आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

कर्म — 580 प्रश्नोत्तर

वे प्रश्नोत्तर जिनके प्रश्न या उत्तर में “कर्म” शब्द आता है — नए पहले।

मन353 उत्तरध्यान331 उत्तरगुरु2,248 उत्तरकर्म580 उत्तरअहंकार84 उत्तरमृत्यु43 उत्तरपरिवार239 उत्तरसेवा321 उत्तरडर138 उत्तरक्रोध46 उत्तर

P23-0187

गुरु जी, धर्म बड़ा या देश बड़ा?

P23-0185

गुरु जी, आपने कहा कि ईमानदारी आगे का कर्म-बंधन नहीं बंधने देगी और सत्कर्म पिछले किए हुए कर्म को खत्म कर देगा। लेकिन कर्म अच्छा हो या बुरा, फलित होता ही है — तो क्या सत्कर्म भी फलित होगा?

P23-0175

गुरु जी, कलयुग का सबसे बुरा कर्म क्या है और सबसे पुण्य कर्म क्या है?

P23-0165

गुरु जी, अपनों की कुटिया से जाने के बाद साधक की घर में दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, और लोगों से व्यवहार कैसा हो?

P23-0155

गुरु जी, क्या आप अपनी पारिवारिक-सामाजिक पहचानों और बंधनों से मुक्त हो?

P23-0147

गुरु जी, क्या मुझे आपके सिस्टम ने बाहर कर दिया?

P23-0140

गुरुदेव, कृपा करके मुझ निकृष्ट जीव पर दया कीजिए, दर्शन दीजिए।

P23-0108

गुरु जी, मुझे कैसे पता चलेगा कि मैं कौन हूं? क्योंकि मैं तो निरंतर बदल रहा हूं — कभी अच्छा हूं, कभी बुरा; कभी पापी हूं, तो कभी बहुत पुण्यात्मा। वास्तव में मैं कौन हूं?

P23-0101

गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है?

P23-0088

गुरु जी, यहां रहकर कभी-कभी आंतरिक परेशानी ज्यादा हो जाती है — कल पूरा दिन परेशानी रही। और आंतरिक बदलाव क्या-क्या होते हैं?

P23-0080

गुरु जी, मान लीजिए एक बंदा शैतान है और वह गुरु के पास आ गया — तो फिर उस गुरु का क्या रोल है?

P23-0079

गुरु जी, एक चीज और समझ में नहीं आ रही — कहते हैं परमात्मा ने, खुदा ने आपको बिल्कुल फ्री हैंड छोड़ दिया, जो करना चाहो करो, सही करो या गलत; लेकिन दूसरे हाथ में पकड़ भी रखा है — ऐसा कानून बनाया है जो सीबीआई से भी ज्यादा पावरफुल है, थोड़ी सी गलती की तो सजा मिलेगी। यह कैसे?

P23-0057

गुरु जी, क्या हमारे जीवन में जो भी घटित होता है वह पहले से निश्चित होता है?

P23-0052

गुरु जी, गृहस्थ में रहकर मुक्ति पाने के लिए कोई सरल उपाय बताइए।

P23-0044

गुरु जी, खत्म क्यों करना है अपने आपको? इस जन्म में आया हूं, तो कर्म के बिना तो रह नहीं सकते।

P23-0023

गुरु जी, ये साधनाएं, विधियां तो स्वयं को जानने के लिए करते हैं — मूल प्रश्न तो यही रहता है कि स्वयं को जानें।

P23-0016

गुरु जी प्रणाम, मेरा सवाल यह है कि हम अपने इष्ट देव को कैसे पहचानें?

P23-0015

गुरु जी, कर्म का सिद्धांत क्या होता है — पिछला कैसे खत्म होता है और अगला कब बनता है?

P23-0008

महाराज जी, आप वाला मंत्र काम करेगा — ईमानदारी?

P23-0004

गुरु जी, थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि गुरु बारह बरस तक परीक्षण करते थे और उसके बाद मंत्र देते थे; तो ये आपकी ही बात का खंडन हो गया?

P23-0003

गुरु जी, वैसे तो जो बातें मैं उठा रहा हूं, वे संशय की श्रेणी में ही आती हैं।

P23-0002

तो इसका मतलब महाराज जी, फिर उसके दो पक्ष हो गए — एक तो उन्होंने कर्म को छोड़ दिया, और दूसरा जप को अपनाया? यानी पहले वाले को पूरी तरह करके, उसे अपना आधार बनाकर, तब वे दूसरे वाले की तरफ गए?

P23-0001

महाराज जी, वाल्मीकि जी अगर उल्टा ही नाम जप रहे थे, लेकिन कुछ ना कुछ कर तो रहे थे ना — एकाग्रता के साथ कुछ कर रहे थे।

P22-0165

गुरु जी, ध्यान के बारे में मेरा प्रश्न है — जैसे गौतम बुद्ध ने ध्यान की विधि की और उस विधि से तर गए; और बैठते हैं तो विचार ही चलते रहते हैं।

P22-0157

गुरु जी, आप कहते हैं "कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा" और "होइहि सोइ जो राम रचि राखा" — क्या इन दोनों में विरोधाभास है?

P22-0156

गुरु जी, अक्सर लोग कहते हैं कि भगवान की कृपा से, या दर्शन करने की वजह से मेरा ये काम हो गया — सच में ईश्वर की कृपा से होता है या अपने कर्म से?

P22-0115

गुरु जी, आपने भोजन का पहला कौर उठाते ही याद आने पर हाथ धोकर पहले पिल्लों को खिचड़ी दी — वह कर्म था या सेवा? और लोग यह भी सिखाते हैं कि खाते समय उठना नहीं चाहिए।

P22-0108

गुरु जी, क्या अपना कर्म अपने बच्चों को भोगना पड़ता है?

P22-0083

गुरु जी, आपने जीवन जीने के मूल सिद्धांत बताए — ईमानदारी और सत्कर्म, और सत्कर्म में जरूरतमंद की सेवा। लेकिन जरूरतमंद की पहचान कैसे करें? हैदराबाद में एक परिवार ने कहा मालिक ने निकाल दिया, घर जाना है, भूख लगी है — खाना मत खिलाओ, पैसे दे दो। तभी दो लोग आकर बोले इनका रोज का यही काम है, तो हम आगे निकल गए। एक बच्ची ने 5 किलो आटा मांगा तो दुकान वाला बोला यह इसे यहीं बेच आएगी। ऐसे में विश्वास कैसे करें?

P22-0028

गुरु जी, ब्रह्मानंद जब मिलता है तो माया सस्ती क्यों हो जाती है? जिन महापुरुषों ने ब्रह्म की मस्ती पाई, उनके लिए माया के सारे आकर्षण फीके क्यों हो जाते हैं? पहले यह समझना है कि माया क्या है।

P22-0025

गुरु जी, एक जन्म के किए गए कर्म की सजा दूसरे जन्म में क्यों मिलती है?

P22-0022

गुरु जी, अकर्ता भाव कैसे जान सकते हैं, कब जान सकते हैं?

P22-0008

गुरु जी, पहले जो कुछ किया उसमें मस्त थे, अब सब बेकार लगता है और घुटन होती है — ऐसा क्यों?

P22-0004

गुरु जी, मुक्ति पाने के लिए हम विष्णु सहस्रनाम और कुछ मंत्र बोलते रहते हैं — क्या उससे हम मुक्ति पाते हैं, ये सही है या नहीं?

P22-0001

गुरु जी, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जो जीव शरीर को चला रहा है उसी को निकाल दें, तो शरीर बेकार हो जाएगा, कुछ कर्म नहीं करेगा?

P21-0198

गुरु जी, मेरे इस शरीर से जो अच्छे-बुरे कर्म हो गए हैं, इन कर्मों का आत्मा के साथ कोई संबंध है? आत्मा तो ना मरने वाली है, परमात्मा का अंश है — तो क्या ये कर्म अगले जन्म में आत्मा के साथ जाते हैं? और चलाने वाला तो परमात्मा ही है ना?

P21-0196

गुरु जी, साधना कैसे करनी चाहिए?

P21-0195

गुरु जी, संसार में रहते हुए बहुत सारे बंधन हैं — तो आत्म साक्षात्कार के लिए मुझे संसार फिजिकली छोड़ के कहीं जाना है, या मेंटली यहीं रह के छोड़ सकता हूं?

P21-0192

गुरु जी, हर चीज नई बन जाती है, हर क्षण बदलाव आता है — तो क्या गुरु की उंगली पकड़ के चलना कभी छोड़ ही नहीं पाएंगे?

P21-0190

गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब?

P21-0189

गुरु जी, एक विद्यार्थी इंजीनियरिंग या डॉक्टरी में नहीं जाना चाहता, साधारण BA करना चाहता है; लेकिन घर में सब इंजीनियर हैं, दबाव है — घर वाले इज्जत नहीं देंगे, कंपेयर करेंगे — तो वो दबाव में झूठ बोल देता है कि मैं भी करूंगा। उसे क्या करना चाहिए?

P21-0182

गुरु जी, आप जो आठ शब्द बोलते हैं — छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — इन्हें उदाहरण से समझाइए।

P21-0181

गुरु जी, कर्म सिद्धांत और ज्ञान मार्ग — ये दोनों कैसे जुड़ते हैं, और कैसे हम आत्मज्ञान की तरफ चलें?

P21-0180

गुरु जी, ईमानदारी पहला स्टेप है — लेकिन वो ईमानदारी क्या है, मैं समझ नहीं पा रही।

P21-0178

गुरु जी, मुझे भवानी पर बहुत श्रद्धा थी। जब मेरे जीवन में, मेरी बेटी और मेरी नानी के साथ इतना उतार-चढ़ाव हुआ, तो मैंने भगवान को दोषी माना। बाद में लगा कि शायद मेरे कर्मों का फल है, शायद उसके भविष्य में कुछ अच्छा लिखा होगा — ऐसे अपने आप को समाधान दे रही हूं, लेकिन वो पहले जैसी भक्ति नहीं आ रही। क्या भगवान पर मेरा दोष देना ठीक है, और पहले जैसी भक्ति फिर कैसे उत्पन्न करूं?

P21-0172

गुरु जी, आप कहते हैं परिवार नहीं समझते; हमारे परिवार में, खासकर महिलाओं के लिए, अभी भी परिस्थिति ऐसी है कि सब छोड़ के जाना वो नहीं मानते — पुरुषों के लिए अलग है। आपका परिवार नहीं है, हमारा परिवार है ना — उसको छोड़ के कैसे चलना है?

P21-0166

गुरु जी, मुक्ति और मोक्ष दो अलग चीजें हैं या एक ही? मुक्ति के लिए हम कैसे साधना करें?

P21-0164

गुरु जी, एक प्रोफेसर बहुत सत्कर्म करते थे, 30 साल तक बिस्तर पर पड़े अपने परिवार-जन की सेवा भी की, लेकिन उन्होंने 30 साल तक इतने कष्ट झेले और उनका देहांत हो गया। इससे मुझे लग रहा है कि भगवान है या नहीं? क्या सत्कर्म करने वालों की ये परीक्षा है? मैं बहुत कंफ्यूज हूं।

P21-0162

गुरु जी, शंकराचार्य जी ने कहा है कि सद्गुरु के वचनों का श्रवण और मनन करने से बुरे कर्मों का नाश हो जाता है — क्या ऐसा है?

P21-0153

गुरु जी, घर वाले एक स्वामी जी को मानते हैं जो वास्तु दोष बताते हैं — ये दरवाजा उस तरफ कर दो, ऐसा कीजिए तो वैसा होगा — और कभी-कभी जैसा वो बोलते हैं वैसी घटना घट भी जाती है, तो हमें कंफ्यूजन होता है। हम क्या करें?

P21-0151

गुरु जी, अगर मेरे ऐसा करने से घर वालों को तकलीफ होती है तो?

P21-0148

गुरु जी, कोई मजबूत किसी कमजोर को मारे तो क्या बीच-बचाव करना चाहिए?

P21-0142

गुरु जी, आपने कहा था वस्तुएं बंधन का कारण हैं, फिर आपने अपनी माता जी के लिए सोने की चैन बनवाई — तो क्या हमें भी अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करनी चाहिए?

P21-0140

गुरु जी, हमारी बीमारी, डिप्रेशन — क्या ये हमारे किसी दुख या कर्म के कारण होते हैं?

P21-0136

गुरु जी, जब हम बैठते हैं, अपने में होने का प्रयास करते हैं, तो मन में अलग-अलग विचार चलने लगते हैं — क्या करें?

P21-0133

गुरु जी, अगला शरीर हमारे अभी के कर्मों पर निर्भर होता है, और कहते हैं हम पशु-पक्षी जैसी बहुत सी योनियों से होकर मानव शरीर तक आए — तो पशु से मानव शरीर तक आने के लिए क्या लगता है?

P21-0129

गुरु जी, परिवार (कुटुंब) और आध्यात्म — दोनों को साथ लेकर कैसे चलें?

P21-0122

गुरु जी, यहां बसवेश्वर जी की एक कहावत है "कायकवे कैलास" — काम ही कैलाश है, काम ही पूजा है। अगर हम काम ही न करें तो पूजा कैसे होगी?

P21-0120

योगी जी, आप इच्छा छोड़ने की बात करते हैं — अगर सबने इच्छा छोड़ दी तो दुनिया में डेवलपमेंट कैसे होगा?

P21-0117

गुरु जी, जब हम सब कुछ छोड़ देंगे, तो बाद में क्या करेंगे?

P21-0114

योगी जी, आपने कहा था आत्मज्ञान के लिए ईमानदारी और सत्कर्म दोनों जरूरी हैं और ये दो अलग चीजें हैं — पर सत्कर्म के अंदर तो ईमानदारी होनी ही चाहिए ना? फिर आप दोनों को अलग-अलग क्यों बताते हैं?

P21-0111

गुरु जी, कहते हैं नकारात्मक ऊर्जा और सकारात्मक ऊर्जा होती है, पर मैं सोचता हूं ऊर्जा तो सिर्फ ऊर्जा है, सात्विक — और जो ऊर्जा मुझे मिली है उसका आधार मेरे कर्म हैं। क्या ऐसा समझूं?

P21-0110

गुरु जी, देर से समझ आया कि यह कर्म भूमि है और पिता-पुत्र, भाई-बहन, रिश्तेदार — हम सब एक-दूसरे का उपयोग कर रहे हैं; मैं उपयोग कर रहा हूं तो मेरा भी उपयोग होना है। क्या यही हमारा संबंध है?

P21-0103

गुरु जी, हमारे पहले गुरु जी कहते थे कि गुरु के पास पूरी ताकत है, वो बड़ी से बड़ी बला (सूली को सूई पर) टाल देते हैं; पर आपका ज्ञान कहता है कि आपके सत्कर्म ही बला टालेंगे, गुरु नहीं — इसमें सच क्या है?

P21-0095

गुरु जी, आपने कहा था कमल कीचड़ में खिलता है और यह संसार कीचड़ है — यह मुझे समझ नहीं आया।

P21-0091

गुरु जी, कहते हैं गुरु को मनाना मुश्किल है और भगवान को मनाना आसान — क्या गुरु को मान की इच्छा ज्यादा होती है?

P21-0089

गुरु जी, आप कहते हो सब कुछ हो रहा है — जब सब कुछ हो रहा है तो हम किससे लड़ें और क्यों लड़ें?

P21-0087

महाराज, बीवी कहती है रोज मंदिर जाओ, पूजा-पाठ करो — वो धक्का देकर भेजती है, पर मेरा मन जाने का नहीं करता। क्या मंदिर न जाने से पाप लगेगा?

P21-0074

गुरु जी, कर्मों का विधान क्या है? शास्त्र तीन कर्म बताते हैं — क्रियमाण, प्रारब्ध और संचित।

P21-0067

गुरु जी, पहले मैं नौकरी करता था पर वहां हर समय बेईमानी करनी पड़ती थी, तो मैंने छोड़ दी। अब बूढ़ी मां और छोटे भाई की जिम्मेदारी है, कोई काम सेट नहीं हो रहा — जिम्मेदारियों को तो नहीं छोड़ सकते ना?

P21-0064

गुरु जी, आपने कहा था कि इस मार्ग पर एक प्रतिशत ही पहुंच पाते हैं, और यह भी कि बुद्ध के बारे में पहले से पता था कि वे बुद्ध होंगे — तो क्या परमात्मा ही वह एक प्रतिशत लोग भेजता है? फिर सत्कर्म क्या है?

P21-0054

गुरु जी, कर्म तो मुझे देश-काल-परिस्थिति में अपनी जरूरत के लिए या किसी और के लिए करना ही पड़ेगा — तो मैं क्या करूं कि कर्ता का भाव और मेरा का भाव न बंधे?

P21-0022

जब तक स्व नहीं मिलता, जरूरत में किया कर्म भी कर्म ही है, और स्व में गति है तो जहां दृष्टि डालेगा वहां कर्ता पद आ जाएगा — क्या कर्ता भाव बंद हो सकता है?

P21-0021

मैं उठूंगा तो भी स्व में ही हूं — क्या उठने में कर्ता भाव आ जाएगा?

P20-0144

हम हर समस्या को "मेरा प्रारब्ध है, लेना-देना पूरा करना पड़ेगा" कहकर अध्यात्म में पीछे रह जाते हैं — प्रारब्ध सच में होता है?

P20-0137

"ऐसा क्या करूं जो तेरी सेवा हो पाए?" — परमात्मा की सेवा कैसे होती है?

P20-0110

एक संसारी डेली रूटीन में अपने को देख भी नहीं पाता — उसे कर्म करते हुए "हर वक्त परीक्षा है" कैसे समझना चाहिए?

P20-0099

गुरु जी, अवचेतन मन को खाली कैसे करें?

P20-0095

गुरु जी, क्या पत्थर, पशु और वनस्पति भी कर्म भोगते हैं — किसी को पूजा जाता है, किसी को पीसा जाता है?

P20-0089

गुरु जी, किसी को अच्छा इंसान कैसे बना सकते हैं?

P20-0088

गुरु जी, ऐसा क्या करें कि अगले जन्म में भी मनुष्य बनें और आध्यात्मिक मार्ग पर ही रहें?

P20-0085

गुरु जी, सबकी बुद्धि की क्षमता अलग-अलग क्यों होती है?

P20-0065

गुरु जी, मैं कोई गलत काम नहीं करता, बस एक कर्म गलत होता है — उससे छुटकारा कैसे पाऊं?

P20-0049

गुरु जी, पश्चिम केवल कर्म करके अमीर है पर वहां परिवार और शांति नहीं, और यहां केवल नाम-जप में गरीबी आ रही है — बीच का रास्ता क्या है?

P20-0048

गुरु जी, कुटुंब वालों ने कष्ट दूर करने के लिए कुलदेवी-कुलदेवता की पूजा का उपाय बताया है — यह क्या कॉन्सेप्ट है?

P20-0035

गुरु जी, जिसका कर्म सही है वह गाली क्यों सुने — सामने वाले को गलत सिद्ध क्यों न करे?

P20-0033

गुरु जी, पूर्व जन्म के कर्म कैसे कटते हैं?

P20-0032

गुरु जी, नवजात शिशु की चार दिन में मृत्यु हो जाए तो उसका कौन सा कर्म है?

P20-0020

गुरु जी, कोई गाली दे तो हमें अपने बारे में क्या देखना चाहिए?

P20-0017

गुरु जी, कुछ लोग जानबूझकर हमें गिराने का कार्य करते हैं, हमारे बारे में गलत बोलते हैं — ऐसे लोगों का क्या करें?

P20-0003

गुरु जी, कुटिया में साधना इतनी तेजी से क्यों होती है?

P19-0184

गुरु जी, गृहस्थ लोग अपना आत्म कल्याण कैसे करें?

P19-0181

गुरु जी, उम्मीद को आप कैसे देखते हैं और किससे उम्मीद रखनी चाहिए?

P19-0170

गुरु जी, कर्म खत्म होने के बाद साधना का क्रम क्या होता है?

P19-0169

गुरु जी, प्रारब्ध प्रबल होता है या कर्म? क्या कर्म से परमात्मा को पाया जा सकता है?

P19-0165

गुरु जी, आपको इतनी मेहनत और पीड़ा के बाद ज्ञान मिला और हमें सहज में मिल रहा है — क्या आपके कर्म हमसे बुरे थे?

P19-0142

गुरु जी, ईमानदारी से, ज्ञान में जीने वाले लोग समाज में अज्ञान और बेईमानी से जीने वालों से कैसे बचें? उनसे राग-द्वेष हो ही जाता है।

P19-0102

गुरु जी, मंत्रों में ओम का बहुत नाम आता है। ओम क्या है — ध्वनि है या कुछ और?

P19-0101

गुरु जी, कर्म के बारे में पढ़ा था कि विकर्म और अकर्म भी होते हैं। ये क्या हैं?

P19-0096

गुरु जी, गीता पूरी पढ़ी — कृष्ण ने अर्जुन से आखिर में निष्काम कर्म करने को कहा, पर वह जीवन में समझ नहीं आया। निष्काम कर्म क्या है?

P19-0032

गुरु जी, आत्मज्ञान के बाद कोई कर्म बंधन में नहीं बंधता — तो जो पहला शरीर निर्विकार होकर परमात्मा के सामने खड़ा था, वह फिर कर्म बंधन में कैसे बंध गया?

P19-0018

गुरु जी, कर्मों की सजा कैसे मिलती है? क्या मृत्यु के बाद ही फैसला होता है कि कौन सी योनि मिलेगी?

P19-0017

गुरु जी, क्या बेईमानी पिछले कई जन्मों के कर्मों-संस्कारों के साथ आती है, कि प्रारब्ध भुगतते समय हम बेहोशी में कुछ भी कर बैठते हैं?

P19-0009

गुरु जी, सारे महापुरुषों ने मूल रूप से क्या सिखाया? जीते जी मुक्ति और मोक्ष कैसे होता है?

P19-0005

गुरु जी, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर बैठने से क्या परमात्मा मिलता है?

P19-0002

गुरु जी, गुरु और सतगुरु में क्या भेद है? क्या कोई सतगुरु दिखाया जा सकता है?

P18-0189

गुरु जी, आत्मा जिस घर, कुल, जगह में आई, वहां के दायित्व और संबंध तो प्राकृतिक मिले — फिर कहते हैं संसार हमने बनाया, यह कैसे?

P18-0184

गुरु जी, पूरी जिंदगी भौतिकवाद में मेहनत करके जो चीजें हासिल कीं, अब उनका उपयोग करना क्या कामना में आएगा?

P18-0160

गुरु जी, पूरे समय साक्षी भाव कैसे बना रहे?

P18-0136

गुरु जी, गृहस्थी मेंटेन करते हुए साधक साधना कैसे करे?

P18-0101

गुरु जी, क्या प्रार्थना में ताकत होती है? कर्म करते हुए अच्छे मन से की हुई प्रार्थना फलित होती है?

P18-0100

गुरु जी, ऊर्जा कितने प्रकार की होती है?

P18-0098

गुरु जी, आत्मा, जीव और कर्म का संबंध कैसे है?

P18-0094

गुरु जी, ध्यान करते वक्त मन में परेशानी और घबराहट होती है — मन इतने विचार क्यों देता है, और स्थिरता कैसे बने?

P18-0071

गुरु जी, क्या अगले कर्म और पिछले कर्म होते हैं? और क्या ईमानदारी और नाम जप से प्रेम में रोमांचित होने से पिछले कर्म भस्म हो जाते हैं?

P18-0058

गुरु जी, ट्रेनिंग के लिए 40 दिन मौन रहें, दिन में एक बार खाएं — क्या इससे संकल्प शक्ति बढ़ेगी? सच्चा मौन क्या है?

P18-0057

गुरु जी, कोई नियम लिया है, 10 में से 8 बार हो पाता है, 2 बार चूक जाते हैं तो मन में ग्लानि होती है; कभी लगता है नियम में ही फंस रहे हैं, कोई नियम न रखें — क्या करें?

P18-0051

गुरु जी, पुराना प्रारब्ध रुक जाए या खत्म हो जाए और नया प्रारब्ध न बने — इसके लिए क्या करें?

P18-0050

गुरु जी, क्या नाम जप से कर्म जल्दी भोगने को मिलता है?

P18-0048

गुरु जी, बेईमानी क्या है — दूसरों के साथ और अपने साथ?

P18-0047

गुरु जी, कहा जाता है कि नाम जप से मन पर ठहराव आता है — क्या नाम जप से विचार रुक जाते हैं और पिछले कर्म कटते हैं?

P18-0046

गुरु जी, मैं ध्यान हटाकर सिर्फ नाम पर केंद्रित होकर निरंतर नाम जप कर रहा हूं और सोच को रोक रहा हूं — क्या यह सही है? इसका क्या परिणाम होगा, या यह भटकाव है?

P18-0022

गुरु जी, जीव और ब्रह्म के बीच जो झीना पर्दा है — वह तो उन्हीं के द्वारा रचित है, हमारा नहीं?

P17-0198

गुरु जी, अगर हम यहां से छूटने के लिए सत्कर्म कर रहे हैं, तो उसे निष्काम कर्म कैसे कहें?

P17-0193

गुरु जी, भाव शुद्धि कैसे होती है?

P17-0182

गुरु जी, क्या जरूरत में जीने से भोगने की इच्छा समाप्त हो जाएगी — और नया नहीं बनेगा, पुराना छूट जाएगा? क्या ईमानदारी से कर्म करने पर कर्ज चुकता होता रहता है?

P17-0172

गुरु जी, सत्य वचन सुनकर अगर पीड़ा हो, तो क्या समझ लेना चाहिए कि हमारा मन ही पापी है?

P17-0088

गुरु जी, नौ द्वारों के अलावा दसवां द्वार भी सुना है — वह कैसे खुलेगा?

P17-0078

गुरु जी, तीनों प्रवृत्तियां हमारे अंदर भी हैं — सात्विक को कैसे बढ़ाएं, और राजसी-तामसी लोगों से कैसे बचें?

P17-0069

गुरु जी, अगर आत्मदर्शन की जरा सी भी इच्छा है तो यात्रा की शुरुआत कैसे करें?

P17-0067

गुरु जी, लोग कहते हैं "बेईमानी के बिना कैसे चलेगा?" — क्या बेईमानी रखते हुए आत्मदर्शन या सत्य की खोज हो सकती है?

P17-0066

गुरु जी, सबको अलग-अलग धन, शरीर, रूप और बुद्धि का स्तर क्यों मिला है?

P17-0040

गुरु जी, ध्यान कैसे करें?

P17-0033

गुरु जी, जो ध्यान मार्ग से साधना करते हैं, उनको पूर्व पापों को काटने के लिए क्या नाम या मंत्र जाप करना आवश्यक है?

P17-0030

गुरु जी, साधक की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए?

P17-0028

गुरु जी, साधना कैसे करें?

P17-0024

तो क्या आज से मैं जो भी कर्म करूं, उसके पीछे यही भाव बनाऊं कि इस कर्म का जो परिणाम मिलेगा, उसमें मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए?

P17-0008

(लाइव) गुरुजी, क्या मन की वासना को पूरा करना भी बेईमानी है?

P17-0001

(लाइव) गुरुजी, अगर परमात्मा तक जाना है तो परमात्मा खुद क्यों नहीं मिला लेता अपने में? यह खेल क्यों रचा है कि हम कर्म करके तब उस तक जाएं?

P16-0172

(लाइव) कुंडलिनी शक्ति जागृत करने के लिए चक्र-ध्यान कैसे करें? आत्मज्ञान की स्थिति कहां पर बनती है? कहा गया है कि आज्ञा चक्र के बाद जब सहस्रार खुलता है तब आत्मज्ञान होता है।

P16-0170

(लाइव) गुरु जी, पंच तत्व ज्ञान में संगीत का क्या योगदान है? क्या संगीत से भी पहुंचा जा सकता है?

P16-0169

(लाइव) नाम जप की महिमा के बारे में बताइए।

P16-0158

आदमी के कर्म और पूजा-पाठ में क्या अंतर है? कर्म सर्वोपरि है या पूजा-पाठ?

P16-0155

पांच तत्वों से जो यह शरीर बना है, उठते-बैठते हम सारी चीजों का उपभोग कर रहे हैं — पानी पी रहे हैं, अग्नि से खाना बना रहे हैं। तो क्या इनका भी कोई ऋण हमारे ऊपर चढ़ रहा है? मां का दूध, गाय-भैंस का दूध — इनके बगैर हमारा जीवन नहीं चलता, तो इनका ऋण है?

P16-0151

गुरु जी, आपको 12 साल भटकने के बाद, इतने कष्ट झेलने के बाद आत्मज्ञान हुआ। तो क्या हर आदमी को उसी प्रकार आत्मज्ञान होगा?

P16-0149

गुरु जी, मानव इसलिए तो नहीं बनना चाहते कि मानव में दुख और सुख दोनों आते हैं? राक्षस बनेगा तो उसे सुख ही सुख भोगने को मिलेगा?

P16-0143

गुरु जी, क्या इसके अंदर नेगेटिव ऊर्जा और पॉजिटिव ऊर्जा दो होती हैं, या एक ही होती है? ऊर्जा तो एक ही है, उसे गंदा कैसे किया जा सकता है?

P16-0142

बाहर की ऊर्जा तो आपने बता दी, अब अंदर की ऊर्जा के बारे में बताइए। अंदर की ऊर्जा एक ही होती है या इसके भी अलग-अलग स्तर हैं?

P16-0141

गुरु जी, आज हमें ऊर्जा के बारे में बताइए — एनर्जी, ऊर्जा कैसे काम करती है?

P16-0134

तो फिर मानव बनता कब है? मानव का चोला तो मिल गया — अगर मैं इस चोले में रहकर अच्छे कर्म करूं तो क्या होगा? मैं मानव कब कहलाऊंगी?

P16-0133

योगी जी, मेरा प्रश्न है कि यह जीवन क्या है? केवल मनुष्य ही नहीं, हर कीट-पतंग, जीव-जंतु — एक चींटी को भी मारने की कोशिश करें तो वह भी अपने प्राण बचाती है। और कहते हैं कि मनुष्य योनि सबसे सर्वश्रेष्ठ है — यह तो मनुष्य ने खुद ही घोषित कर लिया, जबकि जितना मनुष्य गर्त में जा सकता है उतना शायद कोई और योनि नहीं जाती। बाकी योनियों को भोग योनि कहकर नीचा दिखा दिया। प्रत्यक्ष ज्ञान इसके बारे में क्या कहता है?

P16-0127

मन और बुद्धि से परे कैसे जाएं? और गुरु जी, मन सीधे आ जाता है या मन से पहले विचार आता है? विचार से पहले क्या आता है?

P16-0114

यह भी आपसे ही सीखा है कि हर कर्म का फल मुझे भोगना है।

P16-0111

इस दुनिया में इस ज्ञान के साथ जीना बहुत मुश्किल हो रहा है।

P16-0110

मैं बेईमान होके ही जी रहा था, अब थोड़ा-थोड़ा ईमानदारी में आ रहा हूं। कई बार कुछ कर्म करने के बाद समझ आती है कि ऐसे नहीं, ऐसे करना चाहिए।

P16-0107

कर्म भी ऐसे किए हैं...

P16-0097

ऋषियों को मंत्र-दृष्टा के रूप में जाना जाता है — जिन्होंने मंत्रों को सीधे भगवान या अलौकिक शक्ति से देखा या प्राप्त किया। हम इसे कैसे कर सकते हैं?

P16-0068

गुरुदेव, ईमानदारी की क्या परिभाषा है? हर व्यक्ति की ईमानदारी की परिभाषा अलग-अलग है — कृपा करके विस्तार से बताएं।

P16-0052

गुरुदेव, क्या ईश्वर की पूजा आदि ना करते हुए सिर्फ निष्काम कर्म से उस तक पहुंचा जा सकता है?

P16-0035

गुरु जी, क्या कभी-कभी सही काम करने के लिए मजबूरी या परिस्थितिवश गलत काम करना सही है?

P16-0028

गुरुदेव, मेडिटेशन और सत्कर्म भी कर्म ही है ना — तो क्या इससे कर्म-बंधन बंधता है?

P16-0022

गुरु जी, ईमानदारी का मतलब क्या है?

P16-0008

बाबा जी, अगर इस जन्म में कोई पाप हुआ हो तो उसका कर्मफल कर्म-विधान से इसी जन्म में चुकाना पड़ता है; फिर क्या अगले जन्म में पीछे के बुरे कर्म का प्रभाव पड़ता है?

P15-0195

गुरुदेव, सबकी शरीर की स्थिति अलग-अलग है, सबकी मनोदशा अलग है — फिर आप कैसे कह सकते हैं कि एक रोटी पे सबका शरीर एक जैसा होगा?

P15-0190

ना चाहते हुए भी विचार में गड़बड़ होती रहती है। जो चीज आज तक सीखी है उसे छोड़ना चाहते हैं, पर बार-बार आदत से वही आ जाती है — जैसे स्वास पर नाम का सुमिरन मिला था, अब ध्यान में बैठता हूं तो वह अपने आप चालू हो जाता है। यह छूटेगा कैसे?

P15-0188

गुरु जी, दृष्टा और दृश्य को समझाइए।

P15-0182

गुरु जी, बहुत कोशिश करने के बाद भी ध्यान लगाता हूं तो आंखें बंद करने पर अंधेरा ही दिखता है। ध्यान की सही विधि बताइए, कैसे ध्यान सही होगा?

P15-0164

काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ की व्याख्या क्या है?

P15-0137

गुरु जी, काम, क्रोध, मोह, लोभ — ये सब आत्मज्ञान के बाद खत्म होते हैं या फिर ब्रह्मज्ञान के बाद?

P15-0127

भाव और स्वभाव में अंतर क्या है?

P15-0125

मेरे सद्गुरु जी, चिंतन पर समझाने की कृपा करें।

P15-0123

गुरुदेव, मैं अच्छे कर्म कर रहा हूं, सत्कर्म कर रहा हूं, फिर भी कोई मेरा शोषण कर रहा है और मुझे दिखाई दे रहा है — ऐसे समय में मैं क्या करूं?

P15-0122

गुरु जी, जैसे मैं मन के द्वारा कंप्यूटर में सही फाइल खुलवाऊं — सही जगह क्लिक हो — उसके लिए क्या साधना या क्या विधि है?

P15-0117

गुरुदेव, फिर कर्तव्य क्या है? जैसे परिवार का कर्तव्य — बेटी है, पत्नी है, माता-पिता हैं — हम कर्तव्य कैसे निभाएं?

P15-0116

गुरुदेव, देखा गया है कि बालक में भी, जिसको अभी उतना बोध नहीं है, क्रोध-लालच दिखते हैं; पशुओं में भी। कई बालक बांटने को तैयार होते हैं, कई नहीं होते। यह कहां से आता है?

P15-0114

क्या लोगों की उम्मीद तोड़ना भी एक मार्ग है, उनको ये दिखाने का कि उम्मीद किसी काम की नहीं?

P15-0111

आप कहते हैं ज्ञान होने के बाद कोई ध्यान करने की जरूरत नहीं, पर शिव जी तो हमेशा ध्यान में ही रहते हैं?

P15-0109

क्या आत्मज्ञान के लिए आपके पास आना पड़ेगा, या चैनल पर सत्संग सुनने से हो जाएगा?

P15-0097

नेगेटिव थिंकिंग से कैसे बचा जाए?

P15-0074

अगर कोई बच्चा जन्म से ही अंधा या लंगड़ा पैदा हुआ है, उसने तो कोई कर्म नहीं किया, फिर ये परिणाम क्यों मिला?

P15-0071

क्या जन्म-पत्रिका या राशि में जो लिखा होता है वो सच होता है, या जो होता है सब समय का खेल है?

P15-0067

सत्कर्म और निष्काम कर्म में क्या फर्क है?

P15-0058

ध्यान कैसे करें?

P15-0044

आत्मज्ञान में सबसे बड़ी बाधक कौन-कौन सी बातें हैं और उन्हें दूर कैसे करें?

P15-0040

क्या पाप कर्म से पुण्य कर्मों का नाश होता है?

P15-0030

कंफर्ट ज़ोन में रहकर क्या ध्यान हो सकता है — स्थान सुरक्षित भी रहे, भंग भी ना हो और ध्यान भी हो जाए?

P15-0024

प्रत्यक्ष ज्ञान होने पर क्या सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं?

P15-0020

गुरु जी, जप से कुछ असर नहीं होता, इसका मतलब मेन चीज़ कर्म से होती है?

P15-0018

हम इतनी पूजा-भक्ति करते हैं, इतने भाव से करते हैं, लेकिन हमें दुख क्यों है?

P14-0185

गुरु जी, परमात्मा की याद तो हर वक्त बनी रहती है पर नाम जप नहीं कर पा रहा — ज्ञान मार्ग बताएँ।

P14-0179

यजुर्वेद में लिखा है कि परमात्मा सारे पाप नाश कर देता है — अपना किया, पितरों का किया, जाने-अनजाने में हुआ — तो आप कहते हैं भोगना पड़ेगा, इसका भाव क्या है?

P14-0178

कर्म और भाग्य क्या है? मार्गदर्शन करें।

P14-0177

कर्म-बंधन का प्रभाव कैसे छोड़ें?

P14-0173

लोग कहते हैं हमें भगवान पर विश्वास है और जो भी हो रहा है भगवान की मर्जी से हो रहा है, फिर कुछ अनहोनी होती है तो रोते हैं — मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू, यह कैसी श्रद्धा है?

P14-0158

संचित कर्म की वजह से इस जन्म में तकलीफ हो तो कैसे समझा जाए?

P14-0150

कर्ता बने रहकर अकर्ता हो सकते हैं प्रभु? कृष्ण और राम ने यही किया है।

P14-0134

आपने अपनी बहन के बारे में अशुद्धि-शुद्धि वाली बात कैसे समझाई थी?

P14-0131

अच्छी या बुरी परिस्थितियों का कितना दोष है प्रभु?

P14-0109

गुरु जी, शाब्दिक ज्ञान को जीवन में धारण कैसे करें?

P14-0106

गुरु जी, मनन-चिंतन की प्रक्रिया को हम जीवन में कैसे उतारें? थोड़ा विस्तार से बताइए।

P14-0102

गुरु जी, कर्म-बंधनों से मुक्त कैसे हों?

P14-0099

गुरु जी, हम गृहस्थी वाले बिना भटके आपसे जो पा रहे हैं, उसके लिए आपको कोटि-कोटि प्रणाम।

P14-0090

गुरु जी, मोह-माया ही सभी कर्म-बंधनों की जड़ है; जिस क्षण प्राणी इससे परे हो गया, कोई कर्म उसे बांध नहीं सकता — मोह-माया क्या है?

P14-0086

गुरु जी, पिछले पाप से छुटकारा कैसे पाएं?

P14-0078

गुरु जी, "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" — इसका थोड़ा विश्लेषण कीजिए।

P14-0077

गुरु जी, 'ईश्वर सर्वव्यापी है' — इसका क्या मतलब है? क्या ईश्वर कण-कण में, हर जगह मौजूद है?

P14-0076

गुरु जी, पूजा क्या है? क्या रोज सुबह उठ के घंटों जाप, भगवान को चंदन लगाना जरूरी है?

P14-0074

गुरु जी, ध्यान क्या चीज है? क्या ध्यान की कोई विशेष विधि है, कुछ देर बैठना है?

P14-0068

गुरु जी, इंसान को जो भी अवस्था, सुख-दुख, जैसा घर मिलता है, वह सब पिछले कर्मों से होता है — क्या उसे बदला जा सकता है? कोई हर समय मानसिक पीड़ा में रहता हो तो?

P14-0061

गुरु जी, मुक्ति भी कुछ होती है? लोग मर जाते हैं तो परिवार वाले उन्हें मुक्त करवाते हैं — ये क्या है? और क्या कोई विशेष मुक्ति होती है?

P14-0059

गुरु जी, हर कर्म बंधन देता है, प्रारब्ध को गढ़ता है — ईमानदारी से किया कर्म भी?

P14-0058

गुरु जी, मैं बहुत बेचैन हो रहा हूं कि मैं परमात्मा को पाने के लिए कुछ कर नहीं पा रहा हूं। अपनी नजरों से दिखता है कि कहीं ना कहीं बेईमानी करते भी हैं, तो कर्म तो बिगड़ रहा है ना?

P14-0057

गुरु जी, राजा जनक राजपाट करते हुए भी, संसार में रहते हुए भी संसार से परे थे, विदेह कहलाए — ये विद्या बड़ी मुश्किल लगती है?

P14-0040

गुरु जी, कुछ गुरु कहते हैं ध्यान में बैठो, अंदर प्रकाश दिखेगा या कुछ सुनाई देगा, उसमें ध्यान लगाओ, फिर बुराइयां छोड़ दो तो निर्विकार हो जाओगे — क्या ऐसा होता है?

P14-0033

गुरु जी, क्या गर्मी-सर्दी से बचने का उपाय भी नहीं करना चाहिए?

P14-0024

गुरु जी, क्या कर्म का फल मिलता है? अगर मिलता है, तो बेईमान लोग इतने फूलते-फलते कैसे हैं?

P14-0019

गुरु जी, ऊर्जा को संभालना मतलब क्या? और क्या ऊर्जा स्नान से निकल जाती है?

P14-0017

गुरु जी, कर्म क्या है? और क्या निष्काम कर्म ही ब्रह्म की तरफ चलना है?

P13-0200

गुरु जी, किसी वस्तु या मनुष्य का चिंतन करते हैं तो उसके गुण अपने में आ जाते हैं?

P13-0174

गुरु जी, निष्काम कर्म कैसे करें?

P13-0169

गुरु जी, ईमानदारी का क्या माप होता है?

P13-0162

जिसको ढूंढने निकले हैं, वो कहां मिलेगा, कहां नहीं मिलेगा? उसी की खोज में चल रहे हैं।

P13-0147

गुरु जी, जब हम दिल से किसी की सेवा करें और वो हमें बद्दुआ दे, तो क्या वो बद्दुआ लगती है?

P13-0135

गुरु जी, क्या दुर्गा-सरस्वती का अध्ययन करने से आत्मज्ञान पा सकते हैं?

P13-0128

गुरु जी, कर्म करते वक्त फेल होने का भय क्यों रहता है? इसका मूल कारण क्या है?

P13-0117

हम जो प्लानिंग से कर्म करते हैं, वह हमारे आत्मिक कल्याण में सहायक है या नहीं? जैसे ऑफिस में काम खत्म हो जाए तो मैं खोजता हूं कि और क्या काम हो सकता है।

P13-0115

जब हम ईमानदारी या सेवा करते हैं तो हर बार संशय आता है कि इस कर्म को करना चाहिए या नहीं, यह मेरे अधिकार में है या नहीं। कौन से कर्म छोड़ने हैं और कौन से कर्म करने हैं?

P13-0109

गुरु जी, आप बोलते हैं कि ध्यान में ध्यान करते चलो — क्या छोड़ना है?

P13-0107

क्या आपकी जीवन-मुक्ति भक्ति के द्वारा ही सिद्ध हुई?

P13-0106

गुरु जी, कर्म करते वक्त संकल्प लेते हैं कि इतने समय में कार्य को समाप्त करना है, फिर टेंशन क्यों होता है?

P13-0103

गुरु जी, जब से समझ का स्तर बढ़ा है, मैं उन लोगों से दूर हो गया हूं जो मुझे मानसिक रूप से तोड़ते हैं, लेकिन वे फिर भी परेशान कर रहे हैं। क्या यह हमारा कर्म है? हिसाब कैसे पूरा करें?

P13-0096

आध्यात्म में आगे बढ़ना है तो पहले क्या समझना पड़ेगा?

P13-0093

जब भी कुछ कर रहे हैं तो करने से पहले एक भाव बनता है और करने के बाद एक भाव — दोनों भाव को कैसे देखें? भाव नहीं पकड़ पा रहा।

P13-0091

घटना घटने के बाद पता लगता है गलत हो गया — एक बार, दो बार, तीन बार हो जाए तो क्या? गलती की माफी की गुंजाइश है?

P13-0076

मुझे आत्मिक कल्याण समझ में नहीं आता; घरेलू तरीके से समझाइए — आत्मिक कल्याण क्या है?

P13-0075

मेरा ओवरऑल प्रश्न यह है कि मन, वचन और कर्म — तीनों से जो भी कर्म मेरे द्वारा हो रहा है, उसमें एक साधक के रूप में टोटल मिलाकर क्या भाव रखूं? क्या उसे साक्षी भाव से चेक करूं? और राग-द्वेष छोड़ने के अलावा अपने आप को क्या टारगेट दूं?

P13-0074

खाना खाने में, नहाने में, घर के रोजमर्रा के काम करने में — एक-एक छोटे कर्म पर मेरा क्या भाव होना चाहिए, ताकि मैं बहिर्मुखता से अंतर्मुखता की तरफ आऊं? और घर वालों के बीच बैठी हूं, तब क्या भाव बनाऊं?

P13-0073

योगी जी, कर्म के प्रति मेरा कितना दायित्व होना चाहिए — मतलब कितना अधिकार होना चाहिए?

P13-0068

(एक साधक, परिवार के साथ) गुरु जी, मैं सत्संग भी समझता हूं, और गुटखा का सेवन भी करता हूं — यही चूक हो रही है। (पत्नी:) हम दो-तीन साल से बोल रहे थे पर बात नहीं सुनते थे; ज्यादा बोला तो गुस्सा करते थे, इसलिए छह महीने से यह टॉपिक ही बंद कर दिया।

P13-0063

कहते हैं ध्यान लगाओ, ध्यान लगाओ — ध्यान लगाएं कैसे? ध्यान क्या है?

P13-0060

गुरुदेव, ध्यान में ध्यान कैसे करना है? जब से मैं यहां आया हूं और आपने मुझे बताया, तब से ध्यान में ध्यान हो नहीं पा रहा; पहले विधियां करता था, उनसे कोई लाभ नहीं मिला।

P13-0056

महाराज जी, जब तक कर्ता का भाव है, सारी चीजें गलत होती रहती हैं।

P13-0048

प्रभु, आप जैसे संतों की इस पूरे विश्व को आवश्यकता है। मैं आपके वीडियो भक्तों को शेयर करता हूं; सब कहते हैं कि आपकी और एक दूसरे स्वामी जी की विचारधारा एक जैसी है।

P13-0046

मन में बेचैनी होती है; लगता है कभी वहां घूम आऊं, कभी वहां। तो क्या हम अपने कर्म से भाग रहे हैं?

P13-0043

व्यक्ति अपने ऊपर विश्वास करे, या कर्म पर, जो वह कर रहा है?

P13-0034

अब इस उम्र में, खाट पर बैठी, मैं क्या करूं कि पार उतर जाऊं?

P13-0033

(एक बुजुर्ग माता जी के परिवार ने पूछा) माता जी ने 40 साल से भी ऊपर नाम रटा, माला फेरी, फिर भी कहती हैं मेरी भक्ति पूरी नहीं हुई। क्या नाम लेने से पार उतर जाएंगी?

P13-0031

गुरु जी, क्या गुरु के आशीर्वाद से किसी के दुख-तकलीफ ठीक हो जाते हैं?

P13-0015

क्या हर जगह ऊर्जा अलग-अलग होती है? क्या वह किसी के द्वारा दी जाती है?

P13-0010

"नाम जपूं ना हरि भजूं, मुख से कहूं ना राम; मेरा साईं मो को भजे, तब पाऊं विश्राम" — गुरुदेव, यह दोहा आप पर सार्थक होता है।

P13-0009

जल्दी कर्म को कैसे काटें, ताकि संसार से जल्दी चले जाएं?

P12-0189

बूढ़े लोग गालियां दें तो क्या करें? और कहने से भी गालियां देना ना रुके तो?

P12-0182

गुरुदेव, आपने X पर कहा था 'उचित कार्य करो, उचित जीवन जियो' — कल मैं इसी के ऊपर एक निर्णय लेने वाला हूं, मार्गदर्शन करें।

P12-0179

गुरु जी, आज आप कैसे खुश हो रखे हो?

P12-0163

(लाइव में) मां नर्मदे हर, प्रणाम गुरु जी — मैं आपका पुराना साधक हूं, पंजाब से।

P12-0156

दैनिक अभ्यास में हम कुछ ऐसा कर पाएं जिससे कि अपनी चेतना का विस्तार हो — वो क्या करें?

P12-0149

तो परिणाम कैसा होगा, इसका निर्णय अस्तित्व करता है?

P12-0148

हम बोलते हैं कि हमारे कर्म निर्धारित होते हैं — जो भगवान ने लिखा है वही होगा, हमारे हाथ में कुछ नहीं, चाहे दुख हो या सुख। तो क्या कर्म पहले से ही निर्धारित होते हैं?

P12-0147

आज के समाज में बहुत से सिद्ध साधु-संत अपने शिष्यों को आशीर्वाद देते हैं कि आपकी मनोकामनाएं और जरूरतें पूरी हों — तो क्या वो पूरी होती हैं? क्या उनके आशीर्वाद से वास्तव में साधक का कल्याण होता है?

P12-0143

(एक साधक जो विपासना सेंटर भी जा चुके थे) गुरु जी, ध्यान को लगाया कैसे जाए, उसे कंटिन्यू कैसे रखा जाए? मैं दिमागी शांति के लिए ध्यान करना चाहता हूं।

P12-0141

गुरु जी, मैं कृपा की बात नहीं कर रहा, लेकिन इतने समय से मेरे अंदर बहुत तीव्र इच्छा हो रही है कि अब मैंने और जन्म नहीं लेना — मुझे यह यात्रा बहुत तेज करनी है। इसके लिए क्या करूं?

P12-0140

(माता जी) महात्मा के दर्शन घर में हो रहे हैं — ये भी तो हमारा भाग्य है, ये तो मालिक की प्रेरणा से हुआ है।

P12-0136

कभी-कभी इतना तगड़ा वैराग्य आता है, इतनी बेचैनी होती है कि खुद पर शक हो जाता है — पता नहीं हम निकलने के लिए काम कर भी रहे हैं या बस ऐसे ही जिंदगी गुजर रही है; कुछ होगा कि नहीं होगा। फिर लगता है क्या ऐसा कर दूं कि बहुत फास्ट हो जाए, पता नहीं कल जिंदगी हाथ में है कि नहीं। ये कैसे लक्षण हैं?

P12-0134

अगर मैं अपने केंद्र से हटकर कहीं अपनी बढ़ोतरी के लिए गया, दूर से लगा था कि वहां ऐसा होगा, पर वहां मुझे वो मिल नहीं रहा — तो क्या मैं दोबारा वहीं आ सकता हूं? मुझे क्या करना चाहिए?

P12-0129

मेरा आत्मचिंतन चल रहा है कि आज जो मुझे याद आ रहा है — किसी की याद, कोई स्वाद — उसका मतलब मैं उसे पहले जी चुकी हूं, और वो मेरा संस्कार बन गया। आप कहते हो उसे डिलीट करने की जरूरत नहीं, बस उसे कर्म में मत लाओ। तो यह किस तरह से काम करता है?

P12-0121

अगर मैंने कोई डिमांड की, वो सिचुएशन बनी, और मैंने उसका सदुपयोग नहीं किया — तो मैं तो गिरूंगी ही, लेकिन उस कर्म में लगे कितने लोग तो उठ जाएंगे ना? और अगर मैं वो भोजन ना खाऊं, नकार दूं या फेंक दूं, तो भी वो खराब तो नहीं हुआ, कोई ना कोई उसे खा ही लेगा?

P12-0120

सारे दिन विचार और भाव चलते रहते हैं, और मैं अपने भाव के अनुसार उन्हें बल देती रहती हूं कि मेरी जिंदगी में ऐसा होना चाहिए। फिर जब वो परिणाम रूप में आता है तो मैं डगमगा जाती हूं, कर्म में भी डगमगा जाती हूं। तो मैं भाव में अपने आप को कैसे चेक करूं और उस भाव को कैसे दृढ़ करूं कि फिर वहां न हिलूं?

P12-0117

मैं बहिर्मुखता से रोज अपने को भर रही थी, अहम या दिखावे से अपने को स्थापित करके लगता था कि मैं जिंदा हूं। आज वैसा नहीं लग रहा, कुछ होता हुआ भी नहीं दिखता, पागल जैसा लगता है — तो क्या साधना के मार्ग में यह शुभ लक्षण है? और जब ऐसा डाउट आए तब मुझे क्या देखना चाहिए?

P12-0115

मैंने जिसे जिंदगी भर तवज्जो दी, पूरा समर्पण दिया, अपनी जिंदगी की नैया की पतवार उसके हाथ में दे दी — खुद नहीं खाया, अपने शौक पूरे नहीं किए — अब वो अपनी तो डुबो ही रहा है, मेरी नैया भी डुबोने के कगार पर है। मेरे अंदर उसके लिए बहुत कुंठा और द्वेष है। अब मैं अपने आप को कैसे बचाऊं?

P12-0114

भरपाई करते वक्त क्या मुझे यह भी देखना पड़ेगा कि मैं सिर्फ अपने हिस्से का दूं, और अगर मेरे आश्रित पांच-सात लोग हैं तो उनमें कटौती ना करूं — चाहे सामने कोई गैर मर रहा हो?

P12-0102

क्या जन्म लेने का चुनाव हमने किया है?

P12-0098

मेरे समाज में कोई किसी गरीब को परेशान करता है या दुख देता है, तो मेरा मन दुखी क्यों होता है?

P12-0096

हमारा जन्म पिछले बंधनों को काटने के लिए हुआ — तो पहले कर्म हुआ या पहले जन्म हुआ?

P12-0094

मनुष्य में जितने भी अवगुण हैं, सबके परिणाम अलग-अलग मिलते हैं या एक समान?

P12-0089

क्या हमारे साथ जो हो रहा है, वह सब पहले से प्री-प्लान है?

P12-0083

क्या व्यक्ति जन्म से ही बंधनों में पैदा होता है, या बाद में अपने कर्म में फंस जाता है?

P12-0081

क्या हमारे कर्मों के आधार पर ही हमारे आगे के कर्म निर्धारित होते हैं?

P12-0078

शुभ कर्मों से शुभ कर्म बनता है और अशुभ से अशुभ; तो ईमानदारी-सत्कर्म से मुक्ति कैसे होगी? इससे भी तो प्रारब्ध बनेगा — क्या यह भी बंधन नहीं हो जाएगा?

P12-0061

अंदर पीड़ा क्यों होती है, अंदर तकलीफ क्यों होती है, इतनी बेचैनी क्यों है? अब कुछ भी समझ में नहीं आ रहा, कृपया मार्गदर्शन दीजिए।

P12-0058

क्या हमें अध्यात्म में लाने के लिए प्रकृति भी योजना बनाती है?

P12-0053

पुराने जमाने में संतों ने मेहनत-मजदूरी करके ज्ञान का प्रचार किया था; आज लोग उन्हीं के वचनों का सहारा लेकर, ऐशो-आराम की जिंदगी जीकर लोगों को ठग रहे हैं। क्या ऐसे लोगों से आत्मज्ञान संभव है?

P12-0051

आत्मज्ञान पाने का सबसे आसान तरीका क्या है, जो रास्ते में भटके बिना आत्मज्ञान तक ले जाए — अच्छे कर्म और ईमानदारी, या आध्यात्मिक चिंतन?

P12-0044

ध्यान करने और चिंतन करने में क्या अंतर है? क्या ध्यान करना लाभदायक नहीं है?

P12-0043

क्या उस आत्म तत्व ने सोच-समझकर अज्ञान को धारण किया है, या अज्ञान उसके गले पड़ गया है — जैसे हम अपनी मस्ती में रास्ते पर जा रहे हों और कुछ लोग साजिश करके हमें अपने जाल में फंसा लें?

P12-0042

क्या मुंह पर ही नहीं, अपने अंदर भी शिकायत का भाव नहीं आना चाहिए?

P12-0033

प्रकृति कब हमें कर्म करने का मौका देती है और कब हमसे कर्म करने का मौका छीन लेती है?

P12-0031

हमें ऊर्जा मिलनी बंद क्यों हो जाती है? क्या यह कोई अपराध करने से, किसी को तकलीफ देने से, अहंकार करने से या किसी दूसरे कारण से होता है? इसका समाधान क्या है?

P12-0030

संचित कर्म जल्दी कैसे खत्म करें?

P12-0025

क्या माता-पिता के कर्म का फल उनके परिवार पर भी असर डालता है?

P12-0017

मैंने अपनी पहचान गलत जगह बांध रखी है। यदि मैं इस प्रश्न के साथ बना रहूं कि मेरी असली पहचान क्या है, तो क्या मैं अपने स्व में स्थित हो जाऊंगा?

P12-0013

क्या बच्चे आत्मज्ञान की अवस्था में रहते हैं?

P12-0008

आश्रम में रहने वालों की तो आप सेवा कराकर समझ खोल देते हैं; पर गृहस्थ तो निरंतर उसी दलदल और माहौल में रहते हैं, जल्दी आ भी नहीं पाते। वे बहुत ईमानदार रहने की कोशिश करते हैं, फिर भी गिर जाते हैं। लोग गुरु की फोटो टांग लेते हैं, पूजा-पाठ करते हैं कि गुरु जी पास हैं — तो वे कैसे समझें कि गिर रहे हैं या उनसे कमी हो रही है, और कैसे सुलझें?

P12-0002

क्या आपके संघर्ष की वजह से हमारी यात्रा सरल हो गई, या हमें भी उसी स्थिति से निकलना होगा?

P11-0199

ध्यान से आनंद की ओर कैसे बढ़ूं?

P11-0193

सारे संसारी कर्म अपने आप छूट रहे हैं, एकांत में बैठी रहती हूं, रिश्ते-नाते सब पास नहीं, सारी व्यवस्था अपने आप होती जा रही है। क्या जो घट रहा है, सही है?

P11-0165

यदि जन्म किसी कर्म के परिणाम से हुआ है, तो जन्म के पहले कर्म कैसे हुआ?

P11-0159

एक जन्म से दूसरे जन्म तक कर्म का सिद्धांत कैसे काम करता है?

P11-0126

क्या सादगी से रहने वाला व्यक्ति ईमानदार होता है?

P11-0119

क्या मरने के बाद एक बार हम अपने स्वरूप को देखेंगे, पूर्ण होंगे? जैसे मुस्लिम कॉन्सेप्ट है कि मरने के बाद एक बार अल्लाह के सामने जाएंगे।

P11-0117

मन, वाणी और कर्म के शुद्धिकरण का क्या मतलब है?

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