है जो पैदा करके खाता है। इसका लक्ष्य है परम सत्ता से मिलना। जब तक उससे मिलना नहीं होगा, खालीपन रहेगा; खालीपन दूर करने के लिए उससे मिलना होगा। बाकी चीजों से तो शरीर की जरूरत पूरी होगी।
वह जाएंगे, उससे मिलेंगे, ऐसे करेंगे — कहीं न कहीं योग्यता से ज्यादा चाहने की इच्छा है, तभी परेशान करता है। और जब जबरदस्ती परेशान होना हो तो बात अलग है — भाई, रहो परेशान; जब आपको परेशान ही रहना है तो कोई क्या कर सकता है। खालीपन को दूर करने के लिए उससे मिलना है, तभी वह कमी दूर होगी, बस यही है; और उससे मिलने के लिए मैंने ईमानदारी-सत्कर्म बता दिया, और इस भवसागर से छूटने के लिए योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग कर दो। कोई विधियां कुछ मत पकड़ो — सीधा सा रास्ता है, इसलिए मैंने मिलने का रास्ता बताया। एक समय ऐसा आएगा कि शरीर छोड़ना पड़ेगा, उसके पहले उससे मिलना है; बाकी सब करके तो आप समय बर्बाद कर रहे हो। सिंपल सा रास्ता है, लेकिन लोगों को भटका दिया — भटका-भटका के थका देंगे, तभी तो गुलाम बनाएंगे।
जब तक वह नहीं मिलेगा, खालीपन रहेगा; इसको इससे कभी भर नहीं सकते, क्योंकि जिससे आप भरना चाहते हो वह खुद पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा — वह है रूप। जितने रूप में आप लोग बैठे हो, पहले नहीं थे, बाद में नहीं रहेंगे; शरीर का तत्व रहेगा, रूप नहीं रहेगा — तो इससे कैसे भरपाई होगी? आपका खालीपन तभी दूर होगा जब उस परम सत्ता से मिलना होगा जहां से आप हो — खालीपन उसी का है। ये सब छोड़ दो, विचार बंद कर दो, तो खालीपन समझ में आ ही जाता है। और वह तभी भरेगा जब आप पवित्र हो जाएंगे — उससे मिलना तभी होगा जब आप पवित्र हो जाएंगे, बस इतनी सी बात है।
यहां की चीज मिल भी जाए तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह शरीर तक है। चीज मिलने के बाद दुख तीन-चार गुना बढ़ जाता है — एकदम। जितना योग्यता से ज्यादा मिलेगा उतना आपका दुख बढ़ता जाएगा, बढ़ता जाएगा। सफल आदमी जितना दुखी होता है, मैंने कोई दूसरा उतना दुखी होता नहीं देखा। खालीपन तब दूर होगा जब उससे मिलना होगा।
अब करने से मुक्त हो जाओ — कर चुके। जिंदगी को जरूरत में जीना था। करना नहीं, जीना है। और जरूरत में करना करना नहीं होता, ध्यान रखना — जितनी शरीर की जरूरत है, शरीर के पोषण के लिए कुछ कर रहे हो तो वह करना करना नहीं है। करना तो तब होता है जब आपको योग्यता से ज्यादा चाहिए। पेट भर गया तो कोई तकलीफ नहीं; जैसे ही पेट से ज्यादा खाते हो, तकलीफ होना चालू हो जाता है — कभी जबरदस्ती पेट से ज्यादा खा लिया तो रात भर करवटें बदलीं, पचाने के लिए पाचन की दवाएं लीं। और यह शरीर उससे मिलने के लिए ही मिला है; बाकी अन्य जितने भी जीव हैं, वे भोग-भोजन करते हैं, कर्ता नहीं हैं, पैदा करके भी नहीं खाते — इस मानव तन का मकसद यही है।
कोई भी — जीवन है तो कोई सामने रहेगा। कोई नहीं रहेंगे तो पेड़-पौधे रहेंगे, कोई तो जीव रहेगा, और चिल्ला के कहेगा कि मेरी जरूरत है। कभी पेड़ का चिल्लाना, पशुओं का चिल्लाना देख पाओ तो देखो — वह चिल्ला के कह रहा है कि मुझे तेरी जरूरत है; अब आप उसके काम आ रहे हो या नहीं। कबूतरों को दाना डालते हो, एक दिन बाहर चले गए, दाना नहीं डाला, तो पड़ोसी बताता है कि वे चिल्ला रहे थे — गुटर-गूं चालू। घर में पौधा लगाओ और दो दिन पानी ना डालो, देख लो, वह बता रहा है मेरी जरूरत है। तो कम से कम अब अपनी नहीं, उसकी जरूरत में जियो; ईमानदारी-सत्कर्म में लग जाओ। अपने लिए जी के थक गए ना? अब लोगों के लिए जीना चालू कर दो — धन से, तन से, ज्ञान से — जरूरतमंद के लिए। यही जीवन है।
अभी ऐसी कोई जरूरत नहीं है। अपना ख्याल रखिए, जहां भी रहिए अपना आत्मिक कल्याण करिए। मुख्य सेवा तो यह है — यह तो बाहरी, शरीर की सेवा है। जिसके लिए सत्संग किया जा रहा है — आपके आत्मिक कल्याण के लिए — अगर वह आप करते हैं तो यही सेवा है; बाकी आप कुछ भी कर दें वह सेवा नहीं है, वह जरूरत है। और जरूरत तो हमारी पूर्ति हो ही जाती है, क्योंकि हम बस जरूरत में जीते हैं।
कोई बात नहीं, आप मीठा वचन बोलिए — ऐसा वचन बोलो कि वहां जितनी नेगेटिव एनर्जी है वह हट जाए। जैसे पानी और आग — पानी आग को बुझाता है, लेकिन अगर आग की मात्रा ज्यादा है और पानी कम तो पानी खत्म हो जाएगा, और पानी ज्यादा है तो आग बुझ जाएगी; बात मात्रा की है। तो अगर कोई इतना कुछ फैला रहा है, आप कुछ ऐसा करो कि आपकी ऊर्जा सब पर भारी पड़ जाए। मौन भी — किसी स्थिति में मौन हो, तो मौन होने के बाद आपके अंदर से कौन सी ऊर्जा निकल रही है यह भी मायने रखता है। पता चला मौन हो लेकिन घुटन हो रही है, अंदर से पूरे परिवार को गालियां दे रहे हो — तो वह मौन मौन नहीं है, अंदर बड़बड़ चालू है। सात्विक तरीके से मौन हो जाओ — किसी के शब्दों का, चाल-चलन का, उठने-बैठने का आपके ऊपर प्रभाव ना पड़े, तब आप मौन हो।
जन्म-मरण होता नहीं; जन्म-मरण है ही नहीं — इच्छा और अपेक्षा का जन्म-मरण है। इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो जाओ — ना जन्म, ना मृत्यु; काल-चक्र से मुक्त हो गए।
प्रभु की माया में कोई दुख नहीं है, ना सुख है — आनंद है। हमारी माया में हमें परेशानी है। हमने भी एक माया का निर्माण किया है — हमारी माया में लोभ है; उसे हमने लालच में बनाया है, उसमें हमने बेईमानी-दुष्कर्म किया, इसलिए उसमें अशांति है। अगर हम उस माया को छोड़ के प्रभु की माया में आ जाएं तो फिर आनंद ही आनंद है। हमारी माया अस्थाई है, परिवर्तनशील है, क्षणिक सुख है। तो बेईमानी-दुष्कर्म छोड़ दो, माया से मुक्त हो जाओगे। इसी माया में, इसी संसार में महापुरुष आनंद में जिए — वे भी भोजन कर रहे थे, बस संचय नहीं करते थे। आप सात पीढ़ी के लिए बनाते हो, और उसके लिए कोई भी कर्म करने को तैयार हो जाते हो। जीवन जीने के लिए जितना जरूरी है उतने की जरूरत है; लेकिन आप संचय में परेशान हो, बड़ा बनने के चक्कर में, मान के चक्कर में, दिखावे के चक्कर में परेशान हो। महापुरुष ये छोड़ देता है — छोड़ने वाले को ही महापुरुष कहा जाता है, और आप भी उस स्थिति में आ सकते हो। मस्ती भोग-भोजन में भी है, लेकिन क्षणिक है; वही सुख बाद में दुख देता है, वही हमारे लोग बाद में हमें दुख देते हैं — जब हमारे तरीके से हुआ तो सुख, नहीं हुआ तो दुख। ब्रह्मानंद तो है ही; बस बेईमानी-दुष्कर्म छोड़ दो — इसी को साधना कहते हैं। क्यों पकड़ के रखे हो? जब तक नहीं छोड़ोगे तब तक आनंद में नहीं आओगे। जब तक इच्छा और अपेक्षा से मुक्त नहीं होगे, अपने आप में नहीं आओगे; अपने आप में नहीं आओगे तो आनंद में नहीं आओगे; आनंद में नहीं आओगे तो परमानंद में भी नहीं जा पाओगे। इच्छा-अपेक्षा में दुख-सुख है, दोनों का त्याग करना पड़ेगा — बस, माया से मुक्त हो जाओगे।
यह तो जरूरत है, इच्छा नहीं है। इच्छा उसे कहते हैं जो हमने पैदा की है — जरूरत नहीं है फिर भी लालच में, लोभ में, बड़ा बनने के चक्कर में, दिखावे के चक्कर में हम इच्छा पैदा करते हैं। दर्द हुआ तो दवा चाहिए — यह जरूरत है। ठीक होने के बाद भी क्या दवा की उम्मीद रखते हो? अगर कोई बोले एक गोली और खा लो, तो खाओगे? नहीं। लेकिन आपके पास जरूरत के सब संसाधन हैं, पैसे भी हैं, फिर भी कोई कहे और ले लो तो कहोगे "लाओ, जितना भी लाना है लाओ, पूरी दुनिया का धन मुझे दे दो।"
जीवन भर दर्द है तो सहे, और क्या करेगा; इलाज हो रहा है तो सहे। साधना का मतलब है अपने आप को सुधारना। पहले तो पकड़ो कि मैं बिगड़ा हूं, बिगड़ी हूं; फिर अपने आप को सुधारो। सुधारना ही साधना है। और आप सुधरे हुए हो तो आपको साधना की जरूरत नहीं है — जैसे बीमार नहीं हो तो दवा की जरूरत नहीं; बीमार भी नहीं और कह रहे हो मुझे दवा दो, तो कोई मतलब नहीं।
एकदम — वे उसमें थे ही नहीं, लिप्त थे ही नहीं; उनका शरीर बीमार था। उम्मीद छोड़कर — अगर आपको उम्मीद नहीं है तो आपको दर्द नहीं हो सकता, और उम्मीद है तो दर्द होगा ही होगा। अगर आप उम्मीद से मुक्त हो गए तो आपको दुख हो ही नहीं सकता; आप पैदा भी करना चाहोगे तो नहीं होगा, आपको हंसी आएगी; आपका शरीर सड़ेगा तो भी आपको दुख नहीं होगा, दुख छू भी नहीं सकता। और उम्मीद है तो होगा ही होगा। स्वस्थ रहने की उम्मीद क्यों रखे हो? स्वस्थ रहने के लिए जीवन जियो, लेकिन उम्मीद क्यों बना के रखी है?
भय कमजोरी की वजह से है — कहीं ना कहीं आप कमजोर हो। कमजोरी को दूर करने के लिए, भय को हटाने के लिए — ईमानदारी-सत्कर्म, और योग्यता से अधिक पाने की चाह-इच्छा का त्याग। उसके बाद मेहनत — उस दिशा में जो चाहिए: धन चाहिए, पैसा चाहिए तो खूब मेहनत करो; शरीर की ताकत चाहिए तो काजू-किशमिश-बादाम-छुहारा-मुनक्का बढ़िया-बढ़िया खाओ, हृष्ट-पुष्ट रहोगे; और ज्ञान चाहिए तो ज्ञानी के पास जाओ, उसकी शरण में जियो। देख लो आपको क्या बढ़ाना है — धन, तन या ज्ञान।
जब आपको कुछ नहीं चाहिए तो आप मौन हो जाते हो, और जब आपको कुछ चाहिए तो आप बोलने लगते हो — बस "चाहिए" का खेल है। जब आपको चाहिए तो आप बोल रहे हो, मौन नहीं हो; और जब कुछ नहीं चाहिए तो आप बोल के भी मौन हो। अगर आपको कुछ चाहिए तो चुप होके भी — मुंह से नहीं तो मानसिक बोल बोल रहे हो, और भी इंद्रियों का उपयोग कर रहे हो।
वह शरीर का दर्द है, और आप कहीं लगे हुए हो — आप महत्व किसको देते हो, अपने आप को या शरीर के दर्द को? अपने आप को दोगे तो दर्द की तरफ आप जाओगे ही नहीं, वह धूमिल पड़ जाएगा। जैसे आपके सामने एक व्यक्ति बीमार हो, आप बहुत दुखी हो; कुछ देर बाद आपका बेटा उससे भी ज्यादा बीमार हो जाए, तो पहले वाले की बात धूमिल पड़ गई ना? जिस दिन आपका महत्व आपके जीवन में समझ में आ जाएगा, उस दिन आप शरीर के दर्द में जाओगे ही नहीं। आपको आपका महत्व ही नहीं मालूम; आपको बस बाहरी आवरण का महत्व सिखाया गया है — गाड़ी, बंगला, घर, कपड़े, मकान, जायदाद, पैसा-रुपया, सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात — इन सबका महत्व अपने जीवन में दे दिया है। महत्व देने की एबिलिटी पर ही सारा कुछ निर्भर करता है — आपने किसे महत्व दिया है, आपके लिए क्या जरूरी है?
बस आपने उसे महत्व दिया है — आप छोड़ दीजिए, बात खत्म। प्रयास करके पकड़ा है तो प्रयास करके छोड़ना पड़ेगा। और इसमें समय-अवधि का कोई महत्व नहीं — जब चाहे तब छोड़ दो। लंबे काल से महत्व देके पकड़ा है तो भी छोड़ने में लंबी अवधि नहीं लगती, छोड़ने में क्षण लगता है। बनाने में बहुत समय लगता है, बिगाड़ने में एक क्षण लगता है। सामान जुटाने में आपको बहुत समय लगा है — चाहो तो एक झटके में आग लगा दो, सब खत्म। क्या आप तैयार हो? बस।
संबंध किस भाव से है? संबंध तो एक तरफ से होता है — एक तरफ से दिखता है, होता नहीं। शिष्य की तरफ से संबंध होता है; गुरु की तरफ से तो कोई संबंध होता ही नहीं, वह तो संबंध के लायक रहा ही नहीं। लेकिन गुरु की उपस्थिति में उत्प्रेरणा बढ़ जाती है, इसलिए गुरु की उपस्थिति बहुत आवश्यक है — एकदम सबसे जरूरी, जैसे एक बच्चे के लिए मां।
छूट जाता है, छोड़ता नहीं। आप गिलास से पानी पी रही हो — प्यास बुझेगी, गिलास छूट जाएगा; और पानी भी आपकी प्यास बुझा के जहां जाना है चला जाएगा। सब अपनी-अपनी जगह चले जाएंगे, सब छूट जाएगा — बस तुम रह जाओ।
तब तक संपर्क रखना चाहिए जब तक आत्मिक कल्याण ना हो जाए। अगर आप यहां से निकले हो और वहां पहुंचना है, और यह मार्ग है — इसे बीच में ही छोड़ दिया तो पहुंच नहीं पाओगे; आपको आखिर तक जाना पड़ेगा, आखिर में वह छूट जाएगा। गुरु मार्ग है; लक्ष्य तक पहुंचने के बाद गुरु छूट जाता है। एक समय ऐसा आता है — एक कदम लक्ष्य पे और एक कदम मार्ग में; इधर से इधर उठाए तो फिर आ गए दुनिया में, और उधर उठाए तो मार्ग खत्म — एक कदम उठाते ही गुरु छूटा और आप अंदर हो गए।
जब आप उसके पास रहते हो तो पांचों इंद्रियों से वह कुछ ना कुछ आपको देता रहता है — आपको देखता है तो भी दे ही रहा है। हर वक्त हर व्यक्ति ले भी रहा है और दे भी रहा है। आप किसी को देख रहे हो, उससे सुख ले रहे हो — हो सकता है उसे घुटन हो रही है, आप उसे दुख दे रहे हो; हो सकता है उसे भी आपका देखना अच्छा लग रहा है, तो दोनों एक-दूसरे से सुख ले रहे हैं। कर्मभूमि में हर वक्त लेन-देन चल रहा है — आंखों से, कानों से, सुगंध-दुर्गंध से, श्वास से, स्पर्श से। संसार में लेन-देन है — दे तो रहा है, लेकिन एक तरफ देके दूसरी तरफ से आपको खाली भी कर रहा है; हर आदमी दे तो रहा है और फिर ज्यादा ले रहा है — यही संसार का चक्कर है। लेकिन गुरु के यहां बस देन है, लेन है ही नहीं — इसलिए तुम वहां भर जाते हो। गुरु वन-वे है, बस देता रहता है; उसके पास देने के अलावा कुछ है नहीं, और तुम्हारे पास जो कुछ है वह उसके काम का नहीं, उसे तो कुछ चाहिए नहीं। हां, पात्रता होनी चाहिए — जितनी आपकी पात्रता होगी उतना मिलेगा।
हां, अगर सुनते रहो। बुद्ध के साथ आनंद थे — सुनते-सुनते ही तो उस स्थिति में पहुंचे। गुरु नानक देव जी ने गुरुद्वारे में यही किया कि आओ, बैठो, केवल सुनो। लेकिन हर वक्त वही सुन रहे हो तब — पता चला सुबह सत्संग सुना, शाम को गप मार दी, तो गए। सिर्फ सत्संग सुनते रहो, सुनते रहो, तो सुनते-सुनते भी आप उस स्थिति में पहुंच जाओगे; लेकिन उसके अलावा फिर आपके जीवन में कोई और एक शब्द नहीं आना चाहिए।
गुरु के पास प्रेम होता है, दया नहीं — साबुन होता है धोने के लिए; धुलाई होती है, वह दया नहीं करता। बचपन में हमें अगर फोड़ा हो जाता था, तो मां-पिता टांग-पांव पकड़ के उसे जोर से दबा के निकालते थे और हम जोर से तड़पते थे। जब तक उसकी कील नहीं निकलेगी तब तक वह सड़ेगा, और उसे निकालने के लिए इतना जोर से दबाना पड़ता है कि सामने वाला चिल्लाने लगता है — लेकिन वे दबा रहे हैं। यही काम गुरु का है — तुम्हारी गंदगी निकालने का। आपके अंदर गंदगी है, उसको निकालने में बहुत पीड़ा हो रही है, लेकिन करें क्या? अभी तुम्हारी ताकत नहीं कि अपने हाथों से निकाल लो — एक बालक को बोल दो कि अपने फोड़े की कील निकाल ले, नहीं निकाल पाएगा; उसके मां-बाप आसानी से निकाल देते हैं, लेकिन उसके लिए उसे पीड़ा झेलनी पड़ती है। वैसे ही आप लोगों को बहुत पीड़ा होगी — अभी तो शुरुआत है, अभी तो फोड़ा केवल दिखाया है, ऊपर-ऊपर दिख रहा है; गुरु को तो दिख गया। अगर पक्का निकलना है तो बहुत तकलीफ का सामना करना पड़ेगा। अभी तो तैयार किया जा रहा है, बनाया जा रहा है — धीरे-धीरे; फोड़ा बहाते वक्त भी पहले सीधा नहीं दबाते, प्यार से सहलाते हैं — "बेटा, दर्द नहीं होगा।" गुरु तब रगड़ता है जब पूरी तरह हाथ में आ जाते हो; जब तक उसे लगता है कि तुम छुड़ा के भाग जाओगे, तब तक वह कुछ करता नहीं। जब गुरु को पता चल जाए कि अब तुम नहीं भागोगे, वहां से तुम्हारी रगड़ाई शुरू; अभी तो रगड़ाई बस इतनी हो रही है जितनी आप सह सको। गुरु के यहां माल देख सकते हो, खा नहीं सकते — देख के मुक्त हो।
हमने अपने आप को ही रगड़ दिया — अच्छे तरीके से। दिसंबर-जनवरी के महीने में नर्मदा तट पे शाम को नहाना, ठंड के महीने में ऐसे ही सोना; जब तक कर सकता था तब तक व्यवस्था नहीं की, रात 12–1 बजे के बाद जाके व्यवस्था करना — पहले अपने आप को फंसाना, फिर निकालना; और सुबह तक इंतजार करना, क्योंकि 12–1 बजे के बाद कौन देगा, शाम की तो व्यवस्था ही नहीं की। हमने अपने ऊपर खुद काम किया। उस समय एक साधक के रूप में यह एहसास में आ गया कि इसके अलावा रास्ता नहीं है, क्योंकि द्वैत है — जब तक दूसरा पहलू नहीं लेंगे, केवल एक नहीं मिल सकता। तो पहले दुख की मात्रा को ही बढ़ाओ, सुख अपने आप खत्म हो जाएगा। मुझे छोड़-छोड़ के भागने की इच्छा नहीं थी, क्योंकि फैसला मेरा था — किसी ने मुझ पर फैसला थोपा नहीं था। जब भी ऐसा कुछ हुआ, मैंने अपने से कहा — "फैसला लिया है, तुझे चलना पड़ेगा; फैसला तेरा था, सब तो मना कर रहे थे — मां से लेकर सब मना कर रहे थे कि इस मार्ग में मत जाओ — तो चले हो तो चलो, आगे बढ़ो, फिर आखिर तक।"
क्या करोगी? जो करना था कर दिया; अब उसका जीवन है, वह आएगी। साधु पहले डिसाइड थोड़ी होता है — बढ़ना होता है; बढ़ते-बढ़ते अपने आप बन जाता है। कपड़े पहनने से क्या है?
चिल्ला लिया, लेकिन अगल-बगल को देख के — उनको क्या फर्क पड़ेगा, कम से कम उनके बारे में सोचना। ऐसी जगह चिल्लाओ जहां चिल्लाने से उनको फर्क ना पड़े; आपको फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन उनको पड़ेगा, और हमारी वजह से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। बगल में भी कोई होगा — तो दूर चली जाओ, वे सोचेंगे क्या हुआ। बाकी पक्का कर लो — पीछे मत मुड़ो; जब तक पीछे मुड़ोगे तब तक अपने आप में नहीं हो पाओगे। जल्दी से जल्दी आगे बढ़ो।
परिवार में अगर आप रह रहे हो तो विवेकपूर्ण होना चाहिए। लेकिन जो आप कर रहे हो उसे दमन नहीं कहते, उसे अनदेखा करना — उपेक्षा — कहते हैं। दमन का मतलब है उसे दबाना; आप दबा नहीं रहे, अनदेखा कर रहे हो। दमन नहीं करना चाहिए — समझना चाहिए।
इलाज करवा दो; और जिसका कोई इलाज नहीं — जैसे आप बैठे हो और दर्द हो रहा है — तो उसे सहना ही पड़ेगा। देख लो आपके लिए जरूरी क्या है, सहना कि सुनना; सुनना जरूरी है तो सहते रहो, और क्या करोगे। माताजी पहले से सह रही हैं — पहले मानसिक सह रही थीं, अब शारीरिक सह रही हैं, उनके लिए कोई नया नहीं। और शारीरिक सहन में समस्या है तो फिर मत रहो, घर जाओ — ऑप्शन तो है ना; जिस गाड़ी से आए हो वैसे ही चले जाओ। सह भी रहे हो तो अपने आप के लिए — आपके सहने में आपका हित है, दूसरों का नहीं; और नहीं सहना हो तो "नर्मदे हर" — यह भी ऑप्शन है। आर्मी में भर्ती होना है तो गद्दा-गद्दी नहीं छोड़ोगे तो भर्ती हो पाओगे? वर्दी ऐसे ही नहीं मिल जाती, बहुत टफ ट्रेनिंग होती है; जाके कहोगे "मैं नहीं सह पाऊंगा" तो भगा देंगे — क्योंकि जब पता है कि यह पास नहीं हो पाएगा तो इसे दौड़ा के क्या मतलब, इसका समय बर्बाद मत करो। यह तो अभी शुरुआत है; आगे इससे भी ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा — एक समय ऐसा आएगा कि कहोगे इससे अच्छी तो मृत्यु है, एक बार में मार देगी। स्व में स्थिर होने के लिए अथाह दुखों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मैं लोगों को सलाह देता हूं कि कुछ नहीं चाहिए तो इसमें आगे बढ़ना — सब खत्म हो जाएगा।
धीरे-धीरे आ जाती है — छोटे-छोटे स्टेप्स। आप पहली क्लास में थीं, फिर दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवीं, छठी; अगर पहली क्लास में ही कॉलेज की बुक सामने रख दी जाती तो आप कहतीं "मैं इसे कभी नहीं पढ़ पाऊंगी"; लेकिन बाद में आप बहुत आसानी से पढ़ने लगीं। धीरे-धीरे आगे जाइए।
जाने दो कितना टाइम बचा है; जब पता नहीं तो पीछे क्यों जा रही हो? टाइम का पता है तभी पीछे जा रही हो। कोई आपको पुकार रहा है तो बोल दो — "मुझे पता ही नहीं मैं कब तक रहूंगी।" जब तक हो, अपने आप में रह लो; बस वापस मत जाओ। और लक्ष्य है, तभी तो बोल रही हो — बिना लक्ष्य के थोड़ी बोलतीं; चाहे मरना पड़े, जो भी हो।
धारणा का मतलब होता है — जब आपको कुछ चाहिए तो धारणा बन गई। अब देखना है कि आपको चाहिए क्या — "मुझे स्व में स्थिर होना है" या "उस परमात्मा से मिलना है", कुछ भी ले लो, एक पॉइंट तो पकड़ना पड़ेगा। अगर मुझे स्व में स्थिर होना है तो मुझे निर्विकार होने की धारणा बनानी पड़ेगी। जब धारणा पक्की करोगे तो काम होने लगेगा; और जब काम होने लगेगा तो उस पर ध्यान भी रहेगा — हर काम को ध्यान से करोगे कि कहीं विकार ना आए, निर्विकार कैसे हो जाऊं; यह अपने आप होने लगेगा — तो धारणा से ध्यान घटित हो गया। समाधि का मतलब — एक समय ऐसा आता है कि कुछ पता नहीं रहता, कुछ समझ में नहीं आता; क्योंकि समझ-समझ के जीव थक जाता है, कर-कर के थक जाता है, करने के लिए कुछ बचता नहीं, जितनी उसकी सामर्थ्य थी लगा दी, अब उसके पास कोई ताकत नहीं — वह समाधि की स्थिति होती है। समाधि के बाद तुम स्व में स्थिर हो गए, उसके बाद यात्रा होती है उस परम सत्ता में। धारणा पक्की करनी पड़ेगी। जैसे आप घर जा रहे हो, कोई कहे "चलो यहां होके चलते हैं" तो आप चले जाओगे; लेकिन रास्ते में फोन आ जाए कि आपका बेटा — जिससे आपका लगाव है — बहुत सीरियस है और आपका नाम ले के चिल्ला रहा है, जल्दी आओ, तो फिर कोई कहीं भी बोले, नहीं जाओगे, क्योंकि वह आपके लिए बहुत जरूरी है। और अगर पता चले कि बस बुखार है, तो कहोगे "दवा ले लो, हम होके आ रहे हैं।" जिस दिन जरूरी हो जाएगा कि मुझे निकलना है, स्व में स्थिर होना है, उस परम सत्ता से मिलना है — उस दिन आप उसके लिए कुछ भी कर सकते हो; अभी तो सिर्फ प्लानिंग कर रहे हो। जैसे बाप अपने बच्चे को बचाने के लिए अपने आप को भी बेच देगा, लेकिन भाई या बहन के बच्चे बीमार हों तो उसका एक दायरा होगा — "मेरे पास इतना है, इससे ज्यादा नहीं कर सकता"; यानी यह हमारा ही चुनाव है। तुम पक्का कर लो तुम्हें क्या चाहिए — जितना पक्का करोगे उतनी तेजी से काम होगा। हमारी गलती यह है कि धारणा बनाने से पहले ही ध्यान और समाधि में चले जाना चाहते हैं — डायरेक्ट पाना चाहते हो।
इस जगह को छोड़कर कहीं और जाके रहिए और वहां मोबाइल स्विच ऑफ करके रखिए, देखिए आप रह पाते हो? कभी ट्राई करिए — दो दिन बिना काम के, कुछ ना करना; जैसे यहां बैठे रहते हो वैसे बैठना, एक टाइम नाश्ता, एक टाइम भोजन, बस, और कुछ खाना-पीना मत, काढ़ा ले लेना — दो दिन रह के देखो। हो सकता है भाग जाओ, क्योंकि धारणा मजबूत नहीं रहेगी कि "नहीं, करना ही करना है।" यहां सिस्टम है, और सिस्टम के साथ ऊर्जा भी है — सिर्फ सिस्टम से काम नहीं चलता; यहां दिन बीत जाता है, रात बीत जाती है, पता नहीं चलता, कब रात के तीन से चार बज जाते हैं। आप अपने घर पे या कहीं एकांत में झोपड़ी में जाके रहो — दो घंटे दो दिन के बराबर लगेंगे, समय ही नहीं बीतेगा।
यह भी अच्छी बात है। अब देखो किस में रस आ रहा है; अभी तो सब फीका लग रहा है — आगे देखिए क्या लगता है। सब फीका हो जाएगा, अपना चेहरा तक फीका हो जाएगा — आप 20 साल पहले जैसे आईना देखती थीं और आज देखती हो, फर्क है कि नहीं?
बिना प्रयास के हो रहा है — इसमें मेरा कोई प्रयास नहीं, सब अपने आप हो रहा है। यहां जिस दुकान से सामान आता है, उसे बोलता हूं पैसा ले लो, तो बोलते हैं "आराम से देना"; हिसाब जोड़ने में उनको कई महीने लग जाते हैं — "आज बना दूंगा" करते-करते महीने लगा देते हैं — और मैं भी बेफिक्र हो जाता हूं कि बिल ज्यादा हो जाएगा तो हो जाएगा, देने के लिए मैं हूं ना। दुकान वाले सामने से सामान भेज देते हैं; मुझे जरा सा भी यह नहीं बोलना पड़ा कि आप मुझे सामान दो, मैं बाद में पैसा दूंगा। बड़ी अजीब बात है — हमें कभी प्रयास नहीं करना पड़ा, कभी 1% भी दिक्कत नहीं आई; आप इतने दिनों से देख रहे हो, कभी यहां कोई सामान की कमी पड़ी? भाव से कर रहे हैं, इसलिए जैसे भी हो, हो रहा है; हमारा 1% भी प्रयास नहीं है, यहां स्वार्थ नहीं है।
नहीं, ऐसा नहीं है — आप चाहे जहां भी रहें। आपको छोड़ना क्या है? बेईमानी-दुष्कर्म, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग, मान की इच्छा का त्याग, दिखावे का त्याग, बड़ा-छोटा बनने का त्याग — छोड़ दो। और एक-दो बार मिलना अच्छा लगता है तो मिलते रहो। जो कहते हैं टाइम नहीं मिलता — किसके पास टाइम नहीं है? जिंदगी में टाइम ही टाइम है; आप देना नहीं चाहते, आपको गप मारनी है, दूसरी जगह के प्लान बनाते रहते हो — बस यही बात है।
सेवा आप उसकी भी करते हो जिसे जरूरत नहीं है, और सत्कर्म उसकी करते हो जिसे जरूरत है। सेवा में वह व्यक्ति आपको आशीर्वाद देता है, और सत्कर्म में उस परम सत्ता से आशीर्वाद आता है। सेवा करने में आप उसके लिए एक व्यक्ति हो, और सत्कर्म करने में जिसके लिए आप सत्कर्म कर रहे हो उसके लिए आप एक भगवान हो। सत्कर्म आपको भगवान बनाता है, सेवा आपको देवता बनाती है। आपको क्या बनना है? कुछ नहीं बनना है — बनने से मुक्त होना है।
कहीं ना कहीं कमजोरी है, उस कमजोरी को दूर करो — जांचने में कमजोरी है। देख लो किस फील्ड का विचार है; जिस फील्ड के विचार आ रहे हैं उस फील्ड की पूरी जानकारी होनी चाहिए। और क्या सही है, क्या गलत — उसमें अटको मत; समझ कर जियो — ना कुछ सही है, ना कुछ गलत। बस आप उचित तरीके से काम करो और आपके काम से किसी को तकलीफ ना हो, बस इतना ध्यान रखो।
ऐसा कोई हो नहीं सकता। हमारी तो भविष्य की प्लानिंग बहुत है — कुटिया, 100 कमरे — हर समय प्लानिंग ही चल रही है: सत्संग के बाद भोजन बनाने की प्लानिंग, भोजन के बाद सत्संग की प्लानिंग — प्लानिंग में ही तो चल रहा हूं।
उसकी पहचान ऐसी है जैसे कोई जानवर दूध दे रहा है कि नहीं, बच्चे की मां बनी है कि नहीं — कैसे पहचान होगी? उसके स्तन से दूध निकालो। वैसे ही अगर कोई आत्मज्ञान को उपलब्ध हो गया है तो वह प्रश्नों के उत्तर देगा — बस, बात खत्म, और क्या पहचान करोगे? कोई बोल दे कि मैंने इतनी पढ़ाई की है, तो उसकी क्या पहचान है? उस विषय पर उससे बात करो, डिस्कशन करो, पहचान हो जाएगी; चेहरे से थोड़ी पहचान होगी।
या तो जवाब देना ही पड़ेगा, या अपने आप को इतना समर्थवान बना लो कि आपके सामने कोई आएगा ही नहीं — जैसे शेर मस्त बैठा रहता है, उसके सामने कोई नहीं जाता, किसी की हिम्मत नहीं पड़ती; जाता है तो उसका बच्चा। एक ओरा होती है, ऊर्जा होती है।
किस लिए लगा रहे हो, लगाने का भाव क्या है? अगर उसको लगा के उसका उपयोग कर रहे हो तो सेवा है, और समाज के हित के लिए लगा रहे हो तो सत्कर्म हो गया — किस भाव से लगा रहे हो।
नहीं। फिर आने की क्या जरूरत? आके क्या करेंगे, समय बर्बाद क्यों करेंगे — क्योंकि आप आते हो तो मुझे समय देना पड़ता है; ऐसा थोड़ी है कि व्यक्ति आया है तो ऐसे ही है — हर व्यक्ति को मुझे समय देना पड़ता है।
पहली घटना में आपके पास दो बातें थीं — एक कह रहा है मैं जरूरतमंद हूं, एक कह रहा है इनका यही काम है। आपने कैसे पक्का किया कि कौन सही बोल रहा है? आपको बस निकलना था, अंदर से करना नहीं था, बस एक बहाना मिल गया। अगर आप करने वाले होते तो कहते — चलिए, मैं आपको भोजन कराऊंगा, कैश नहीं दूंगा, इस सच्चाई को मैं खुद देखूंगा। उस समय आपको फैसला लेना चाहिए था। मैं मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर से निकला, एक ने पैसे मांगे, मैंने ₹100 दिए; वह फिर आ गया, ड्राइवर बोला ये बने हुए हैं। मैंने कहा कोई बात नहीं — जिस क्षण मैंने दिया, उस क्षण वह मेरे लिए जरूरतमंद था; यहां सब बदल जाएगा, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। चेन्नई स्टेशन पर मेरे पास ₹40 से भी कम थे, भूख लगी थी; एक व्यक्ति आया तो मैंने ₹20 निकाल के दे दिए। किसी ने कहा ये बेवकूफ बनाते हैं — मैंने कहा ₹20 में बेवकूफ बनने के लिए मैं तैयार हूं। फिर तिरुपति में प्रसाद की लाइन से मुझे हटा दिया गया, तो एक आदमी ने अपना प्रसाद मेरे हाथ में रख दिया, और दूसरे दिन पैसा भी आ गया। कहने का मतलब — वह कह रहा है मैं जरूरतमंद हूं, तो जितना कर सकते हो करो, हर समय शक मत करो, उसका कर्म वह जानेगा। आटे वाली बच्ची बेच भी देती तो हो सकता है उसकी कोई और जरूरत होती — जीवन में केवल भोजन से गुजारा नहीं होता, कपड़ा है, दवा है; हर आदमी हर बात किसी से शेयर नहीं कर सकता। इतना मत जांचिए। मैं यहां हर आने वाले से, चाहे करोड़पति हो, पूछता हूं किराया-भाड़ा है? अगर कहे नहीं, तो सबसे सस्ते टिकट तक का दे देता हूं। कितनों से पूछा, लेकिन एक आदमी मिला जिसने कहा आपका आशीर्वाद बहुत है — मैं समझ गया उसके पास किराया नहीं है; उसने संकोच, स्वाभिमान, मर्यादा में नहीं मांगा। तो आप करते रहो, जितना आपसे हो सके; भाव सेवा का होना चाहिए।
आपकी बात एकदम सही है, बेच भी देते हैं, मैं भी यह सब देखता हूं। लेकिन अगर करते रहेंगे तो कोई एक तो जरूरतमंद मिल ही जाएगा — ऐसा न हो कि शक करने से वह एक छूट जाए। भाव हमारा हमेशा सेवा का ही होना चाहिए। वह बेईमानी कर रहा है तो वह जाने, उसका काम जाने। आप अपने तरीके से जांच लो, लेकिन जांच के ही आगे बढ़ो, नहीं तो बाद में पछतावा होता है, और वह व्यक्ति दोबारा खोजोगे तो नहीं मिलेगा। भोजन मांग रहा है तो सामने खिला दो, कपड़े के लिए बोले तो दिला दो। मैं तो ₹20 में बेवकूफ बनने के लिए तैयार हूं — और उस समय सबसे ज्यादा जरूरत मेरी थी, मुझे भूख लगी थी; वह ₹20 देने का मतलब था कि दूसरे दिन तक मुझे भोजन नहीं मिलना, मैं मांग के खा नहीं सकता था। शायद वह मेरे जीवन की परीक्षा ही हो कि तुम क्या करते हो — कोई किसी रूप में आता है। फिर वहां एक ने मुझे प्रसाद नहीं दिया तो दूसरे ने दे दिया — वहीं रिटर्न मिल गया। कभी-कभी आप ठगे जाते हो तो बस उसे छोड़ दो; मेरे साथ भी ऐसा होता है, बाद में पता चलता है तो सोचता हूं चलो, किसी जन्म का उसका देना होगा, कोई बात नहीं — मेरी तरफ से मैंने उचित किया, बस बात खत्म।
एक बार आपको समय निकालना चाहिए — आप जिस ताकत को दे रहे हैं, उस ताकत का सदुपयोग हो रहा है या दुरुपयोग। मुंबई जाना पड़े तो कोई बात नहीं, घूमना भी हो जाएगा; बोल दो पता दीजिए, हम आएंगे। एकदम पता करके ही देना चाहिए। पता चलने के बाद भी दे रहे हो तो लगेगा; इसलिए जांच के देना चाहिए, चाहे जिस तरीके से — ऑनलाइन दे रहे हो तो ऑनलाइन चेक करिए: रजिस्टर्ड है या नहीं, क्या काम कर रहा है, उसका पूरा निकालिए; हो सके तो आप जाइए। समझ कर दीजिए, क्योंकि जब आप किसी को ताकतवर बना रहे हैं और गलत आदमी को ताकतवर बनाएंगे तो वह समाज में बुराइयां फैलाएगा। धन हो, तन हो या ज्ञान — उस व्यक्ति को दीजिए जो समाज हित में कार्य कर रहा हो, और उसके कार्य को देख लीजिए; ऐसा न हो कि ऊपर से कुछ और बता रहा है, अंदर से कुछ और कर रहा है। जीवन में इतना तो समय दीजिए, इतनी मानवता तो आप में भी होनी चाहिए। वेबसाइट पर तो वही दिखाएंगे जो वे दिखाना चाहते हैं; जिस स्थान पर सेवा होती है, वहां अनजान व्यक्ति बनकर चले जाइए — एकदम साधारण होकर, फटे कपड़े, टूटी चप्पल — और जितना समय है एक-दो दिन रुकिए, असलियत पता चल जाएगी। प्रभाव में मत जाइए — चश्मा, ब्रांडेड टीशर्ट, जूते, मोबाइल लेकर जाएंगे तो 'आइए सर, आइए' — सारी व्यवस्था बना के रखेंगे वे लोग। आपके आवरण का एक परसेंट भी प्रभाव न पड़े। फिर जांच के सहयोग देंगे तो देखिए कितना सुकून मिलेगा; अभी आप सेवा तो दे रहे हो, लेकिन एक संशय बना है।
एकदम देख लीजिए, बहुत सोच-समझ के करिए कि अंदर पछतावा न हो। बिना जांचे करेंगे तो कभी न कभी पछतावा खड़ा हो जाएगा; जांच कर आगे बढ़िए — आप किसी को ताकत दे रहे हैं, किसी को बल दे रहे हैं, उसे बलशाली बना रहे हैं। आपने मना किया क्योंकि मैं जांचूंगा तब करूंगा — इसमें पछतावा नहीं होना चाहिए। ऐसे तो आपको हजारों फोन आ जाएंगे; आप कोई ट्रस्ट तो हैं नहीं, आपका बैकग्राउंड उतना नहीं है कि सबको दे सको — हजारों के फोन आएं तो चाह के भी नहीं दे पाओगे। तो पछतावा नहीं होना चाहिए; जितना कर सकते हो करो, जितना हो जाए ठीक है। फोन पर सामने से कोई जरूरत बता रहा है, तो जब पूरी तरह लगे कि हां यह जरूरतमंद है, तभी देना — नहीं तो देने का पछतावा होगा।
गलत इतना किया कि आपको 100 नंबर पर फोन कर ही देना चाहिए था; उन्हें बोलना नहीं चाहिए था — 100 नंबर की धमकी देने के बाद तो वे भाग ही गए। आपको फोन कर देना चाहिए था। और पता नहीं वे सच में अंधे थे या नहीं थे।
सही बात है। अगर आप जाके अपना बैकग्राउंड दिखा के लाइसेंस वाली बंदूक ले लो और कई लोगों को गोली मार दो, तो क्या दुकानदार पकड़ा जाएगा? तुम ही पकड़े जाओगे, बस बात खत्म। उन्हें उनकी योग्यता अनुसार दिया गया; वे उस जगह पर खड़े थे — जैसे आप आईडी दिखाओगे तो आपको टिकट दिया जाएगा, आप गलत आदमी हो या सही, उसे नहीं पता, वह कानून जाने। वैसे वे उस जगह पर खड़े हैं — आपकी योग्यता हो जाएगी तो आपको दे देंगे, आप क्या करते हो आप जानो।
चुप रहने का मतलब है आप अपने काम की बात करिए, बेमतलब की बातें करना बंद कर दीजिए। आप बेमतलब की बात कर रहे हैं जिसका आपके जीवन में मतलब ही नहीं है — वे बातें करना बंद कर दीजिए और अपने काम की बातें करिए। उससे लाभ होगा।
अगर आप पूछ रहे हो कि मैं कौन हूं, तो उसका जवाब आपके अंदर ही है — आप एक परेशान इंसान हो। तो अब इस परेशानी से दूर होने के लिए काम करो। अपनी परेशानी से दूर होने के लिए काम करो, और किसी को तो परेशान न करो।
जरूरतमंद मतलब — आपने भोजन दिया, उसने उसका उपयोग कर लिया; कपड़ा दिया, पहन लिया; दवा दी, खा ली; बीमार है, घाव लगा है, आपने मलहम लगा दिया — आपके सामने ही वह जरूरतमंद है। कोई गिर गया, आपने उठा के हॉस्पिटल पहुंचा दिया — वह जरूरतमंद है। आप जा रहे थे, किसी को लिफ्ट दे दी — वह जरूरतमंद है। यह जरूरतमंद है।
अब यह हो तो पता चलेगा — एक्सीडेंट हो तब पता चलेगा ना। अभी इतिहास में किसी आत्मज्ञानी के साथ ऐसा हुआ नहीं कि एक्सीडेंट हुआ और कोमा में गया। हां, कैंसर वगैरह हुए, लेकिन कोमा वाली स्थिति अभी तक मैंने तो देखी नहीं।
किसने आपको यह बताया कि दुर्योधन स्वर्ग में बैठा था? टीवी सीरियल ने? पांडवों ने आकर जमीन पे बताया था कि मैंने दुर्योधन को स्वर्ग में देखा? गए तो गए — स्वर्ग में गए, यह किसी का एक अनुमान था; लेकिन देख के कौन आया?
जैसे आप यहां लेते हैं, एक काढ़ा लीजिएगा, और 12 बजे के बाद मूंग और चना — काढ़ा कैसे बनता है, वह यहां महाराज आपके सामने बनाकर बता देंगे, देख लेना। और यह तो पक्का-पक्का करिएगा — जब आप भोजन लें, दुनिया में कहीं भी रहें, एक बार थाली मिले, न छोड़ना है न मांगना है। और काम की बात करना; जब भी बात करना तो अपने से पूछ लेना कि यह मैंने काम की की या बिना काम की। बिना काम की की, तो फिर दोबारा मत करना — एक बार गलती कर दिए, लेकिन दोबारा मत करना। फिर जब मन हो, कभी भी आ जाइए।
क्योंकि वह 'मेरा' बालक है — बस इसीलिए आप परेशान हो। जहां भी 'मेरा' का भाव होगा, उसे कुछ भी होगा, तकलीफ होगी, तो आपको परेशानी का सामना करना पड़ेगा — चाहे मानसिक ही हो।
अगर ऐसा विचार आए तो समझ लेना कि मैं खत्म हो चुका — फिर बस जिंदा लाश बनके यहीं रहो। आप तो मर गए, खत्म हो गए — यह आपके लिए अच्छा ऑप्शन है। जिसको भी ऐसा विचार आए, भैया, समझ लेना — यहां 'खत्म' वाले ही रहते हैं; यहां जीवंत आदमी रह सकता है, जिसे कुछ नहीं चाहिए। यह जगह आपके लिए है — यहां आ जाओ, फर्स्ट क्लास रहो, यहां की व्यवस्था में जियो; आपको कुछ सोचना ही नहीं है, क्योंकि आप खत्म हो चुके हो, सोचने के लिए मैं हूं। और जो दुख-पीड़ा थी, वह यहां कहां? जिसे दुख और पीड़ा होती थी, वह आदमी तो गया ना, खत्म कर दिया — अब तो वह नया जीवन है, नया बालक है।
हफ्ते में एक दिन, जैसे उपवास रखते हैं, वैसे सुबह से रात तक अपने को पूरी तरह खाने को दो — समोसा, वड़ा पाव, आइसक्रीम, जो भी आपको खाना हो; बस शरीर अस्वस्थ न हो — जो शरीर को नुकसान पहुंचाए, वह मत खाना। उस दिन बस एक ही काम है — आज मेरा दिन है, स्वाद भरा भोजन करना; खूब खिलाओ, रोकिए मत, लेकिन हफ्ते में एक दिन। बाकी दिन शरीर की जरूरत में खाओ — शरीर को स्वस्थ रखने के लिए, शरीर का उपयोग करने के लिए खाओ, उस हिसाब से खाना पड़ता है; जरूरत के लिए किए भोजन में भी स्वाद मिल जाता है। एक दिन पूरा स्वाद के लिए जियो, फिर धीरे-धीरे आप इससे निकल जाएंगे।
यही तो गलती आप लोग करते हैं। रात को हल्का भोजन किया और सो गए, तो पता कैसे चलेगा? सुबह उठकर फिर दिन भर खाने लगोगे, भूख का एहसास ही नहीं होगा, और सुबह उठ के फिर टूट पड़ते हो। दिन भर हल्का भोजन होना चाहिए और रात को भरपूर, क्योंकि खाकर आप सोने वाले हो, तो शरीर अच्छे तरीके से पूरा पोषण ले लेगा, और सुबह खूब भूख लगेगी — दिन भर भूख का एहसास करो, शरीर को पोषण मिल चुका है। इसीलिए हमने बहुत कुछ समझ के यहां ऐसा सिस्टम रखा है। आप पतले भी हो जाओगे।
काम करने के लिए? यहां कौन चौका-बेलन करता है, कौन किसानी करता है? वह उनके लिए बोला गया है जो दिन भर शरीर से खूब मेहनत करते हैं। यह व्यवस्था मैं साधक के लिए बोल रहा हूं; आप किसानी करते हैं तो यह आपके लिए नहीं, चक्कर आने लगेगा। घर पर भी फॉलो कर सकते हैं, अगर शारीरिक मेहनत ज्यादा नहीं, बुद्धि के स्तर की मेहनत कर रहे हैं; शरीर से खट रहे हैं तो भोजन खूब चाहिए, नहीं तो शरीर टूट जाएगा। यह सिस्टम इसलिए रखा कि जब भूख है तो आप भोग की तरफ नहीं जाओगे। आदमी कितना भी कामी हो, उसे एक हफ्ते तक पानी-भोजन मत दो, फिर भोजन और भोग दोनों की व्यवस्था कर दो — वह सबसे पहले भोजन ग्रहण करेगा, भोग बाद में। इसलिए भोजन कम करेंगे तो ध्यान भोग पर न जाकर भोजन, शरीर और अपने आप पर जाएगा, और आत्मिक चिंतन बहुत तेजी से बढ़ेगा — इंद्रियां कमजोर होंगी, भोग की ताकत ही नहीं रहेगी। आपको क्या लगता है ज्यादा खा के स्वस्थ हैं? नहीं, कम खा के स्वस्थ रहेंगे, बल बढ़ेगा। एक हफ्ते कम भोजन करके देखिए — कम नींद आएगी, कम आलस्य आएगा, ऊर्जावान महसूस करेंगे; ज्यादा भोजन में नींद और आलस्य रहेगा। आप आजमा सकते हैं।
यहां मिलेगा ही नहीं, और याद भी नहीं आता होगा। मेरे पास आप रहने के लिए आ जाएं और फिर भी आपको कोई सताए, तो फिर आप मेरे पास नहीं आए। मेरे पास आने के बाद, मेरे सामने बैठने के बाद अगर आपको कोई सता रहा है — यादें, चाय, कॉफी, नाश्ता, कुछ भी — तो आप मेरे पास नहीं आए। चमत्कार नहीं है। आपको नहीं लगता कि आप खुद एक चमत्कार हैं?
नहीं, कुछ नहीं, एकदम। मैं तो एक ही बात कहूंगा — खाओ, पियो, मस्त रहो, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ, बस बात खत्म। ईमानदारी, सत्कर्म के साथ, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करके खाओ और पियो, मस्ती में जियो और उस परम सत्ता तक पहुंच जाओ — यह पक्का है। आप यहां जीने के लिए आए हैं, मस्ती के लिए आए हैं — वह करके निकल लो। यहां आप दुख भोगने नहीं आए, अशांति के लिए नहीं, घुटन के लिए नहीं — जीने के लिए आए हैं। जिंदगी जीने के लिए मिली है, मस्त जियो।
नहीं, वह तो आपकी छुट्टी है; उस दिन आप क्या करोगे — सालों-साल नहीं कर पाओगे। आप अपने लिए विशेष समय निकालिए, और लगातार कुछ महीनों तक — बच्चा मां के गर्भ में 9 महीने रहता है, तो 9 महीने निकालिए, इतना तो निकालिए। आप कमा के रखिए, फिर उसे खाइए — किसी पर निर्भर क्यों हो? 9 महीने के लिए यहां चले आना।
यह मेरी इच्छा है; जैसे हम कमाते हैं। आपसे उचित लेना भी मेरे को अच्छा नहीं लगता। मात-पिता-गुरु के यहां कभी देना ही नहीं चाहिए; अगर आपने दिया तो गड़बड़ है — फिर आप उसे गुरु नहीं समझ रहे हैं। क्या आप माता-पिता को अपने खाने का पैसा दे सकती हैं? कभी नहीं। आप उनके कार्य में सहायता कर सकते हो, लेकिन उन्हें खाने का पैसा नहीं दे सकते। मात-पिता और गुरु आपसे कभी उम्मीद भी नहीं रखेंगे; अगर उम्मीद रखें, तो वे मात-पिता-गुरु हैं भी नहीं।
मां हमेशा ज्यादा भोजन कराती है, टाइम से ज्यादा-ज्यादा खिलाती है, ताकि आप हष्ट-पुष्ट रहो, शरीर से मेहनत करो, पैसा कमाओ। गुरु हमेशा कम भोजन कराता है कि आप शरीर से कमजोर रहोगे तो आत्मिक चिंतन होगा और आपकी यात्रा आगे बढ़ेगी। आपका कम खाना मतलब आपका हित है। मां कम खिलाए तो आपको चक्कर आने लगेगा — मां ज्यादा ही खिलाएगी, क्योंकि मां संसार के लिए बनाती है, और संसार में शरीर की ताकत चाहिए। गुरु परमात्मा के लिए बनाता है, तब वह आपको पवित्र करता है। दोनों की जरूरत है।
मैं बच्चों से कहता हूं — बेटा, शादी जरूरी नहीं; सबसे जरूरी खाना, नींद और पानी है, शादी तो जरूरी नहीं। जीवन में अपना फैसला खुद लेना; पहले देखना कि जरूरी है कि नहीं, करना तो जरूरी नहीं है। अब जो कर लिए, तो कर लिए — अब तो उलझ गए; वह भी तो फंस गई होगी, वह भी तो पछता रही होगी। और अगर पत्नी कहे कि जिम्मेदारी से भागना था तो शादी क्यों की — तो सही बात है, वह अपनी जगह सही है।
जब तक मैं रहूं — फिर जाना कहां? जितना हो सके, ज्यादा से ज्यादा समय देना चाहिए। अभी नहीं रह सकते तो बीच में आते-जाते रहो, आते-जाते रहो — जितना हो सके, ज्यादा से ज्यादा समय दो।
ईमानदारी, सत्कर्म और योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग — यह मूल मंत्र है। अगर इतना आप अपना लो, तो आपका आत्मिक कल्याण भी पक्का हो जाएगा और देश सेवा भी हो जाएगी। बस इतनी सी बात अपना लो, लेकिन पक्का — 100% नहीं, 101%: 100% समाज ने दिया, 1% आपका — 101% ईमानदारी, तब।
करता कौन है, यह बताओ? आज तक किसने मेरी सेवा की, यह बताओ? मेरी कोई सेवा कर सकता है? साथ रह ले इतना ही — सेवा क्या करेगा? मेरे साथ जाग ले, वही बहुत बड़ी बात है। सेवा आप शरीर की कर सकते हो, आत्मिक नहीं — शरीर की तो फॉर्मेलिटी कर सकते हो; आत्मिक सेवा इतनी आसान नहीं है।
भावनाओं से किया गया सेवा आत्मिक सेवा है — प्रेम की सेवा, बिना इच्छा-अपेक्षा के। बनावटी भाव नहीं चलेगा कि 'हां, आज मैं कर रहा हूं'; ऐसा भाव कोई बना थोड़ी सकता है — वह पहले से अंदर होता है, स्वभाव होता है; पिछले जन्म का अधूरा इस जन्म में पूरा हो रहा हो, कुछ भी हो सकता है। आपने देखा, कभी आप लोगों ने मुझसे कुछ मांगा तो मैं भोजन छोड़ के भी देने के लिए चला आता हूं। जो शरीर के स्तर पे जीता है, वह आत्मिक स्तर पर सेवा नहीं कर सकता।
मेरे लिए कुछ नहीं था, बस ऐसे ही। अगर मैं भोजन कर रहा हूं और आप मुझसे कुछ मांगें, तो मैं उठ जाऊंगा — मेरा अगला कौर देने के बाद ही जाएगा, आप मना करोगे तो भी। लोग सिखाते हैं खाते समय उठना नहीं चाहिए — वे जानें; मैं आपके लिए उठ रहा हूं। आपने एक गिलास पानी मांगा तो उठना मेरा कर्तव्य है। सर्वप्रथम मानवता होनी चाहिए; भोजन तो बाद में भी हो सकता है, उतना मेरे शरीर में है, अभी चल जाएगा। एक गिलास पानी देके मैं फिर बैठ जाऊंगा। मैंने सबसे पहले मानवता को देखा है और जरूरत को देखा है — अगर किसी के काम आ सकता हूं तो पहले काम आऊंगा; किसी को इंतजार करवाना मुझे अच्छा नहीं लगता, जितना जल्दी हो सके कर दूं कि आप खुश हो जाओ। जो कहता है भोजन करते वक्त उठना नहीं चाहिए, अगर निवाला डालते ही उसका बेटा तड़प के मरने लगे, तो क्या वह नहीं उठेगा? तुरंत उठेगा। ये सब बोलने में अच्छा लगता है; नियम ऐसा न बनाओ कि आपकी मानवता चली जाए — एक बार मानवता गई और दानवता आई, तो आप गिर जाओगे। दानव और पशु पहले खुद खाता है, बचा हुआ दूसरे को; पशुओं को चारा डाल दो तो मजबूत कमजोर को हटा के पहले खाएगा। मानव कहता है पहले तुम खाओ, बाद में मैं — मानव बांट के खाता है। यह गुण आप में है तो आप मानव हैं, नहीं तो दानव, और आपका जीवन पशुओं जैसा है।
(पशुओं को) नहीं बेचना चाहिए। जो लोग दूध निकालते हैं, उन्हें बुढ़ापे में भी उन्हें रखना चाहिए। अब जिन्होंने यह लिखा है, वे इस मिशन के लिए क्या कर रहे हैं, यह देखना होगा — वे कितनी गायों को पाल रहे हैं, कितनी गायों को बीफ के लिए जाने से बचा रहे हैं — यह देखना पड़ेगा।
देख के भागते थे, या खड़े हो जाते थे — पास ही नहीं आते थे। उन्हें लगता था ये है कौन; वे खुद डरते हैं। हर जीव तभी वार करेगा जब पक्का हो जाएगा कि वह आपसे ताकतवर है; वह आपको नहीं समझ पाएगा तो आपके आसपास भी नहीं आएगा — तो मेरे आसपास भी नहीं आते थे। अभी भी ऐसा होता है — कुत्तों का तो कम हो गया, लेकिन गाय-भैंस वगैरह अभी भी भागती हैं, पता नहीं क्यों।
सब कुछ खत्म करके, हमने बस अपने आप को रखा, और कुछ भी नहीं। मैं सबसे नहीं हूं, मुझसे सब है — तो मैं किसी को क्यों रखूं? जहां मैं जाऊंगा, सब है। सर्वप्रथम पहले मैं, बाद में कुछ और हो तो भी ठीक, न हो तो भी ठीक। मैंने अपने आप को गिराने के लिए कभी किसी को पकड़ा नहीं; मेरा स्तर उठेगा, तभी मैं किसी के साथ आगे बढ़ा। मेरे साथ कोई चलता भी था, तो — इस तरीके से चलोगे तो चलो, नहीं तो तुम कहीं और हम कहीं — एकदम साफ-साफ, सीधा बोलता था। कल बोलने से अच्छा आज बोल दूं, एक दिन का समय आपके साथ क्यों बर्बाद करूं। दबाव और संकोच में कभी जीवन नहीं होना चाहिए; अगर हुआ तो आप भ्रष्ट हो जाओगे। जहां दबाव-संकोच हो, उस व्यक्ति, उस जगह का त्याग कर दो — या तो वहां खुलकर बात करो, और नहीं कर पा रहे तो उस जगह से हट जाओ; वहां आपका स्तर गिरेगा, उठेगा नहीं। कोई भी हो सामने, दबाव-संकोच में कभी बात मत करो; करना पड़ रहा है, तो तुरंत, जल्दी से जल्दी उस जगह, उस व्यक्ति का त्याग कर दीजिए, चाहे कुछ भी हो जाए — नहीं तो वह आपको भ्रष्ट कर देगा, गिरा देगा, कमजोर, लाचार, मजबूर बना देगा। इस दुनिया में कोई भी हो, क्या फर्क पड़ता है।
आपसे प्रभावित है, तो आपने उसे कुछ दिखाया है, दिया है। वह देना बंद कर दीजिए, वह नहीं आएगा — वह आपके लिए आ ही नहीं रहा है, लेने आ रहा है। वह देना बंद कर दीजिए और उससे मांगना चालू कर दीजिए — अब इतने दिन हमने आपको दिया, अब आप मेरी जरूरत पूरी करो। निकलना है तो यह करना पड़ेगा; नहीं निकलना है तो कोई बात नहीं। वाइब्रेशन भेजने जैसा कुछ नहीं है; मैं तो कह रहा हूं निकल लो, बस खत्म करो — आप मांगना चालू कर दो, वह आना छोड़ देगा, सीधी सी बात है।
आपके अंदर ना तो अच्छाई है ना बुराई है — दोनों है ही नहीं। ये आपने धारण किया है — इच्छा और अपेक्षा। जब तक इच्छा-अपेक्षा है, तब तक आपके अंदर अच्छाई भी है और बुराई भी है, दोनों। और इच्छा-अपेक्षा से मुक्त हो गए तो आपके अंदर ना अच्छाई ना बुराई — सिर्फ आप। तो ये दोनों इच्छा और अपेक्षा की वजह से हैं, अच्छाई भी और बुराई भी।
आना जरूरी नहीं। अगर आप अच्छाई में जा रहे हो — अगर आपको सब्जी लेनी है तो आपने कहा "ये नहीं, ये दे दो" — तो आपको बुरा देखने की क्षमता है। पहले आपने बुरा ही देखा, क्योंकि अच्छे को लेना है, बुरे को छांटना है। तो आपकी नजर बुराई पे रहती है, क्योंकि बुराई से हमें बचना है, और अच्छाई हम धारण करते हैं। अगर खराबी क्या है ये पता नहीं होता तो आप छांटती कैसे? ये जांचने की क्षमता आपकी पहले से थी; आपने उस पे भरोसा किया, वह आपकी गलती है, वह अलग बात है। अब आपको समझ आ गया कि खुद पे ही भरोसा करना है — देख लो क्या करना है। आपके अंदर दोनों नहीं हैं — ना अच्छाई है ना बुराई है; सिर्फ तुम हो और आनंद है। बस ये लेन-देन में आता है।
नहीं, ऐसा नहीं है। अच्छाई के चक्कर में बुराई नहीं है। हमें समाज सिखाता है कि तुम्हारे लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है। जैसे समाज सिखाता है कि ये शुद्ध जल है या गटर का जल है — क्योंकि गटर का पानी पियोगे तो तबीयत खराब हो जाएगी। अगर समाज शिक्षा नहीं देता तो मैं गटर का भी पानी पी लेता। आज जितनी भी जानकारियां हमारे पास हैं, जीवन जीने के लिए हैं; लेकिन आप उससे दूसरे को नीचे दिखाने के लिए जीने लगे — गड़बड़ ये हो गई। आपको अच्छाई-बुराई का परिचय इसलिए कराया गया था कि आप उचित तरीके से जीवन जिएं। सांप की पहचान इसलिए कराई गई कि और जानवर की तरह सांप को हाथ मत लगाना, नहीं तो काट लेगा; शेर का परिचय इसलिए कि हिरन को गले लगाते हो, शेर को मत लगा लेना। और पहले आपको बुराई बताई गई, अच्छाई नहीं — जितने भी जहरीले जानवर हैं, जिनसे खतरा है, उसकी जानकारी आपकी मां ने पहले दी, क्योंकि अच्छे से डरने की जरूरत नहीं है। पहले बुरे की जानकारी दी गई ताकि आप उचित तरीके से जीवन जी सकें।
नहीं, ऐसा नहीं है। समाज इसलिए खराब नहीं हो रहा है। कोई भी व्यक्ति अगर खराब हो रहा है तो अपने लालच से। समाज में दो चीजें हैं — एक लालच और एक फ्री में पाने की इच्छा, मतलब योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा। ये जब तक रहेगी, आप भटकते रह जाओगे। ये दो चीजें अगर आपके अंदर हैं तो दुनिया में कहीं भी भटकोगे; और दोनों नहीं हैं तो आप भटक भी नहीं सकते और आपको कोई भटका ही नहीं सकता। इन दो के साथ जिंदगी नर्क है; जिंदगी से ये दो हटा दो तो फिर आनंद ही आनंद है। यहां भी फ्री में कुछ नहीं है — यहां साधक के लिए व्यवस्था है; आप साधना कर रहे हैं इसलिए आपको मिल रहा है, मतलब आप मेहनत की रोटी खा रहे हैं। यहां मुफ्त का कोई खा ही नहीं पाएगा, मुफ्त वालों को मैं तुरंत भगा देता हूं। मैं कभी फ्री वाली लाइन में खड़ा नहीं होता, और लोगों से यही कहता हूं — लालच में फ्री में पाने की इच्छा कभी मत करना, अगर किए तो लूट लिए जाओगे।
देखिए, वे किस स्थिति में कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, उसके पीछे क्या है — पूरा जांचना पड़ेगा। अभी मेरे पास एक डॉक्टर आए थे। बोले मैं एक ट्रस्ट में जाता हूं, फ्री में इलाज करता हूं — ट्रस्ट ₹50 लेता है, मैं बाहर 500 लेता हूं। लेकिन वहां गड़बड़ी ये है कि वे लोग बोलते हैं इस कंपनी की दवा लिखो, महंगी से महंगी दवा लिखो। तो पूरी तरह जांचना पड़ेगा कि व्यक्ति किस उद्देश्य को लेकर काम कर रहा है, पूरे सिस्टम को देखना पड़ेगा, उसके साथ कुछ दिन रहना पड़ेगा। हमने उन्हें सलाह दी कि उस ट्रस्ट को छोड़ दीजिए। आप में योग्यता है, आप डॉक्टर हैं, आपके पास डिग्री है — कुछ समय पेड़ के नीचे ही बैठ जाओ, बोर्ड लगा दो "निशुल्क सेवा" और अपनी डिग्री लिख दो; हफ्ते में एक-दो दिन, जब टाइम मिले, लोगों का निशुल्क इलाज करो। उनका दुरुपयोग किया जा रहा था। फ्री में नहीं — ये निष्काम सेवा हुई।
जरूरतमंद को हमें फ्री में देना चाहिए, अगर हमारी सामर्थ्य है। देखो, जीवन बहुत रहस्यमय है, इसे बहुत गहराई से समझो। मैं एक तरफ यह भी कह रहा हूं कि फ्री में पाने की इच्छा छोड़ो, और एक तरफ ये भी कह रहा हूं कि जरूरतमंद की सेवा करो। फ्री में पाने की इच्छा छोड़ने की बात मैं उन्हें कह रहा हूं जो सामर्थ्यवान हैं — वे कर सकते हैं, तो फ्री में पाने की इच्छा क्यों करते हैं? और जो नहीं कर सकता, अगर मैं उस लायक हूं तो मुझे उसकी सहायता करनी चाहिए। वहां फ्री की बात ही नहीं है, वहां सिर्फ एक जरूरत है। कोई गिर गया, आप उसे उठाकर अपनी गाड़ी से हॉस्पिटल पहुंचा रहे हो — क्या उसका भाड़ा लोगे? वहां मानवता हो गई, वहां पैसे की बात ही नहीं है। लेकिन एक आदमी कह रहा है कि मैं जा सकता था, लेकिन मुझे उठाओ, गाड़ी में बैठाओ, फ्री में छोड़ो — तो नहीं छोड़ना है। हमारी जैसी सामर्थ्य है, हमें जरूरतमंद की सेवा करनी चाहिए — चाहे धन से, चाहे तन से, चाहे ज्ञान से। रास्ते में कोई रास्ता बताता है या पानी पिलाता है, तो क्या वहां पैसे की बात कर सकते हो? वह फ्री में भी नहीं दे रहा, और वहां पैसा पूछ भी नहीं सकते। जीवन बहुत समझ के जीना है, फिर आपको कोई ठग नहीं पाएगा।
यहां मानवता की बात आ गई, यहां फ्री की बात नहीं आई, क्योंकि सामने वाले ने कहा भी नहीं। और ये कहने के बाद भी अगर आपको संकोच है तो वह आपका है — संकोच आपका है क्योंकि आप उनको कुछ नहीं दे पा रहे। एक व्यक्ति ने मना कर दिया कि "आपका आशीर्वाद बहुत है", फिर भी आपको लग रहा है कि अब मैं उनसे काम नहीं करवा पाऊंगा — तो कहीं ना कहीं आपका अहम काम कर रहा है। उसे सेवा का मौका दीजिए ना। ऐसे व्यक्तियों को सेवा का मौका दो।
वो माता जी भी तो जरूरतमंद थीं ना। पैसे दे सकती थीं, लेकिन यहां पैसा चलता नहीं। और समझिएगा — उन्होंने माता जी को नहीं देखा, माता जी को वे जानते भी नहीं; उन्होंने मेरे जीवन को देखा है, मेरे त्याग को देखा है। एक बार मैं ऐसे ही जा रहा था तो नदी में गिर गया और मेरी उंगली पत्थर से कट गई, खून निकल रहा था, जेब में एक रुपया नहीं। परिक्रमा मार्ग में किसी से परिचय हुआ था, बोले चलो, इलाज का पैसा हम दे देंगे। दवाखाने में पट्टी बांधी, पूछा कितना हुआ, तो डॉक्टर बोले मैं परिक्रमावासी से पैसा नहीं लेता। मैंने कहा मैं परिक्रमावासी नहीं हूं, भ्रमण कर रहा हूं। बोले नहीं, आपसे भी नहीं लेंगे। मैंने कहा ठीक है, मत लो, आपकी मर्जी — बात खत्म। फ्री में पाने की इच्छा मतलब आप रिक्वेस्ट करते हो, दबाव और संकोच में जाते हो; आप रिक्वेस्ट करोगे तो सामने वाला फिर आपका दुरुपयोग करेगा। बात ये है — लालच में फ्री में पाने की इच्छा छोड़ दीजिए।
ले कौन रहा है? आपने पूछा सांस लेने वाला सत्य है या सांस सत्य है — मतलब लेने वाले को आप जानते हो तभी पूछा? आपने ये तो नहीं पूछा कि लेने वाला कौन है, सांस क्या है। आपको लेने वाले का पता नहीं, तो पहले लेने वाले का पता करना चाहिए; लेने वाले का पता लग जाएगा तो सत्य का पता लग जाएगा, बात ही खत्म हो गई। अपनी समझ से प्रश्न करिए — हम दूसरों की समझ से प्रश्न करते हैं, हमारी गलती यही है। उत्तर तब समझ में आएगा जब आपको प्रश्न समझ में आएगा। जैसे कोई छह-सात साल का बालक "विवाह-विवाह" सुनकर मम्मी-पापा से कहे मेरा विवाह करा दो, और करा भी दिया — अब वह करेगा क्या? पहले उस लायक, प्रश्न के लायक तो बनो, तब उत्तर समझ में आएगा। एक व्यक्ति ने तोता रखा था जो चिल्लाता था "मुझे मुक्त करो"; पड़ोसी ने उसे खोल दिया, वह ऊपर गया और वापस पिंजरे में बैठकर फिर कहने लगा "मुझे मुक्त करो" — कई बार ऐसा हुआ। यही हाल लोगों का है — प्रश्न का पता नहीं, प्रश्न पूछना है। सांस मतलब एक हवा है — ऑक्सीजन बाहर थी, अंदर गई, फिर कार्बन डाइऑक्साइड निकली; उसको हमने सांस का नाम दिया है। उसके पीछे कोई ले रहा है ना? तो सांस कैसे सत्य हुआ? मुझे क्या पता कौन ले रहा है, लेकिन कोई तो है — बस देख लो कौन है।
बस वही आप देख लीजिए, आप खुद महसूस करिए उस क्षण को, उस पल को। वह क्षण भर इसलिए रहता है क्योंकि आपको बाहर भी जाना है। अगर आपको पलटना नहीं होता तो आप टिक जाते, स्थिर हो जाते। आप आगे भी बढ़ते हो पीछे जाने के लिए — जहां जाते हो वहां का थोड़ी देर आनंद होता है, लेकिन फिर वापस जाना है ना। बाहर तो बाहर ही है; तुम ही तो वापस जा रहे हो, थोड़ी देर ही रह पाते हो, फिर कहते हो "चलो बाहर देख लेते हैं।" बढ़ाया जा सकता है — बाहर आओ ही मत। वो तो आपके ऊपर है; आप बाहर आ ही क्यों रहे हो? बाहर कुछ नहीं है फिर भी इतना भटक रहे हो, कुछ होता तो क्या करते!
मेरे समझ से वह कॉपी किसी जरूरतमंद को दे दीजिए। माता जी, वह कॉपी पैसे से आती है — किसी पढ़ने वाले बच्चे तक पहुंचा दीजिए ना। आखिर बाद में उसको विसर्जित ही किया जाता है; फिर स्याही भी गई, पेन भी, आपका समय भी गया। काश उतनी देर आप कहीं सत्कर्म में लग जातीं। कुछ नहीं तो आटा और शक्कर भूनकर पेड़ के नीचे चींटियों को दाना डाल दीजिए और उन्हें खाते हुए देखिए। आपके दो बच्चे हों — एक आपका नाम लिखता रहे और एक आपका सारा काम करे — तो आप किस पे प्रसन्न रहेंगी? कहेंगी "तू तो कुछ कर भी नहीं रहा, और कॉपी-पेन का पैसा भी बिगाड़ रहा है।"
वहां बात ये थी कि गाय दूध नहीं देती थी — ऐसी गाय कोई लेकर क्या करेगा? आपकी जरूरत की नहीं है, ठीक है; अगर किसी और की जरूरत की है तो दे दीजिए — जरूरतमंद को दे रहे हैं तो वह सत्कर्म में आएगा। लेकिन आपको ये समझ में आना चाहिए कि वह उसके काम का है या नहीं — ये भी देखना है। अगर पता चला कि आपके काम का भी नहीं है और उसके काम का भी नहीं है, फिर भी आप दे रहे हैं — तो नचिकेता के पिता के साथ यही बात हो गई थी: उनके काम का तो नहीं था, लेकिन लेने वाले के भी काम का नहीं था। इसलिए नचिकेता ने मना किया, तो पिता ने कहा "जा, तुझे भी दान देता हूं — यमराज को।"
दर्शन इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्त होना है। मंदिर में एक प्रतिमा बनाई गई और उस प्रतिमा को सामर्थ्यवान बनाया गया। मंदिर शांति का केंद्र है — गांव में कोई ऐसी जगह हो जहां सब बैठ सकें, क्योंकि सबके घर पे सब जाकर नहीं बैठ सकते। आज भले उसे व्यापार का अड्डा बना दिया, वह आपकी गलती है। उस प्रतिमा के यहां कोई माथा टेके, चाहे कुछ भी करे, कोई मान करे या अपमान करे — वह अपना काम कर रही है, स्थिर है। वैसे ही मंदिर से हमें यह सीखना चाहिए कि समाज में आकर मुझे अपना काम करना है — ना मुझे अच्छे के साथ जाना है, ना बुरे के साथ, बस अपना काम करना है। ऐसे ही पीपल, तुलसी, नीम को देव वृक्ष माना गया — पूर्वजों को पता था कि आने वाले समय में हमारे बच्चे पेड़ काटेंगे, जबकि इन्हीं से ऑक्सीजन लेते हैं, स्वस्थ रहते हैं; तो इनको देव वृक्ष कह देंगे तो कम से कम काटेंगे तो नहीं। वह डर आपके लिए लाभदायक है। ये 24 घंटे ऑक्सीजन देते हैं; जितनी ऑक्सीजन एक बड़ा वृक्ष देता है उतनी छोटा-सा तुलसी का पौधा देता है, इसलिए हमारे पूर्वज लगाते थे कि आपका स्वास्थ्य सही रहे। उन्हें पता था कि हम भोग-भोजन में फंसे रहेंगे, अपने स्वास्थ्य का भी ख्याल नहीं रहेगा, इसलिए उसे देवी बता दिया।
आती है, तभी ना करते हैं; सुनते हैं, तभी आज तक प्रार्थनाएं चल रही हैं। अगर उसमें ताकत नहीं होती, केवल आपकी श्रद्धा में होती, तो आप पहाड़ पे खड़े होकर कहीं भी कर लेते, मंदिर क्यों जा रहे हो? मंदिर की मूर्ति निमित्त बनती है आपकी ऊर्जा को जागृत करने का — बस बात खत्म। जैसे अभी कहा जाए कि खट्टा लार बनाओ, तो नहीं बना पाओगे; लेकिन आम या अचार दिखा दूं, बोलूं भी ना, तो तुरंत खट्टी लार बनने लगेगी। विचार अंदर नहीं है, विचार बाहर से आता है, पांच इंद्रियों द्वारा हम ग्रहण करते हैं। अंदर कुछ नहीं है — अंदर तुम हो, शरीर एक मशीन है; बस आपको जानकारी है, और जैसी जानकारी है वैसा आप काम करते हो, वैसी आपकी ऊर्जा जागृत होती है। तो प्रतिमा ऊर्जा को जागृत करने का एक तरीका है। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा तेरा भगवान कहां है, तो प्रह्लाद ने कहा सर्वव्याप्त है; फिर पूछा क्या इस खंभे में है — बोले हां। अगर खंभे में भगवान होता तो दुनिया के जितने खंभे तोड़े जाते सब में भगवान निकलता। प्रह्लाद के भाव में था — इसलिए कहा गया "भावे विद्यते देवा", भाव में ईश्वर का वास। उन्हें खंभे से साकार रूप लेकर निकलना पड़ा, और उस रूप का पता प्रह्लाद को भी नहीं था — वे भयभीत होकर कांप रहे थे, और उनका इष्ट ही उन्हें गोद में लेकर सहला रहा था।
साकार रूप में ही तो सब बैठे हैं — नहीं हैं क्या? देख पाए तो है, नहीं देख पाए तो नहीं है। जब जरूरतमंद की सेवा आप करते हो, उस समय आप उसके लिए भगवान होते हो, और फिर वही आपको धन्यवाद भी देता है — भगवान भी उसके अंदर से निकलता है और आपके लिए आशीर्वाद भी निकलता है। वह कैसे आशीर्वाद दे सकता है? वह नहीं, अनंत से ऊर्जा आपके लिए सीधा आ रही है — और तब तक आएगी जब तक उसकी जरूरत पूरी नहीं होगी; जैसे जरूरत पूरी हुई, ऊर्जा आना बंद। ऐसे ही धीरे-धीरे आप भगवान बन जाते हो, और फिर भगवान परमात्मा की यात्रा करता है।
भगवान एक पद है — जैसे शिक्षक एक पद है, ड्राइवर एक पद है, इंजीनियर एक पद है। भगवान किसे कहा गया? ताकतवर को। तो वह फिर उस परम की, जहां से वह है, उसकी यात्रा करता है। अभी तो यात्रा थोड़ी ना हो रही है — अभी तो हम अपने आप को निकालने की बात कर रहे हैं। अभी तो अनेक पिंड से, राग-द्वेष में हम फंसे हुए हैं; उससे निकालने के लिए बातचीत हो रही है — कि मैं कैसे अपने आप को निकाल लूं अशांत भरे जीवन से, राग-द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से, भ्रम से। जब निकाल लोगे, उसके बाद यात्रा की शुरुआत होगी।
मैं तो कह रहा हूं नहीं देना चाहिए। अपनी कामनाओं की वजह से वे बलि देते हैं — जैसे कामाख्या मंदिर है, कई मंदिर हैं। लेकिन मैं एक ही बात कहता हूं — मां अपने बच्चों की बलि कभी नहीं ले सकती; और ले रही है तो वह मां नहीं हो सकती, बात खत्म। ये मेरी समझ है। लोग देते हैं, वे जानें।
सब बाहर से हमारे पास आता है। मैंने कहा ना — हमारे पास कुछ नहीं है; ये शरीर है, मैं हूं। मेरे पास जितना भी है, बाहर का है; मेरे पास तो बस मैं हूं, लेकिन सब मैंने ग्रहण कर लिया। अब उससे अपने आप को छुड़ाना है। जरूरत में जीना है। मैंने सब बाहर से धारण कर लिया है — राग-द्वेष में, बड़ा बनने के चक्कर में, मान के चक्कर में "मैं कुछ हूं"; इस "मैं कुछ हूं" ने मुझे गिरा दिया, लेकिन अभी भी मैं कह रहा हूं मैं कुछ हूं। तो मुझे इससे मुक्त होना पड़ेगा — मैं कुछ नहीं हूं, इसलिए मैं हूं। और मैं कुछ हूं तो इसका मतलब मैं फिर वही परिवर्तनशील में हूं।
उससे कुछ मांगने से अच्छा है, उसे ही मांग लो — बात खत्म। प्रार्थना में उसको ही मांग लो। जब ईश्वर ही अपने पास आ जाएगा तो बाकी क्या बचा? सब कुछ आ गया, सब मिल गया — फिर उसके अलावा कुछ चाहिए ही नहीं।
ये समझ इसलिए फिसल जाती है कि आपको कुछ चाहिए। देख लो — कल आप बातचीत क्यों कर रही थीं? कुछ चाहिए था तभी ना। बात करने से मना किया गया था; कहती हो वही समझने के लिए बात की थी, तो उनसे क्यों समझना? उसके पीछे कुछ रसपान मिल रहा था, नहीं तो ऐसे क्यों बात करते? आप इनसे पूछ रहे हो कि ये मुझे कुछ बताएंगे, और ये उतनी दूर से मेरे पास आए हैं — ये बताने लायक होते तो मेरे पास क्यों आते? जब सीधा पूछ सकते थे तो वाया-वाया क्यों पूछे? और उस पूछने में आपका नियम भी टूट गया। समझ है, पर टिकती इसलिए नहीं कि मुझे कुछ चाहिए, अपने तरीके से — चाहे वह शब्द हो, दृश्य हो, रस हो, गंध हो, स्पर्श हो — समझ टिकती नहीं, वहां चली जाती है।
नहीं। वह भी प्लानिंग में ही आया — सत्कर्म भी हम इसलिए कर रहे हैं कि निकलें। जब ईमानदारी-सत्कर्म भी आपके जीवन से छूट जाएगा, तब जाकर यात्रा की शुरुआत होगी। अभी तो हमें उस प्रोसेस से गुजरना है। इस बात को समझिए — ये ब्रह्म है, ये जगत है; आप यहां आईं, फिर आपने इस जगत में अपने एक जगत का निर्माण किया। अब आपको समझ में आया कि मेरे जगत में बड़ी अशांति है, तो आप वहां से छुड़ा रही हैं — तो छुड़ाने की प्रोसेस चल रही है, यात्रा थोड़ी ना हो रही है, वह भी तैयारी चल रही है। फिर आप छुड़ाकर मूल में आएंगे — मूल मतलब अपने आप में आना, स्व में आना; वही आत्मज्ञान होगा। उसके बाद यात्रा की शुरुआत।
छुड़ाने की यात्रा कह सकते हो, आत्मज्ञान की यात्रा नहीं — क्योंकि आत्मज्ञान तो पहले से मौजूद है, उसकी यात्रा ही नहीं करनी। मूल में आने के बाद सब बात ही खत्म — वहीं से शुरुआत है; जब वहां पहुंचेंगे तब समझ में आएगा।
अभी भी मूल में हो, मूल से ही बोल रहे हो, मूल से हटे नहीं हो। लेकिन हमें वहां से कुछ चाहिए, तो पीछे आ जाते हैं ना — बस वहीं डगमगाते हैं। जितने लोग बैठे हैं, सब मूल से ही बात कर रहे हैं; कोई मूल से हटकर बात नहीं कर रहा। अगर मूल को हटा दें तो आप बोल ही नहीं पाओगे।
वहीं रुक जाइए। मत हटो ना। बाद में कोई हटा देगा — कीड़े-मकोड़े हटा देंगे, आप टेंशन ना लो, हटाने का प्रबंध तो हो ही जाएगा। ज्यादा से ज्यादा, कम से कम क्यों? उसी में हो जाइए।
अरे आप उससे आगे का करो, आगे निकलो। जान के, समझ के टिके रहना है — टिकेंगे तब, जब बाहर वापस नहीं जाना है। आंखें बंद करती हो तो फिर खोलती क्यों हो? मत खोलो ना — बंद तो बंद। मूल में तो अभी भी हो, कहीं और हो क्या? असल में हमारे साथ क्या हो रहा है — कुछ में हम वह कुछ ढूंढ रहे हैं जो उस कुछ में है ही नहीं, इसलिए हम परेशान हैं, बस इतनी सी बात है। पूर्ण अपने आप को अपूर्ण से पूर्ण करना चाहता है — यही उसकी अपूर्णता है। अगर वह इस भाव को छोड़ दे, तो वह पूर्ण है। जो कुछ है उस कुछ का उपयोग करके, जो ढूंढ रहा है उस ढूंढने से वह मुक्त हो जाए, तो अपने आप में हो जाता है।
क्यों परमात्मा की बात कर रहे हो? आप पहले अपनी बात करिए। अपने अशांत भरे जीवन से तो आप निकल नहीं पा रहे हो और परमात्मा की बेमतलब की बात कर रहे हो। परमात्मा की तो बात नहीं करनी चाहिए — जिसको हमने देखा ही नहीं, जो हमारे सामने ही नहीं, उसके बारे में क्या बात करें? कोई मतलब है?
अंदर से। मैं 2011 से घूम रहा हूं; मुझे यह जगह अध्यात्म के लिए कुछ अलग लगी। इसलिए 2019 से मैं इस जगह पे आना-जाना, रहना, सोना-उठना करता रहा, जांचता रहा — क्योंकि आने वाली पीढ़ी के लिए, लोगों के लिए काम करना था। जांचा तो लगा कि यहां से लोग अध्यात्म में बहुत तेजी से आगे बढ़ेंगे, इसलिए मैंने इस जगह पे कुटिया का निर्माण किया — जैसे दो जमीन होती हैं, एक उपजाऊ और एक बंजर। यहां इतनी शांति है कि यहां रहना भी आसान नहीं; लोग इतनी शांति बर्दाश्त नहीं कर पाते, कुछ लोग भाग जाते हैं, क्योंकि उन्हें अशांति चाहिए। आपस में बातचीत क्यों करते हैं? अशांति के लिए — इतनी शांति बर्दाश्त नहीं होती, तो जाकर पूछेंगे "आप कहां से हैं", और बात चालू। कहावत है — दो गधे मिले, लातम-लाती हुई। जीवन में व्यक्ति तब आगे बढ़ता है जब एक सिखाने वाला हो और एक सीखने वाला हो; दोनों सीखने वाले आपस में बात करें तो कुछ नहीं होगा, एक-दूसरे को अशांति और कचरा ही बांटेंगे। आप जहां गए हो, वहां के पूरे नियम में रहिए, फिर देखिए कैसे आगे बढ़ते हो। लोगों की प्रवृत्ति है कि नियम तोड़कर लगता है मैं कुछ हूं — लेकिन मैं यहां किसी को कुछ बनने नहीं दूंगा; बनके ही तो परेशान हो।
अकेले जी तो नहीं सकते, लेकिन अकेले में हो तो सकते हैं। बस अकेले में होना है। जीना तो दो में होगा — अकेले में जीवन है नहीं; जीवन तो दो में है, लेकिन अकेले में हो सकते हैं।
वे सब किसके लिए हैं? काम के लिए। आपके लिए क्या है? आपके घर में, आपके जीवन में आपके लिए क्या है? जितना है, जरूरत तक है, शरीर तक है। आपके पास क्या है — आप; पर आप भी तो आपके पास नहीं हो, आपका होना तो कहीं और है। एक तो आपके लिए कुछ नहीं है, और आप भी हो तो कहीं और हो — इसीलिए तो जीवन अशांत है। समझने के बाद अगर हो जाओ तो ठीक; पर उम्मीद छूटेगी तभी हो पाओगे, उम्मीद नहीं छूटेगी तो हो भी नहीं पाओगे — और हर तरह से उम्मीद छोड़नी होगी। सब जुटाने में आपने अपने आप को लोगों को दे दिया; जिसके लिए जुटा रहे थे, वही आपके पास नहीं है। तो जुटा किसके लिए रहे हो? मात्र संसाधन के चक्कर में आपने अपने आप तक को खो दिया — ये क्या सौदा किया?
प्यार से इतना प्यार कर लो कि प्यार किसी से प्यार करने के लायक ना रहे — शायर ने लिखा है। लायक रहोगे तो फिर जाकर कहीं और भिड़ जाओगे, कहीं और टूट पड़ोगे — यही तो आदत है। तुम लायक ही ना रहो।
आपके लिए रियल है — आपकी बात आपके लिए रियल है। अब इन्हें 1 किलोमीटर दूर भेजो तो ये भी डरने लगेंगे; यहां इनके लिए रियल नहीं है, लेकिन थोड़ा और अंदर, थोड़ा आगे जाएं तो इनके लिए भी रियल हो जाएगा। सबका दायरा है — उस दायरे में वह हर एक के लिए रियल है। और इनसिक्योरिटी की फीलिंग जो कभी-कभी आ जाती है, वह बस एक भाव है।
मूल कर्म है; कर्म ही मूल तक लेकर जाता है। उसकी कोई कृपा नहीं है; ऊर्जा अपने आप है, उससे कोई मतलब नहीं — जितना आपका कर्म है। देखो, बहुत लोग ऑक्सीजन पे जीते हैं, बोतल लगाकर ऑक्सीजन ले रहे हैं, पैसा दे रहे हैं — सीधा क्यों नहीं ले पा रहे? क्योंकि जितना कर्म किया था उतना मिल गया, अब पैसा भरो। यहां कुछ फ्री में नहीं मिलता, कोई किसी की कृपा नहीं — इस बात को समझो। उसके पीछे शक्ति किसकी? आपकी। और दर्शन से तो मुक्त होना है। जैसे एटीएम में बहुत सारा पैसा है, लेकिन जितना आपके अकाउंट में है उससे ज्यादा नहीं निकाल सकते; किसी के अकाउंट में पैसा ही नहीं है तो क्या एटीएम उसे देगी? उसमें शक्ति है, पर वह तुम्हारी शक्ति नहीं है।
मैंने जीवन में दो श्लोक सुने हैं, बस — तीसरे की आज तक जरूरत नहीं पड़ी। ये कहां लिखा है, ऐसा ही लिखा है या नहीं, ये भी कभी देखने नहीं गया; लेकिन इन दो से मेरा काम हो गया। दोनों अलग-अलग स्थिति में हैं। एक "चाहिए" में है — जब मुझे कुछ चाहिए, तब "कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा"। उस स्थिति में अगर "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" अपना लोगे तो भ्रष्ट हो जाओगे, बर्बाद हो जाओगे। और जब कुछ नहीं चाहिए, तब "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" — ये स्थिति की बात है, बात खत्म।
इसमें मदद की क्या बात है? प्रकृति उसके अनुकूल होती है। अगर कोई व्यक्ति किसी पोस्ट पे बैठा है और पूरा सिस्टम उसके लिए काम कर रहा है, तो क्या वह उसकी मदद कर रहा है? नहीं, वह सिस्टम की एक व्यवस्था है — आप चाहो या ना चाहो, उसकी जवाबदारी बनती है। जब आप प्रकृति के लिए, समाज के लिए काम करोगे, निष्काम सेवा करोगे, बिना इच्छा-अपेक्षा के सेवा करोगे, आपको कुछ नहीं चाहिए — तो पूरी प्रकृति आपके साथ है, उसे करना ही पड़ेगा, क्योंकि वह उस पद पे हो गया। और बारिश-बवंडर से उसे क्या तकलीफ — वह इससे बहुत ऊपर उठ गया।
चेतन मतलब ये शरीर — शरीर चेतन है, और इसमें आप हो, चेतन में फंस गए हो। जड़ उसे कहते हैं जो अपने से चल-बोल नहीं सकता; लेकिन इसमें भी चेतनता है, समझने के लिए हमने ऐसा कहा। पत्थर में भी चेतनता है — अगर नहीं होती तो दो पत्थर टकराने से आग कैसे निकलती? दो के मिलने से तीसरा कैसे पैदा होता? एक घटना बताता हूं — एक बार मैं नर्मदा तट पर स्नान करने गया, मेरे पैर से एक पत्थर टकराया; ऐसा लगा उसने मुझसे कहा "मुझे मुक्त करो"। मैंने अनदेखा किया, स्नान किया, जाने लगा — फिर वह आंतरिक आवाज आई "मुझे मुक्त करो"। फिर मुझे जाना पड़ा; जहां पांव टकराया था वहां पत्थर खोजा, वह पत्थर बंधा हुआ था। मैंने उसे छुड़ाया और पानी में डाल दिया — मुझे लगा मैं इसे मुक्त कर रहा हूं; ये मैंने खुद फील किया। ऐसा बहुत होता है, लेकिन हम सुनते नहीं।
वही बंधा हुआ था, उसे ही जरूरत थी। अब यहां इतने लोग आ रहे हैं — और क्यों नहीं आए? तो बाकी पत्थरों को मुक्त नहीं होना है, तो क्या करें — जबरदस्ती उन्हें तोड़ें? जिसने मुझसे कहा, मैंने उसे छुड़ा दिया — बात खत्म।
नहीं, इसको मानवता कहेंगे। अब तो देखिए, आप उसे भूल भी गए — कोई पछतावा नहीं, कुछ नहीं। कोई व्यक्ति हमें छोड़ने आया तो वह अपने घर सुरक्षित पहुंच जाए — बस, ये मानवता है, और ये होना भी चाहिए।
जानने वाला ही तो आत्मा है। बस वह जानने से मुक्त हो गया तो बात खत्म। जब तक उसे जानना है, तब तक वह बाहर है; जानने से मुक्त हो गया तो जानने वाला बचेगा — बस, बात खत्म हो गई।
आप अपना काम करिए, उसे चलने दीजिए, करने का प्रयास मत करिए। बस उससे भी मुक्त होना है — सबसे मुक्त होना पड़ेगा, अपने आप से भी। धीरे-धीरे प्रयास करो और आगे बढ़ो। दोष कुछ नहीं लगता, यहां ऐसा कुछ नहीं — आपने लिया था, आप छोड़ दिए, बात खत्म। कभी ना कभी तो छोड़ ही दोगे — जिंदा में नहीं छोड़ोगे तो मुर्दा में छोड़ोगे, छोड़ोगे तो पक्का।
आप भी उस विधि से तर जाइए, विलंब क्यों कर रहे हो? अगर उस विधि से नहीं हो रहा और ये तरीका आसान लग रहा है, अच्छा लगे, तो ये अपना लीजिए; वह अच्छा लगे तो वह अपनाकर आगे बढ़ जाइए। बैठे हैं और विचार चल रहे हैं, तो विचार चलते रहेंगे — बस उन्हें देखते रहिए। आपके ही किए गए कर्म के विचार हैं, और किसके हैं?
अगर आप ये पूछ रहे हैं तो फिर आप उस शब्द के लायक नहीं हैं। मैंने कहा था — इसके बाद अगर एक भी प्रश्न आपने किया, तो आप उस शब्द के लायक नहीं थे, क्योंकि पूछना भी तो एक उम्मीद हो गई। बहुत साफ-साफ है — उम्मीद में हम बाहर गए, उम्मीद छोड़कर अपने आप में आ गए, बस बात खत्म। इतनी सी बात है, और इसके लिए आप सालों से माथापच्ची कर रहे हो। ये फाइनल है — शुरुआत यहीं से है और आखिरी भी यही है।
तो ये आपका भ्रम है। मैंने तो कहा कि आप अपने आप को निकाल सकते हो, मैं बस मार्ग बता सकता हूं। अगर कोई विद्यार्थी शिक्षक से उम्मीद लगा ले कि ये मुझे पास कर देगा, तो ये बेवकूफी है; वह ये कह सकता है कि मुझे अच्छी शिक्षा देगा, अच्छी तरह पढ़ाई करवा देगा — प्रश्न-उत्तर तो हमें लिखना है। अगर वह उम्मीद रख ले कि शिक्षक ही उसकी परीक्षा दे देगा, तो कैसे होगा? बस, आपको निकलने का तरीका बताएंगे, उसका उपयोग आपको करना है।
नहीं, ऋण नहीं है — अगर वह साधना कर रहा है। क्योंकि उसने साधक को भोजन कराया, उस व्यक्ति को नहीं; इसलिए वह ऋणी नहीं है। हां, अगर वह साधना नहीं कर रहा है, तो वह ऋण हो गया।
पकड़ने के लिए कुछ था ही नहीं। हाथ में ही कुछ नहीं आया — इस दुनिया में ऐसा कुछ लगा ही नहीं जिसे मैं पकड़ूं। कुछ है तो आप ही बताओ — क्या है? जो भी पकड़ोगे, छूट जाएगा; तो फिर पकड़ना क्या? जो मेरे साथ ही नहीं रहेगा, उसे क्या पकड़ना? सब चेंज हो रहा है। अगर कुछ होता तो मैं जरूर पकड़ता, क्योंकि मैंने भी पकड़ने का प्रयास किया — ऐसा नहीं कि पकड़ने में मैं नहीं गया; मैंने भी गोते मारे, मैं भी कूदा, लेकिन देखा तो पकड़ने के लिए कुछ है ही नहीं। बस एक-दूसरे को पकड़ने का भ्रम है, और उस भ्रम में लोग पकड़े हुए हैं। तो भैया, इस भ्रम से हट जाओ।
बदला नहीं जा सकता — इसीलिए मैंने छोड़ दिया। मैंने उस पर काम किया, देखा कि देखा तो जा सकता है, बदला नहीं जा सकता; फिर करना क्यों? और वहीं से "कुछ नहीं चाहिए" का संकल्प हुआ। देखा उसमें नाम, शोहरत, पैसा है, लेकिन मुझे ये तो नहीं चाहिए था — मुझे काम चाहिए था, और काम उसमें था नहीं। तो मैंने कहा चलो आगे बढ़ो, इसके आगे भी कुछ है। पता चला इसके आगे तुम हो — नाम, शोहरत, पैसा के आगे भी तुम हो और पीछे भी तुम। जब आगे भी मैं, पीछे भी मैं, तो फिर इसी को पकड़ लिया जाए — वह है, वह नहीं बदलता।
आत्मज्ञानी ये नहीं चाहते कि सब सुधर जाएं। आत्मज्ञानी बस अपना काम करते हैं; जिसे सुधरना है वह आ जाता है। वे ना किसी को बिगाड़ना चाहते हैं, ना किसी को सुधारना चाहते हैं — बस अपना काम करते हैं। जैसे एक पेड़ खड़ा है, वह ये नहीं सोचता कि मेरी छांव कोई आकर ले; जिसको आना है आए, जाना है जाए — वह किसी को बुलाता नहीं।
होते ही नहीं। जैसे मान लीजिए किसी का विवाह हुआ, तो पति-पत्नी के अनेक प्रश्न होंगे — कब तक? जब तक गर्भधारण नहीं होता: कैसे हो, क्या करें, हो नहीं रहा। जब तक नहीं हुआ, जिसने जैसा उपाय बताया कर लेती — गर्भधारण के लिए। लेकिन जिस दिन गर्भधारण हो गया, क्या फिर वह किसी से वह प्रश्न कर सकती है? चाहे भी तो नहीं कर सकती — जरूरत ही नहीं। बस इतनी सी बात है।
जो भी घटित हो रहा है, वह सब प्रकृति से हो रहा है — तो पूछ क्यों रहे हैं? बात खत्म। अगर जवाब के लिए पूछ रहे हो, तो समझ लेना कि प्रकृति से नहीं हो रहा है। अगर ये सब प्रकृति ही कर रही है, तो फिर बात खत्म — जब हम-आप कर ही नहीं रहे, तो प्रयास क्यों करेंगे?
पहले तो दर्शन इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्त होना है। दर्शन हम किसका कर रहे हैं? जो पहले नहीं था और बाद में नहीं रहेगा, उसी का दर्शन हो रहा है। जब तक दर्शन करने की इच्छा है, तब तक हम किसी न किसी दृश्य में फंसे हुए हैं। तो दर्शन भी हमें इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्त होना है। अब दर्शन किसका करना है? जो मुक्त हुआ हो। और उसके लिए क्या करना होगा? उसका चरित्र अपनाना पड़ेगा। मुक्त व्यक्ति कह दो, महापुरुष कह दो, अपनी भाषा में कुछ भी कह दो — वह कहेगा: जिस तरीके से हमने किया था वह नहीं करना, यह गलती ना करना; आपको जिस तरीके से बताया जा रहा है वह करना। तो पक्का कर लो कि निकलना है, और कैसे निकलना है उसके लिए काम करो — मान की इच्छा का त्याग, योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग, दिखावे का त्याग, बड़ा-छोटा बनने का त्याग। ये चारों त्याग तो करने पड़ेंगे, यह नहीं करेंगे तो निकल ही नहीं पाएंगे। फ्लाइट में जाना पक्का कर लिया, लेकिन टिकट भी तो चाहिए — यह टिकट है। दर्शन उसका करना है जो मुक्त हो गया हो, क्योंकि जैसा आप पांच इंद्रियों द्वारा देखते हो, महसूस करते हो, सुनते हो, स्पर्श करते हो, स्वाद लेते हो, वैसा आपका भाव बनता है, वैसी आपको ऊर्जा मिलती है। मुक्त से मिलोगे तो मुक्त का भाव बनेगा, वहां से ऊर्जा मिलेगी। और उसके चरित्र को अपनाना जरूरी है।
मैं वही तो कह रहा हूं — दर्शन भी इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्त होना है, और दर्शन से मुक्त होने के लिए मुक्त हुए का दर्शन करना है, बंधन वाले का नहीं। नहीं तो पता चला उसका चरित्र अपना लिया तो और भ्रष्ट हो जाओगे। मुक्त का दर्शन करना।
जानने से मुक्त होना है। समझना भी इसलिए है कि समझने से मुक्त होना है। ऐसे तो हमें कुछ समझना नहीं है, लेकिन समझने में आ गए, तो समझते-समझते समझने से मुक्त होना है — तभी आप अपने आप में स्थिर हो पाएंगे, चाहे आप समझ के मुक्त हो जाएं, चाहे बिना समझे। खोजते-खोजते खोजने के लिए कुछ नहीं बचता, खोजी बचता है, और फिर बाद में खोजी भी खत्म हो जाता है; उसके बाद शेष बचता है सत्य, और सत्य ब्रह्म की यात्रा करवाता है। अनुभव करते-करते अनुभव करने के लिए कुछ नहीं बचता; जब अनुभव करने के लिए कुछ नहीं रहा तो अनुभव करने वाला भी खत्म हो जाता है, शेष बचता है सत्य, और वह ब्रह्म की यात्रा करवाता है। जब तक खोज है, तभी तक खोजी है।
वही तो बात है। खोजी कौन है? जीव है। जीव भाव को तो हटाना ही है, और वो तभी हटेगा जब खोज खत्म होगी, नहीं तो नहीं हटेगा। प्रयोजन पूरा होने के बाद अपने आप — या तो खोज के खत्म हो जाए, खोजने के लिए कुछ नहीं बचे, या तो समझ के निकल ले। क्योंकि आखिरी में कुछ नहीं है। काम के पहले भी कुछ नहीं, काम के बाद भी कुछ नहीं; आखिरी में आपको यही आना है, और 'कुछ नहीं' में ही आप हो। कुछ है तो आप नहीं, आप उसमें लिप्त हो। या तो खोजते-खोजते इतना खोजो कि खोजने के लिए कुछ ना बचे, आखिरी में थक जाओ, खोजी बचे, तब खोजी भी खत्म हो जाए; या तो समझकर छोड़ दो। अब देख लो आपको कैसे करना है, ये आपके ऊपर है। समझदारी तो समझ के छोड़ देने में है।
ये आपको करना पड़ेगा, यह आपका विषय है। फिर भी इसका भी बता देता हूं — अगर कोई मुक्त है तो उसके पास चाहे जब तक रहो, एक ही बात कहेगा: तू मुक्त हो जा। दूसरी बात वो नहीं करता। चाहे सुबह से शाम तक रहो, चाहे सालों तक रहो, तुमको बस एक ही बात कहेगा — मुक्त हो जा। और इस 'मुक्त हो जा' के लिए अगर आप नहीं समझ रहे हो तो बहुत कुछ बोलेगा, लेकिन घुमा-फिरा कर बस यही बोलेगा: अपने आप को निकाल ले, अपने आप को छुड़ा ले, तू खुद पूर्ण है, तू काहे को किसी के पीछे भाग रहा है; जो तुझ में है वह मुझ में है, तू क्यों भाग रहा है। तो मुक्त हमेशा मुक्ति की बात करता है, और बंधन वाला हमेशा बंधन की बात करता है।
व्यवहारिक जगत की आप बात कर रहे हो, मैं आपकी बात कर रहा हूं। समझ के, जरूरत में हमें जीना था। पशुओं को कोई नहीं सिखाता, उन्हें भी पता है कि क्या मेरे लिए ठीक है क्या नहीं — बंदर भी देखो, सूंघता है, फेंक देता है या खा लेता है। जीवन जीने की बात अलग है; मैं इस समय आपकी बात कर रहा हूं, इस पेट की बात नहीं कर रहा। समझने के लिए तो कुछ है ही नहीं, लेकिन समझने की आदत लग गई — लोगों ने लगा दी, हमने भी पकड़ ली। बताइए, इस संसार में क्या है समझने के लिए, जिसे समझने से आपका कल्याण हो जाएगा? यह था, है और रहेगा — ऐसा कुछ बाहर बता दो। और आप ही कह रहे हो समझने वाला भी सदा नहीं — तो फिर क्या समझना चाहते हो? समझना भटकाव है।
तो मैं तो बस इतना आप लोगों को बोल रहा हूं — जरूरत में जियो, ईमानदारी सत्कर्म अपना लो, उपलब्धि हो जाएगी। कोई संशय हो तो मुझे बोलो। और इसके अलावा कोई और रास्ता हो तो मुझे बताओ। पलायन करना भी तो नहीं — पलायन करके कहां जाओगे, क्या करोगे? जगह बदलने से क्या आपकी स्थिति बदल जाएगी? गंगाजल को स्टील के बर्तन में रख दो, गटर के पानी को सोने के बर्तन में रख दो, तो क्या बाहर के पात्र से अंदर वाला बदल जाएगा? आपको सोने के सिंहासन पर बैठा दिया जाए तो आपकी स्थिति बदल जाएगी? हां, लोगों का दृष्टिकोण बदल जाएगा, लेकिन बैठने वाले को पता है कि मैं वही मामूली हूं। मामूली है तभी आवरण का सहारा लेकर बता रहा है; अगर मामूली नहीं होता तो आवरण का सहारा नहीं लेता, अपना काम करता। कमजोर व्यक्ति हमेशा आवरण का सहारा लेकर अपने आप को सिद्ध करना चाहता है कि मैं यह हूं; सामर्थ्यवान व्यक्ति अपना काम करता है, उसे आवरण से मतलब नहीं है, वह आवरण का सहारा सिर्फ जरूरत में लेता है।
कैसे? बताइए। प्रॉमिस कर रहे हो तो बताओ — पक्का कैसे होगा? उसे सिद्ध करिए। एक भी व्यक्ति दुनिया में बता दीजिए जो विधियों द्वारा पहुंचा हो — एक का नाम बताओ। आप कहते हो स्वामी विवेकानंद के गुरु जी ने शक्तिपात किया — तो फिर और शिष्यों पर क्यों नहीं किया? क्योंकि उनमें स्वामी विवेकानंद ही ऐसे थे जिसे कुछ नहीं चाहिए था। बाकियों में पात्रता नहीं थी, क्योंकि सबको कुछ ना कुछ चाहिए था। वाल्मीकि भी — रत्नाकर डाकू — ब्रह्म समान हुए; उन्हें भी कुछ नहीं चाहिए था, तब जाकर 'मरा मरा' दिया गया और बैठ गए, उसके अलावा उन्होंने कुछ किया नहीं। आप एक व्यक्ति का नाम बता दीजिए — 'कुछ नहीं चाहिए' में अगर कोई व्यक्ति हुआ, तब जाकर उसकी यात्रा होती है।