आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

अहंकार — 84 प्रश्नोत्तर

वे प्रश्नोत्तर जिनके प्रश्न या उत्तर में “अहंकार” शब्द आता है — नए पहले।

मन353 उत्तरध्यान331 उत्तरगुरु2,248 उत्तरकर्म580 उत्तरअहंकार84 उत्तरमृत्यु43 उत्तरपरिवार239 उत्तरसेवा321 उत्तरडर138 उत्तरक्रोध46 उत्तर

P23-0188

गुरु जी, अहंकार को पूर्ण रूप से कैसे खत्म करें?

P23-0104

गुरु जी, मालिकपन से सेवक बनना है — तो किनका सेवक बनना है? सेवकपन का भाव कैसे लाएं?

P23-0103

गुरु जी, एक भाषा में कहा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ — ये सब शरीर में हैं? कुछ लोग अंतःकरण चतुष्टय बताते हैं — मन, बुद्धि, चित्त और आखिर में अहंकार — कि अहंकार नष्ट किए बिना सर्वेश्वर तक नहीं पहुंचोगे।

P22-0121

गुरु जी, रावण भी आत्मज्ञानी था, फिर उसमें अहंकार कैसे आया और वह भगवान राम को क्यों नहीं जान पाया? क्या इसका मतलब हम लोग भी आत्मज्ञान के बाद दोबारा रावण जैसी हरकत करने लगेंगे?

P22-0001

गुरु जी, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि जो जीव शरीर को चला रहा है उसी को निकाल दें, तो शरीर बेकार हो जाएगा, कुछ कर्म नहीं करेगा?

P21-0190

गुरु जी, मेरे दो प्रश्न हैं — पहला, अहंकार और शरीर ही मेरी पहचान है, तो अपनी असली पहचान समझने का मकसद क्या है? दूसरा, यहां जितने लोग जमा हैं ज्यादातर बुजुर्ग हैं; सबने आज तक घर-परिवार चलाया, पर परिवार के सदस्य अपनी मनमानी करके चले गए — तो ऐसे लोगों को पालने का क्या मतलब?

P21-0187

गुरु जी, और "कर्ता" का मतलब क्या है?

P21-0031

शबरी जंगल में रहकर इंतजार करती थी — क्या कोई अपने ही घर, किसी खाली फ्लैट में एकांत करके यह सब नहीं कर सकता, जैसे घरवाले कहते हैं "यहीं व्यवस्था कर देते हैं"?

P21-0027

ऐसी सुनसान जगह में अकेले बैठना या कोई एकांत मंदिर ढूंढ लेना — खुद को जानने में यह कितना सहायक है?

P20-0153

ऑफिस में मैं जिम्मेदारी से काम करती हूं और कभी लोगों को कह देती हूं "मैं काम छोड़ूंगी तब पता चलेगा" — क्या ईमानदारी के साथ अहंकार भी आता है?

P20-0131

अगर कभी सूक्ष्म अहंकार आ जाए तो क्या करें — गुरु के दर पर कैसे टिके रहें?

P20-0119

मुझे जो भी सेवा मिले, गुरु दर न छूटे, यह भाव कम न हो और अहंकार मुझ पर काम न करे — इसके लिए क्या करूं?

P20-0118

सेवा करते हुए "मैं ही यह कर रहा हूं, मेरे बिना नहीं होगा" — यह अहंकार न पकड़े, इसके लिए क्या समझें?

P20-0076

गुरु जी, परिवार में कोई बार-बार समझाने पर भी न समझे तो हमारा कर्तव्य क्या है, और कब उसका त्याग कर देना चाहिए?

P19-0113

गुरु जी, आप कहते हो कि आपने कभी किसी के दरवाजे जाकर भोजन तक नहीं मांगा। क्या यह अहंकार की बात नहीं हुई?

P19-0052

गुरु जी, योग्यता से अधिक पाने की लालसा, पाप, दुख और गलत कैसे है? 90% लोग योग्यता से ज्यादा पाकर ही मजे में रहते हैं।

P18-0193

गुरु जी, अभाव, कुभाव और स्वभाव वाले साधक कौन होते हैं और किस तरह के गुरु के पास जाते हैं?

P18-0042

गुरु जी, जब अवधूत स्थिति तक पहुंचते हैं, तो क्या फिर मां का (इष्ट का) दर्शन संभव है?

P18-0004

गुरु जी, आज अध्यात्म में भी "मेरा गुरु ठीक, उसका गुरु खराब" — एक-दूसरे की निंदा होती है, और कहीं-कहीं गुरु के पांव धोकर पानी पिलाया जाता है। गुरु क्या है?

P17-0165

गुरु जी, प्रेम में स्वाभिमान होना चाहिए या नहीं? अगर प्रेमी अपमान करे और हम कठोरता से प्रतिक्रिया दें तो क्या वह अहंकार होगा?

P17-0109

गुरु जी, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — ये पांच स्थूल तत्व, और मन, बुद्धि, अहंकार — कोई कहता है ये आठों निकृष्ट हैं। क्या भगवान ने निकृष्ट चीजें बनाईं?

P17-0041

गुरु जी, अंतःकरण — जिसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कहते हैं — ये किस तरीके से काम करते हैं? और "मन को मार गगन चढ़ जाई, मानसरोवर पैठ नहाई" — तो क्या मन को मारना पड़ता है?

P16-0163

(लाइव) पंच तत्व क्या होते हैं? तत्व तो 24 बताए गए हैं।

P16-0085

अहंकार को त्यागने का सबसे आसान तरीका क्या है?

P15-0163

गुरु जी, मद और अभिमान में क्या अंतर है?

P15-0150

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — ये अंतःकरण में, शरीर में कहां रहते हैं? कोई कहता है यह शरीर ही मन है — क्या यह सही है?

P15-0137

गुरु जी, काम, क्रोध, मोह, लोभ — ये सब आत्मज्ञान के बाद खत्म होते हैं या फिर ब्रह्मज्ञान के बाद?

P14-0166

अनुमान किस प्रकार का है जिससे कर्तापन का बोध हो रहा है? करते हुए भी कर्तापन कैसे छोड़ सकते हैं?

P14-0104

गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है।

P14-0103

गुरु जी, संतों ने कहा है कि इतनी तपस्या करो कि गुरु को ढूंढने की जरूरत ना पड़े, वो खुद मिल जाएंगे — पर कैसे पता चलेगा कि वो खुद मिलने आए हैं?

P14-0097

गुरु जी, 'मैं' को कैसे मिटाएं?

P14-0081

गुरु जी, पहले अवधारणा थी कि ज्ञान के बाद यह माया समाप्त हो जाएगी, परंतु ज्ञान के पश्चात भी अनुभव हुआ कि माया कार्य करती है — ऐसा क्यों?

P14-0043

गुरु जी, कई बार मैं ऐसे आनंद में बैठा रहता हूं — ना कोई चमक, ना कोई विचार — पता नहीं ये कौन सी स्थिति है?

P14-0035

गुरु जी, जो तप करके अपने को मिटा देगा, वो भी तो फिर कुछ हो जाएगा — कुछ होने के लिए ही तो उसने तप किया?

P13-0179

गुरु जी, क्या मात्र अंतर्मुख होकर अपने विचारों को देखने से आसक्ति, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार समाप्त हो सकते हैं, या साथ में ईमानदारी-सत्कर्म भी हो?

P13-0167

गुरु जी, जन्म से कोई ब्रह्मचर्य का पालन करता है तो कोई संसार के भोग भोगता है — तो किसको आत्मज्ञान होता है?

P13-0063

कहते हैं ध्यान लगाओ, ध्यान लगाओ — ध्यान लगाएं कैसे? ध्यान क्या है?

P13-0040

गुरु जी, आपने एक बार श्रीलंका का बताया था कि वहां लोग हॉर्न नहीं बजाते, और कहा था कि यह भी अहंकार है। मुझे गाड़ी चलाते हुए हॉर्न बजाने की बहुत आदत थी; वह बात समझकर अब नहीं बजाता। और यह भी समझा कि जल्दी पहुंचना चाहते हैं, वह भी अहंकार है।

P13-0039

गुरु जी, पहले नाम जप करते थे, सिमरन-वाणी पढ़ते थे, तो अहंकार आ जाता था; काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उसके अंदर ही चलते थे। लेकिन आपके ज्ञान को अपनाते हैं तो इनका बल क्षीण होने लगता है — यह मैंने महसूस किया; स्वभाव बदलने की कोई कोशिश भी नहीं करनी पड़ती।

P12-0156

दैनिक अभ्यास में हम कुछ ऐसा कर पाएं जिससे कि अपनी चेतना का विस्तार हो — वो क्या करें?

P12-0138

आप कहते हो ईमानदारी और सत्कर्म करो, और सत्कर्म का मतलब है जरूरतमंद की सेवा। हम चाहते हैं कि जल्दी आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, पर हम जरूरतमंद को ढूंढ भी नहीं सकेंगे, पता कैसे करेंगे कि जरूरतमंद है या नहीं, और जबरदस्ती ढूंढूं तो अहंकार भी आ जाएगा। तो यह कैसे संभव है कि प्रकृति मेरे सामने ऐसे मौके दे?

P12-0136

कभी-कभी इतना तगड़ा वैराग्य आता है, इतनी बेचैनी होती है कि खुद पर शक हो जाता है — पता नहीं हम निकलने के लिए काम कर भी रहे हैं या बस ऐसे ही जिंदगी गुजर रही है; कुछ होगा कि नहीं होगा। फिर लगता है क्या ऐसा कर दूं कि बहुत फास्ट हो जाए, पता नहीं कल जिंदगी हाथ में है कि नहीं। ये कैसे लक्षण हैं?

P12-0131

पुराने संस्कार मुझे खींचते हैं, एक झटके में इतनी तगड़ी याद आती है कि लगता है ज्ञान धरा का धरा रह गया; अहंकार पर चोट लगती है तो लगता है यहां से भाग जाऊं। मैं शरीर से तो नहीं जाऊंगी, लेकिन उस मानसिक पीड़ा के समय मैं कौन सा मंत्र या बात याद रखूं कि मुझे निकलना है? और ये चीजें कितने दिन तक काम करती हैं?

P12-0110

आपने कुटिया के आश्रमवासियों से कहा कि जो भी आए उसे अच्छे से खिलाओ-पिलाओ, ताकि देने का स्वभाव आए। तो हम संसार में या आपके साथ भी बांटने लग जाते हैं कि योगी जी खुश होंगे, और फिर आप कहते हो कि तुम अपना मान खड़ा कर रहे हो। इसे मैं कहां तक सही मानूं?

P12-0031

हमें ऊर्जा मिलनी बंद क्यों हो जाती है? क्या यह कोई अपराध करने से, किसी को तकलीफ देने से, अहंकार करने से या किसी दूसरे कारण से होता है? इसका समाधान क्या है?

P11-0157

दृष्टा को देखने के लिए अहंकार को कैसे खत्म करें?

P11-0146

आत्मिकता से किसी से लेनदेन करें, और अहंकार से करें — इसका हमारे और सामने वाले के आत्मिक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

P11-0090

जिनको आत्मज्ञान हो चुका है, क्या उन्हें भी क्रोध आता है?

P11-0024

मैंने घर वालों से कहा है कि मेरे लिए किसी प्लॉट में एक कुटिया बनवा दो, उसमें रहकर साधना करूंगी।

P10-0117

आप कहते हैं कि सामर्थ्यवान बनो, पर क्या सामर्थ्यवान बनने से अहंकार नहीं बढ़ेगा?

P9-0019

मेरा एक प्रश्न है। मैं और आत्मा का संबंध क्या है? जो कुछ मैं करता हूं, वह मैं भोगता हूं या आत्मा?

P8-0198

मैं को अहंकार क्यों नहीं कहा जाता?

P8-0161

अहंकार का त्याग कैसे करें?

P8-0149

अटैचमेंट क्यों है, यह नहीं पता। अपने आप हो रहा है। अहंकार भी हो रहा है। मैं जागरूक हूं, फंसा हूं, पता है, लेकिन निकल नहीं पा रहा हूं। मार्ग दिखाएं।

P8-0129

अहंकार को कम कैसे करें?

P8-0054

अहम क्या है, और यह क्यों आता है? क्या हमारे जीवन में इसकी कोई जरूरत है?

P7-0162

संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें?

P7-0152

अहम भाव को पूरी तरह कैसे खत्म करें? आपने कहा था कि दूसरों से अपने हिसाब से काम लेने की उम्मीद छोड़ दो, उससे आधी समस्या हल हुई। पूरी तरह अहम कैसे मिटे? काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में काम किसे कहते हैं, कामना को या वासना को? मोह और लोभ किस स्थिति में होते हैं? इन्हीं दो पर सबसे ज्यादा संदेह रहता है।

P7-0136

गुरु जी, कम बोलना, कम सुनना और कम देखना कैसे पूरी तरह संभव हो? कृपया बताएँ।

P6-0095

यदि मैंने संकल्प किया और वह पूरा हो जाता है, तो क्या इसमें अहंकार नहीं आ जाता?

P6-0036

दूसरे के प्रश्न में टोकना / कमजोर समझना सही?

P5-0118

मन पर नियंत्रण कैसे हो?

P5-0042

(पूजा) कैसे सुनिश्चित करें कि मुझ में आध्यात्मिक अहंकार नहीं आ रहा है? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

P5-0037

क्या आपको कोई आत्मज्ञानी मिला? तीन अद्भुत लोगों की घटना क्या है?

P5-0032

आत्मज्ञान हुआ तो क्या ऐसी चीजें बता सकते हैं जिससे पता चले कि हो गया? प्रश्न फिर खड़े होते हैं क्या?

P5-0018

(कुटिया में बालक, जिन्हें पहले भगाया गया था) आपको तो आना मना था, आपने भगा दिया था — फिर आए क्यों? और उस दिन रात को माँ के साथ क्यों चले गए?

P5-0016

(कुटिया में एक युवक) किताबों में पढ़ते हैं कि दूसरों के अनुभव से सीख लो; गीता में श्री कृष्ण ने बताया कि ये काम करो, ये मत करो — पर सुनकर, ज्ञान और समझ होते हुए भी मन नहीं मानता, कहता है एक बार करके देखते हैं। आपने भी कहा था कि आप हर जगह गए, यह देखने के लिए कि वहां कुछ नहीं है। तो जब कृष्ण ने कह दिया कि भगवान बाहर नहीं है, फिर भी मन मानता नहीं — मन को कैसे मनाऊं? किसकी बात सही मानूं?

P5-0011

(वही साधिका) ऐसी जगह रहने का मन करता है, पर ये भी रहता है कि अपनी जगह हो। क्या यहां रह सकते हैं? और दूसरों के यहां जाओ तो कुछ बंधन होते हैं, उनके नियम के अनुसार चलना पड़ता है।

P4-0188

(कुटिया में आई एक साधिका, जो चार साल से इस रास्ते पर है) मैंने पढ़ा कि आत्मा को ना जाना जा सकता, ना देखा-सुना जा सकता, तो उसके बारे में बात करना व्यर्थ है; बात तो इस अहम की करनी है जो 'मैं' और 'मेरा' कहता है। जब तक यह शरीर है, अहम भी साथ है — तो इस अहम से कैसे बाहर निकलें?

P4-0187

(कुटिया में एक साधक) हम महात्माओं की बहुत सी किताबें पढ़ते हैं, कहानियां अच्छी लगती हैं, पर उनमें क्या खोज करना है यह नहीं सोचते। कोई कहता है किताब पढ़ना छोड़ दो — किताब में बारिश का वर्णन है, पर किताब निचोड़ने से बारिश नहीं होती। क्या यहां आने के बाद भी किताबें पढ़ सकते हैं? जिज्ञासु बनने के लिए कुछ आधार तो चाहिए।

P4-0176

(कुटिया में गोयल जी) कभी संभल जाते हैं, कभी गलती हो जाती है, कभी भटक जाते हैं — क्या करें?

P4-0165

(वही साधिका) मैं आपकी बात स्वीकार करती हूं — 'आई एक्सेप्ट इट'। (इस पर) प्रत्यक्ष ज्ञान को 'स्वीकार करना' क्या है?

P4-0082

(लाइव) गुरु जी प्रणाम। कुटिया में रहने वाले जिज्ञासु को जब उसकी गलती के लिए आप बोलते हो, तो उसकी गलत आदत नहीं निकलती और वही कुटिया से निकल जाता है। कुटिया में बने रहकर सधने के लिए उसे क्या करना चाहिए?

P4-0078

(कुटिया में साधक) गुरु जी, आप कुछ बोल रहे थे — वो मैं जानना चाह रहा था कि आसन में कैसे नहीं बैठते? मतलब बैठने में हम क्या गलती कर देते हैं?

P4-0067

(कुटिया में, एक शिक्षक साधक) आप (किसी शहर में) तीन दिन — रोज दो घंटा — सत्संग के लिए आ सकते हैं? (गोयल जी ने 6 लाख देकर सत्संग कराया था।) मन तो है कि मैं भी करवाऊं, लेकिन इतनी ताकत नहीं — 1 लाख पगार है, पर साथ में 10 लाख का कर्जा है। और हम (घर-परिवार से) अलग में हैं, इसलिए भगवान का भाग निकालना समझ में आता है।

P3-0200

(लाइव) गुरु जी प्रणाम। अहंकार नहीं छूटता। किसी भी काम को करते हैं तो ‘मैंने किया’ — यह भाव बना रहता है। कृपया मार्गदर्शन करें।

P3-0152

गुरु जी, दो-तीन महीने साधना से लग रहा है कि मैं काम-क्रोध से दूर जा रहा हूं; अकेले में लगता है मैं कंट्रोल कर सकता हूं, लेकिन जैसे ही उस परिस्थिति के बीच आते हैं, कंट्रोल नहीं रहता, हम उसके वश में चले जाते हैं — अपने आप कुछ घटित हो जाता है। उस समय क्या करें? मन (माइंड) को कैसे कंट्रोल करें, और काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से कैसे छूटें?

P3-0070

सेवा करते अहंकार/प्रतिस्पर्धा — 'मैं सेवा कर रहा' भाव; सुविधा नहीं ज्ञान/समाज निमित्त चाहिए?

P3-0068

सुधरने गए पर डांट लगे तो दिल दुखे — अहंकार से कैसे बाहर? आवेश आने पर क्या करें?

P2-0198

महानगरों में रहने वाले लोग, जो आपसे जुड़े हैं, अब समझ रहे हैं कि नौकरी में ईमानदार तो रहे, पर सत्कर्म नहीं किया — मुंह लक्ष्य की ओर रहा, पर कदम नहीं बढ़े। पर महानगरों में पक्षियों-चींटियों को दाना डालने की जगह या सच्चे जरूरतमंद ढूंढना मुश्किल है; भिखारी भी ₹1 दो तो ऐसे देखते हैं जैसे अपमान कर दिया। वहां हम क्या सत्कर्म कर सकते हैं?

P2-0105

मद, लोभ, मोह — इनमें ‘मद’ क्या है?

P2-0082

गुरु जी, ‘मात नर्मदे हर’ का क्या अर्थ है?

P1-0171

गुरु जी ने बताया था कि लोग आवरण देखकर आपसे जुड़ना चाहते हैं; कोई यह नहीं सोचता कि असल में व्यक्ति कौन है और क्या सोचता है। आप ‘ठीक’ शब्द के प्रयोग की बात करते हैं — उसके पीछे क्या सोच है? और (समय आदि का) अनुमान लगाना कहां तक ठीक है?

P1-0164

जरूरत में रहते हुए भी — मान लीजिए मुझे फॉर्च्यूनर, किसी स्थान या पद की जरूरत है — उसमें रहते हुए अहम भाव को कैसे अलग रखें, कि मैं उससे जुड़ा नहीं हूं, और यह अहंकार न आए कि मैंने इतना इकट्ठा कर लिया तो समाज में मेरा रुतबा बढ़ गया? उन सुविधाओं से अपने आप को डिटैच कैसे रखें?