आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

मन — 353 प्रश्नोत्तर

वे प्रश्नोत्तर जिनके प्रश्न या उत्तर में “मन” शब्द आता है — नए पहले।

मन353 उत्तरध्यान331 उत्तरगुरु2,248 उत्तरकर्म580 उत्तरअहंकार84 उत्तरमृत्यु43 उत्तरपरिवार239 उत्तरसेवा321 उत्तरडर138 उत्तरक्रोध46 उत्तर

P23-0177

गुरु जी, काम और राम दोनों में मन भागता है, उसका क्या करें? और राम में मन कैसे लगाएं?

P23-0171

गुरु जी, मन को कैसे स्थिर किया जाता है?

P23-0167

गुरु जी, नाम देने वाले कहते हैं कि नाम और नामी एक हैं। इसका क्या अर्थ है?

P23-0153

गुरुदेव, तीन साल से नॉनवेज छोड़ा हुआ है, लेकिन दोस्त बोलते हैं कि होटल में नॉनवेज अच्छा मिलता है, तो मन में आता है एक बार खा लूं, फिर छोड़ दूं। क्या करूं, मार्गदर्शन करें।

P23-0118

गुरु जी, आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में आ जाएं — तो जीवन कैसे कटेगा? आम तौर पर तो शरीर और मन की जरूरत पूरी करते-करते जीवन कट जाता है, बड़े दुख मिलते हैं।

P23-0103

गुरु जी, एक भाषा में कहा जाए तो मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ — ये सब शरीर में हैं? कुछ लोग अंतःकरण चतुष्टय बताते हैं — मन, बुद्धि, चित्त और आखिर में अहंकार — कि अहंकार नष्ट किए बिना सर्वेश्वर तक नहीं पहुंचोगे।

P23-0101

गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है?

P23-0100

गुरु जी, यह उम्मीद रहती कहां पर है — मेरे मन में या मेरी बुद्धि में?

P23-0086

गुरु जी, एकांत में शांति से अपनी चटाई लेकर बैठते हैं; अभी तक तो हम ध्यान करते थे — अब ध्यान नहीं करना है, तो अब क्या करें? केवल चुपचाप बैठें? अपने आप में ही आनंद है, तो अपने आप को कैसे सोचें?

P23-0063

गुरु जी, विकारों से बचें कैसे? जैसे किसी का ड्रिंक करने का मन हो रहा है, स्मोक करने का मन हो रहा है — यह एक विकार है, अब वह उसके दिमाग में आया तो उससे वह कैसे बचेगा? इसके लिए तो सेल्फ कॉन्फिडेंस, विल पावर होना जरूरी है?

P23-0046

गुरु जी, पहले भाव बनता है कि एकांत में जाएं, वहां हम अपनी साधना अच्छी तरह से कर पाएंगे; लेकिन जब एकांत मिलता है, सानिध्य मिलता है, तो वहां व्याकुलता होती है, भागने का मन होता है। ऐसा क्यों? हम एकांत को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते?

P23-0022

गुरु जी, उपलब्धि के बाद भी लोगों ने भोजन मांगा — भूख लगी, भूख का विचार आया, तभी भोजन मांगा। तो विचार से मुक्त कैसे होते हैं?

P22-0141

गुरु जी, थोड़ा और समझाइए — ये पांच इंद्रियों का सब बाहरी है: खाना बन रहा है तो स्मेल आ रही है, देखने से (जैसे आम का उदाहरण), सुनने से भी मन में वैसा दिखने लगता है। मैं पहले सोच रही थी कि सब मन से हो रहा है। ये समझ में आने के बाद हमें क्या करना है?

P22-0127

गुरु जी, आप कहते हैं ईमानदारी और सत्कर्म करो; लोग कोशिश कर रहे हैं पर पूरी तरह नहीं आ पाए। जो चीज हमें सिखाई जाती है, मन उसे ना करके दूसरी तरफ जाता है — जैसे बच्चे को बोल दिया कि वहां नहीं जाना है तो उसे वहां का पता ही दे दिया। तो क्या समाज इस कारण खराब हो रहा है कि उसे अच्छा बनाने की कोशिश की गई?

P22-0120

गुरु जी, साधु बनने की शुरुआत में चार चीजें मुख्य बताई जाती हैं — आसन, बासन, सोटा और कमंडल; डंडे को 'कोतवाल' भी कहते हैं, कहते हैं इसे हमेशा हाथ में रखना जरूरी है, इससे पहचान होती है। लेकिन फंसाव भी हो जाता है कि मन कमंडल में ही बस जाता है कि कहीं कोई ले न जाए — क्या इसीलिए आपने सब कुछ खत्म कर दिया?

P22-0099

गुरु जी, मेरी कमजोरी खाना है। मैं हेल्दी खाती हूं — रोज मूंग दाल खिचड़ी, सुबह दही और फल — लेकिन कभी-कभी समोसा, मिठाई जैसा कुछ खाने का बहुत मन करता है और मैं खा लेती हूं; एक महीना ठीक रहता है, फिर वही। इसे कैसे रेगुलेट करूं?

P22-0096

गुरु जी, यहां से घर जाने के बाद हमारी दिनचर्या कैसी होनी चाहिए — कम खाना, भोजन, ध्यान, घर पे क्या करना है? थोड़ा इस पर भी प्रकाश डालिए।

P22-0086

गुरु जी, अगर ऑनलाइन किसी की कॉल आई, सेवा भाव भी है, लेकिन मन में शंका है और जांच-परख नहीं पा रहे — तो क्या मना कर दें? मना कर दिया और वह सच में जरूरतमंद हुआ तो भी पछतावा होगा।

P22-0067

गुरु जी, कभी दिमाग में कोई विचार चलता है तो मन उसके साथ एक हो जाता है, फिर उस विचार पर डिसीजन लेने में कन्फ्यूजन आता है — हम सिलेक्शन नहीं कर पाते कि सही क्या है, गलत क्या है।

P22-0046

गुरु जी, कभी-कभी मन में बहुत लड़ाई — इंटरनल वॉर — होती है; जाना इस तरफ है पर उस तरफ खींचता है, इतना कन्फ्यूजन होता है कि समझ नहीं आता क्या करूं, तो मैं बहुत चिल्लाती हूं; कभी-कभी गुरु से भी गुस्सा आता है। फिर थोड़ी देर बाद अपने को ऑब्जर्व करती हूं तो समाधान मिल जाता है — यह क्या है?

P21-0199

गुरु जी, मेरा मन और बुद्धि जो बताएंगे, उसी हिसाब से तो हम करते हैं — तो करने वाला मन-बुद्धि है ना?

P21-0136

गुरु जी, जब हम बैठते हैं, अपने में होने का प्रयास करते हैं, तो मन में अलग-अलग विचार चलने लगते हैं — क्या करें?

P21-0125

गुरु जी, मन बहुत चंचल रहता है, इधर-उधर भागता है — उसे कंट्रोल कैसे करें?

P21-0087

महाराज, बीवी कहती है रोज मंदिर जाओ, पूजा-पाठ करो — वो धक्का देकर भेजती है, पर मेरा मन जाने का नहीं करता। क्या मंदिर न जाने से पाप लगेगा?

P21-0085

गुरु जी, आपने कहा शब्द पकड़ो, शब्द वहां तक ले जाएगा — पर शब्द जहां से आएगा वहीं तक ले जाएगा ना? शब्द बुद्धि के तल से, मन के तल से निकल रहा है, तो क्या वह उस निराकार तक ले जाएगा जहां कोई शब्द है ही नहीं?

P21-0083

गुरु जी, बात सब समझ आती है, लेकिन मन फिर उसी तरफ चला जाता है — क्या करें?

P21-0079

गुरु जी, आत्मज्ञान के लिए दृढ़ निश्चय के लक्षण क्या हैं — कि मुझे आत्मज्ञान ही चाहिए?

P21-0072

गुरु जी, आज बारिश हो रही थी तो मन ने आने से रोक दिया, जबकि आप भी 12 साल पैरों में छाले लेकर चलते रहे — मन ऐसा क्यों रोक देता है?

P21-0060

गुरु जी, कई बार लगता है बस अपने मन की बात करने के लिए कोई चाहिए जो मुझे समझ ले — किसी से जम ही नहीं रही, लोग कहते हैं सारे संसार में तुझे ही कोई नहीं समझ रहा तो शायद तेरे में ही प्रॉब्लम है। क्या करूं?

P21-0059

गुरु जी, ठीक शब्द अपनाने से लोग धीरे-धीरे दूर हो गए, अब अकेलापन सताता है। मन करता है अपने मार्ग के सत्संगियों के साथ बैठकर बातें करूं, जबकि पहुंचा तो कोई भी नहीं है — क्या यह ठीक है?

P20-0142

मैंने गुरु के मन को कितना दर्द दिया होगा — क्या ज्ञानी को हमारी गलती से दर्द होता है?

P20-0141

गुरु जी, कई साल पहले मुझसे गलती हुई — एक गुरु ने सरेंडर करने को कहा, मैंने नहीं किया, वे चले गए; अब भी मन में घुटन है, क्या करूं?

P20-0131

अगर कभी सूक्ष्म अहंकार आ जाए तो क्या करें — गुरु के दर पर कैसे टिके रहें?

P20-0114

मेरी ईमानदारी की कमाई 10 लाख है, उसमें से 5 लाख ज्ञान प्रसारण में लगाना चाहूं तो मन डरता है — कल अस्पताल की जरूरत पड़ी तो? इस डर से कैसे निकलें?

P20-0099

गुरु जी, अवचेतन मन को खाली कैसे करें?

P20-0090

गुरु जी, क्या परमात्मा को पाना मतलब मन को सही तरीके से सुलझा लेना है?

P20-0054

गुरु जी, मन कहता है सब कुछ चाहिए और आप कहते हैं कुछ नहीं चाहिए में टिक जाऊं — यह कैसे संभव है?

P20-0038

गुरु जी, क्या भगवान को पाने के लिए वेद-पुराण-शास्त्र पढ़ना जरूरी है? पढ़ने में मन नहीं लगता, सत्संग सुनने में आनंद आता है।

P20-0034

गुरु जी, क्या आत्मज्ञान से पहले जीवन में सिर्फ दुख ही लिखा होता है?

P20-0015

गुरु जी, किसी से वाद-विवाद हो जाए तो ध्यान बार-बार उसी पर जाता है — वहां से कैसे हटाएं?

P20-0013

गुरु जी, रात को स्वप्न में कामवासना आ जाती है, फिर मन खराब होकर संसार में चला जाता है — इसका समाधान क्या है?

P19-0183

गुरु जी, वासना मन से क्यों नहीं जाती, समय-समय पर उठ आती है?

P19-0178

गुरु जी, ध्यान में मन प्रभु की तरफ नहीं लगता, दैनिक कार्यों की तरफ चला जाता है; घर-परिवार में रहते हुए गहरा ध्यान कैसे करें?

P19-0133

गुरु जी, आपकी बात पर एक व्यक्ति ने मजाक-मजाक में आपको गहरा घाव कर दिया था। उस घटना से आपने क्या सीखा?

P19-0128

गुरु जी, मैंने "ठीक" शब्द का प्रयोग शुरू कर दिया है, लेकिन मन में फिर भी अच्छा-बुरा का भाव आ जाता है, और सामने वाला भी अच्छा सुनने की उम्मीद करता है। क्या करूं?

P19-0107

गुरु जी, साधकों की यही शिकायत रहती है कि कुछ होता नहीं। ऐसा क्यों?

P19-0076

गुरु जी, मन को कैसे समझाएं?

P19-0075

गुरु जी, नौकरी/पोस्ट छोड़कर साधना करूं? जरूरत कभी पूरी नहीं होती।

P19-0038

गुरु जी, कबीर साहब ने कहा "मन मरा ना माया मरी, मर मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी" — यानी मन नहीं मरेगा तब तक विकार नहीं जाएंगे। आप कहते हैं मन है — तो क्या ज्ञान के बाद मन कमजोर हो जाता है?

P19-0030

गुरु जी, जब परमात्मा की ओर दृष्टि जाती है कि हमें मुक्त होना है, तो वहां भी तो मन ही लेकर जाता है? और परमात्मा में मन उतनी ही देर लगता है जितनी देर संसार में, फिर हट जाता है — क्यों?

P19-0029

गुरु जी, मन का स्थान कहां है? कोई हृदय में बताता है, कोई मन को जड़ कहता है, कोई ज्योति स्वरूप।

P19-0028

गुरु जी, मैं कामनाओं को छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन पूरा छोड़ नहीं पा रहा — मार्ग दिखाइए। मन मुझे यहां-वहां ले जाता है।

P19-0027

गुरु जी, रजनीश (ओशो) ने आत्मज्ञान के लिए मेडिटेशन पर जोर दिया, आप सद्गुण पर बल देते हैं — क्या दोनों साथ लेकर बढ़ा जा सकता है?

P19-0021

गुरु जी, आप आत्मज्ञान को उदाहरणों से समझाते हैं, पर उदाहरण भी संसार से, मन की स्मृति से आते हैं, वे तो सिर्फ तर्क और विचार हैं, सत्य नहीं — फिर उनसे आत्मज्ञान कैसे?

P19-0004

गुरु जी, ध्यान में कान दबाकर या बिना कानों के जो अंदर की धुन (अनहद) सुनाई देती है, वह क्या है?

P18-0200

गुरु जी, संत-महात्माओं की वाणियों में परमात्मा की महिमा गाई गई है, बाइबल कहती है "इन द बिगिनिंग वाज द वर्ड" — क्या किसी ने बताया कि परमात्मा कैसा है?

P18-0188

गुरु जी, ऋषि-मुनि और सत्संग कहते हैं कि यह जग मिथ्या है, दुखालय है, मृत्युलोक है, यहां से जल्दी निकलो — तो क्या यह सही है?

P18-0187

गुरु जी, अगर परमात्मा ने दुनिया बनाई तो सुख की दुनिया क्यों नहीं बनाई? यहां इतना दुख क्यों है?

P18-0175

गुरु जी, प्रश्न बनते रहते हैं, सॉल्व होते हैं, फिर नए आते हैं, और समय पर न पूछें तो भूल भी जाते हैं — इन प्रश्नों का क्या करें?

P18-0171

गुरु जी, चित्त कभी राग में जाता है कभी द्वेष में, और मन बिना हमारे चाहे रेंडम कहीं भी घूमता है, ऑटोमेटिक विचार आते हैं — इसे कैसे संभालें? क्या विचारों को रोकना है?

P18-0169

गुरु जी, विचार सूक्ष्म हो जाने से क्या होता है? और आत्मज्ञान के बाद शरीर, मन और अंतःकरण में कैसे परिवर्तन आते हैं?

P18-0163

गुरु जी, जागृत अवस्था में इच्छा नहीं होती, लेकिन मन सपने में अपनी इच्छा पूरी करता है, दृश्य बनाता है — इसे नियंत्रण में कैसे लाएं?

P18-0129

गुरु जी, अपना और पराया क्या है?

P18-0126

गुरु जी, आपने अपने गुरु से पूछा था कि 41 दिन में क्या मैं जीवित भी रहूंगा — तो क्या उन महाराज जी को भी आपसे यही पूछना चाहिए था? क्या कोई आत्मज्ञान का समय दे सकता है?

P18-0119

गुरु जी, कभी सामने वाले के मन में यह होता है कि "मुझसे छोटा मुझे ज्ञान दे?" — और अगर हमारे आसपास सब अपने ही ऐसे हों, तो क्या करें?

P18-0109

गुरु जी, क्या अंतर्मन से कोई आवाज आती है जो बताए कि सही क्या है और गलत क्या — क्या यह आत्मज्ञान के बाद संभव है?

P18-0107

गुरु जी, मैं मन के विचारों से परेशान हूं, मुझे मन से मुक्ति चाहिए।

P18-0103

गुरु जी, मन अशांत है, सिर्फ गलत विचार आते हैं — क्या करें?

P18-0101

गुरु जी, क्या प्रार्थना में ताकत होती है? कर्म करते हुए अच्छे मन से की हुई प्रार्थना फलित होती है?

P18-0094

गुरु जी, ध्यान करते वक्त मन में परेशानी और घबराहट होती है — मन इतने विचार क्यों देता है, और स्थिरता कैसे बने?

P18-0087

गुरु जी, मन भटकता रहता है — क्या कल्पना करना और फिर उस कल्पना को बार-बार देखकर सही निर्णय लेना ही ध्यान है?

P18-0057

गुरु जी, कोई नियम लिया है, 10 में से 8 बार हो पाता है, 2 बार चूक जाते हैं तो मन में ग्लानि होती है; कभी लगता है नियम में ही फंस रहे हैं, कोई नियम न रखें — क्या करें?

P18-0047

गुरु जी, कहा जाता है कि नाम जप से मन पर ठहराव आता है — क्या नाम जप से विचार रुक जाते हैं और पिछले कर्म कटते हैं?

P18-0046

गुरु जी, मैं ध्यान हटाकर सिर्फ नाम पर केंद्रित होकर निरंतर नाम जप कर रहा हूं और सोच को रोक रहा हूं — क्या यह सही है? इसका क्या परिणाम होगा, या यह भटकाव है?

P18-0032

गुरु जी, ज्योतिष क्या है — क्या यह हमें कहीं मदद करता है? और क्या ज्योतिष से जाना जा सकता है कि हम आत्मज्ञान की स्थिति के कितने करीब हैं?

P18-0029

गुरु जी, "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" — मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। मन पर इंद्रियजीत कैसे हों — क्या प्रैक्टिस से अनुशासन बने कि मन बाधक न बने?

P18-0020

गुरु जी, साधन पथ में बार-बार अवरोध आता है — गिरते-पड़ते फिर वहीं आ जाते हैं, मन में बड़ी तड़प है। इस अवरोध को कैसे मिटाएं?

P18-0019

गुरु जी, माया का प्रसार समुद्र जैसा है, समाज रुकने नहीं देता, साधना पर चलते ही विघ्न आते हैं और मन बहाने बना देता है। वह कृपा कैसे प्राप्त हो कि व्यक्ति एकनिष्ठ होकर साधन पथ पर चल पाए और पार हो जाए?

P18-0012

गुरु जी, उस समय (आत्मज्ञान की) मन-स्थिति, भाव-स्थिति क्या होती है?

P18-0003

गुरु जी, आज मां-बाप को बच्चों से डरकर बात करनी पड़ती है और वृद्धाश्रम बढ़ते जा रहे हैं — इसका कारण क्या है?

P18-0002

गुरु जी, आज लोग खुलकर कहते हैं कि बेईमानी के बिना चलेगा ही नहीं — बच्चों को अच्छी शिक्षा देनी है तो बेईमानी करनी पड़ेगी। क्या सच में जीवन जीने के लिए बेईमानी जरूरी है?

P17-0188

गुरु जी, रास्ते में कोई जीव मृत पड़ा मिलता है तो मैं उसे रास्ते से हटा देता हूं (या दबा देता हूं) — क्या यह सत्कर्म है?

P17-0172

गुरु जी, सत्य वचन सुनकर अगर पीड़ा हो, तो क्या समझ लेना चाहिए कि हमारा मन ही पापी है?

P17-0169

गुरु जी, क्या केवल पापी मन वाली बुद्धि को ही डर लगता है, और जिसके मन में राम और सत्य स्थित हैं उसे कोई भय नहीं लगता?

P17-0153

गुरु जी, हमसे वैसी तत्परता और तीव्रता क्यों नहीं बनती? अगर अभी भी मौका मिले तो मन कुछ बदलना ही चाहता है।

P17-0141

गुरु जी, हमारा दृढ़ निश्चय नहीं हो पाता, इसलिए उसी दुनिया में बार-बार नई लीला रच देते हैं — क्या करें?

P17-0131

गुरु जी, "मुझे तो कुछ नहीं चाहिए" — क्या यह कह देना ही काफी है?

P17-0110

गुरु जी, अब तक माला-जप, ध्यान सब किया, ऋषिकेश, बनारस, अयोध्या, द्वारका, उज्जैन सब तीर्थ और आश्रम घूमे, पर मन नहीं लगा। अब क्या करना है?

P17-0109

गुरु जी, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — ये पांच स्थूल तत्व, और मन, बुद्धि, अहंकार — कोई कहता है ये आठों निकृष्ट हैं। क्या भगवान ने निकृष्ट चीजें बनाईं?

P17-0108

गुरु जी, हमारा भी भक्ति करने का बहुत मन होता है, लेकिन परिवार है — क्या करें?

P17-0081

गुरु जी, सेवा कितने तरह की होती है? और आत्मदर्शन के बाद व्यक्ति की व्यवस्था कौन करता है?

P17-0061

गुरुदेव, मुझे क्रोध बहुत आता है — लगता है खून कर दूं। समाज में कोई गलत होता है तो मुझे मारने का मन करता है। क्रोध से बाहर कैसे निकलें, क्रोध को कैसे समझें?

P17-0055

गुरु जी, तन, मन और चेतना में क्या फर्क है?

P17-0054

गुरु जी, जो हमारी इंद्रियों के जरिए अनुभव अंदर जा रहा है, वो चित्त में स्टोर होता है — अचेतन मन — और सोते समय या कुछ भी करते समय वहां से चीजें निकल-निकलकर सामने आती हैं, दिमाग में घूमती रहती हैं। इसका क्या करें?

P17-0050

गुरु जी, कहा जाता है कि मन ही काल है — इस पर क्या कहेंगे?

P17-0047

गुरु जी, हमने कबीर पंथ में पढ़ा कि मन को बुरा बना रखा है — मन को ज्योति निरंजन, काल कहा जाता है, और "अपना रूप पहचान" जीव को कहा जाता है। आप कहते हैं मन सबसे सहायक है — ये कैसे?

P17-0041

गुरु जी, अंतःकरण — जिसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार कहते हैं — ये किस तरीके से काम करते हैं? और "मन को मार गगन चढ़ जाई, मानसरोवर पैठ नहाई" — तो क्या मन को मारना पड़ता है?

P17-0023

आपका भाव रहता था कि मैं जो भी कर रहा हूं — खाना, सोना, रोना, बात करना — मैं अपने लक्ष्य की तरफ ही पहुंच रहा हूं। तो अगर हम पथिक भी अपनी पूरी दिनचर्या में, ईमानदारी और सत्कर्म करते हुए, ये भाव रखें कि जो कुछ मेरे शरीर से, मन से, कल्पना में, डर में हो रहा है, उसका निचोड़ यही है कि मैं अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूं, कि मेरा गुरु देख रहा है — तो ये मेरे लिए कितना कारगर होगा?

P17-0008

(लाइव) गुरुजी, क्या मन की वासना को पूरा करना भी बेईमानी है?

P16-0173

(लाइव) भगवान के नाम जप में मन क्यों नहीं लगता?

P16-0163

(लाइव) पंच तत्व क्या होते हैं? तत्व तो 24 बताए गए हैं।

P16-0162

(लाइव) मुझे जीने का मन नहीं करता, और मौत भी नहीं आती। क्या करूं?

P16-0127

मन और बुद्धि से परे कैसे जाएं? और गुरु जी, मन सीधे आ जाता है या मन से पहले विचार आता है? विचार से पहले क्या आता है?

P16-0125

गुरु जी, इस जवाब से मैं पूरा संतुष्ट नहीं हुआ। मुझे लगता है आप बुद्धि को नकार रहे हैं। यह मैं मान गया कि वह पांचों इंद्रियों से परे है, लेकिन यह समझने के लिए भी तो बुद्धि आवश्यक है ना? अगर आत्मा से परमात्मा की यात्रा करने वाला मंद बुद्धि होगा, तो उसकी यात्रा शुरू ही नहीं होगी। तो क्या इसमें बुद्धि का रोल ही नहीं है?

P16-0124

तो आपके कहने का मतलब यह है कि मन और बुद्धि के द्वारा केवल स्वयं तक, आत्मा तक पहुंचा जा सकता है, और आत्मा से परमात्मा की यात्रा के लिए बुद्धि की आवश्यकता नहीं है? क्या वहां भी कोई आंतरिक समझ काम करती है?

P16-0123

गुरु जी, मैंने अनेक संत-महात्माओं को यह कहते सुना है कि परमात्मा मन और बुद्धि से परे की वस्तु है — मन और बुद्धि से उसे पकड़ा या समझा नहीं जा सकता। क्या यह सच है?

P16-0112

आपने बोला था कि हर विकार के पहले लालच आता है, फिर विकार बाद में आते हैं। तो लालच को कैसे गिराएं?

P16-0081

गुरु जी, मुझे लगता है कि मुझे आत्मज्ञान हो गया है, पर मेरा शरीर-मन यह मानने को तैयार नहीं है। क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए।

P16-0067

गुरु जी, किसी जरूरतमंद को देखकर मन दुखी हो जाता है, पर किसी की खुशियों में मन कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। क्या मुझ में कोई दोष तो नहीं है?

P16-0050

गुरु जी, आप रामदेव वाला योग नहीं करवाते हैं?

P16-0036

गुरु जी, मैं मन से टूट गई हूं। क्या करूं?

P16-0025

मुझे आत्मज्ञान हो गया है, अब आध्यात्मिक ज्ञान बांटने की इच्छा है, लेकिन मां-पिता सभी खिलाफ हैं। मेरा ना नौकरी में मन है, ना किसी चीज में।

P16-0024

गुरु जी, मेरा पढ़ाई में मन नहीं लगता। मैं क्या करूं?

P16-0012

गुरु जी, मेरा मन काम में नहीं लगता — सिलाई करने में, खाना बनाने में। मंत्र जाप करती हूं, ध्यान करती हूं; जिन गुरु जी ने मंत्र दिया उन्होंने कहा था सब ठीक होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। क्या करूं?

P15-0196

आप कहते हैं कि यहां रहना ही साधना है। पर यहां तो कुछ नहीं कर रहे — फिर कौन सी साधना बन रही है? कुछ मिल रहा है क्या, ऐसा करने से फायदा क्या है?

P15-0192

तो फिर यह चैतन्य क्यों होना चाहता है?

P15-0191

जहां भी सत्संग में गए, यही बताया गया कि मन तुमको चला रहा है। क्या सच में मन हमें चलाता है?

P15-0187

गुरुदेव, अब तो कमर अकड़ गई, बैठा भी नहीं जाएगा — यह शरीर बोल रहा है कि मन? और जैसे अभी इतने प्रश्न चल रहे थे, मुझे बाथरूम आ रही थी, मन बोल रहा था कि बाथरूम करके आओ, पर अंदर से आवाज आई कि नहीं, प्रश्नोत्तर चल रहे हैं, ये जरूरी है।

P15-0181

गुरुदेव, इतने असंख्य प्रश्न कहां से आते हैं — मन के द्वारा कि अपने आप?

P15-0170

गुरु जी, अवचेतन मन में कैसे प्रवेश करें?

P15-0158

गुरु जी, इस मन की कुछ आदतें होती हैं; इसको अच्छी आदतें कैसे लगाएं? और ये आदतें क्या पूर्व जन्म के संस्कार से हैं?

P15-0152

गुरु जी, मन अपने और आत्मा के लिए कब और कैसे काम करता है?

P15-0150

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार — ये अंतःकरण में, शरीर में कहां रहते हैं? कोई कहता है यह शरीर ही मन है — क्या यह सही है?

P15-0149

मन और शरीर की गति एक जैसी नहीं है, फिर भी दोनों के बीच समन्वय कैसे बनेगा?

P15-0146

महाराज जी, कृपा करके बताइए कि कोई आत्मज्ञानी महात्मा अपने मन को किस प्रकार देखते हैं?

P15-0144

महाराज जी, कहते हैं कि जिस इंद्रिय के साथ मन होता है तभी वह काम करती है — क्या यह सही है?

P15-0143

मन के इस जाल में से कैसे बाहर निकलना है? शरीर को जो आदतें लग गई हैं?

P15-0139

गुरुदेव भगवान, विचार जो चलते हैं वह अलग है, और जो मन बताता है वह अलग है?

P15-0135

गुरुदेव, हमारे एक मित्र ने बिल्कुल उम्मीद छोड़ दी है, पर इनका मन बहुत भागता है — पता नहीं मन भागता है कि ये स्वयं भागते हैं?

P15-0122

गुरु जी, जैसे मैं मन के द्वारा कंप्यूटर में सही फाइल खुलवाऊं — सही जगह क्लिक हो — उसके लिए क्या साधना या क्या विधि है?

P15-0121

तो गुरुदेव, ये संसार की तरफ, संसार की चीजों की तरफ कौन लेके जाता है?

P15-0120

मेरे भगवान, मैं मन को शरीर रूपी रथ का घोड़ा मानता था, लेकिन आपने बताया कि घोड़ा मन नहीं है, मैं हूं — मिला-जुला के सब कुछ आप ही हो?

P15-0099

बचपन से मन में बैठा दिया गया कि दो गुरु नहीं कर सकते, एक ही गुरु से नाम लिया तो उसे बदल नहीं सकते।

P15-0087

मन और आत्मा एक ही होते हैं क्या?

P15-0063

मैंने संन्यास लिया, पर उसके बाद अंदर उदासीपन आ गया, वहाँ रुक नहीं सका; अब गुरु के दूसरे आश्रमों में जाने का मन ही नहीं करता।

P15-0053

मन को कैसे वश में करें? बहुत भटकाव है।

P15-0052

आप कहते हैं मन कुछ नहीं है, और गीता में कृष्ण भगवान कहते हैं अर्जुन मन मुझमें लगा — इसका मतलब क्या?

P15-0043

मन की सकारात्मक ऊर्जा को जागृत और जागरूक कर नियमित कैसे रखें?

P15-0015

प्रभु जी, जब आप सत्संग नहीं करते, शांत रहते हो, तब आपके मन की स्थिति क्या होती है?

P14-0194

अपने आप को कैसे खोजें? मन में हर पल बेचैनी बनी रहती है, कैसे दूर हो?

P14-0167

कुछ लोग कहते हैं कि सब भगवान कर रहे हैं — तो क्या बुरा काम भी वही करवा रहे हैं?

P14-0163

मेरा मन हमेशा संकल्प-विकल्प में रहता है, बहुत प्रयास करता हूँ लेकिन खत्म नहीं होते।

P14-0137

ये सब स्वप्न है, मन में संसार है, कुछ नहीं है — फिर भी हम उसी के जाल में फँसे हैं?

P14-0118

गुरु जी, मन का समाधान क्या है?

P14-0108

गुरु जी, कभी-कभी मन में वैराग्य का भाव आता है।

P14-0104

गुरु जी, मेरा ज्ञान तो नकारात्मक है — नेति-नेति द्वारा यही ज्ञान होता है कि शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार मैं नहीं; कोई आकार, गुण, इच्छा स्थाई नहीं; कर्ता भ्रम है, माया मात्र है।

P14-0090

गुरु जी, मोह-माया ही सभी कर्म-बंधनों की जड़ है; जिस क्षण प्राणी इससे परे हो गया, कोई कर्म उसे बांध नहीं सकता — मोह-माया क्या है?

P14-0088

गुरु जी, ध्यान कौन करता है — मन, शरीर या जीव?

P14-0087

गुरु जी, अब तो बस अपने में टिक जाना है, पर इच्छा तो अभी भी आती-जाती दिखती है — आज सुबह आपको ठंडा शर्बत पिलाने की बात मन में आ गई।

P14-0078

गुरु जी, "निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा" — इसका थोड़ा विश्लेषण कीजिए।

P14-0072

गुरु जी, ये ज्ञान लेने के लिए गुरु के पास जाना चाहिए या अपने आप सत्संग सुनते रहें?

P14-0057

गुरु जी, राजा जनक राजपाट करते हुए भी, संसार में रहते हुए भी संसार से परे थे, विदेह कहलाए — ये विद्या बड़ी मुश्किल लगती है?

P14-0042

गुरु जी, ध्यान में निर्विचार होना — क्या ये सही है? कभी बैठते हैं तो कोई विचार नहीं, बड़ा गजब का आनंद होता है, उठने का भी मन नहीं करता।

P14-0038

गुरु जी, ध्यान में बैठे हुए क्या परमात्मा की इच्छा भी खत्म करनी है? परमात्मा का ध्यान कैसे करें?

P14-0009

गुरु जी, आजकल हर एक के पास मोबाइल है; रील देखना, टीवी-फिल्म देखना — इसमें मन बहुत सुख महसूस करता है। मगर अगर आत्मा में परमानंद है, तो मन उसे क्यों नहीं महसूस कर पाता?

P13-0198

गुरु जी, जैसे कबीर जी ने कहा — जन्म-जन्म की मन को मैल लगी है, काला हो गया मन। साधना से यही निकलेगी ना? इस जन्म की तो इतनी ज्यादा नहीं हो सकती।

P13-0176

गुरु जी, चेतना, मन और बुद्धि में क्या अंतर है? विस्तार से समझाइए।

P13-0153

ऐसा ही कुछ कुत्तों के साथ भी हुआ। मैं बाहर के कुत्तों को खिलाता था; फिर उनकी आबादी बढ़ी, पैसा कम पड़ा, तो मैं उन्हें इग्नोर करने लगा। जानवरों को खिलाते हैं तो आनंद की प्राप्ति होती है।

P13-0148

कुछ साल पहले मैंने एक वीडियो में एक प्रयोग देखा था कि हर चीज का उल्टा करो — हंसने वाली बात पर हंसो मत, दर्द वाली घटना में शांत रहो। मैंने ऐसा किया; मेरी मां का हॉस्पिटल में इलाज चल रहा था तब भी मेरे चेहरे पर भाव नहीं आ रहा था, जबकि मन में आ रहा था। इस प्रयोग से आखिर हुआ क्या — इसका कोई लाभ था या नुकसान?

P13-0135

गुरु जी, क्या दुर्गा-सरस्वती का अध्ययन करने से आत्मज्ञान पा सकते हैं?

P13-0134

गुरु जी, मैं शांत होना चाहती हूं — मन से भी और इच्छाओं से भी।

P13-0130

गुरुदेव, मेरे पिताजी 2 महीने पहले गुजर गए, लेकिन मुझे आज भी बहुत तकलीफ हो रही है, कहीं मन नहीं लगता है। क्या करूं? मार्ग प्रदर्शित करें।

P13-0116

कड़ी मेहनत के बाद पैसा कमाते हैं पर अपने लिए या किसी अच्छे कार्य में खर्च नहीं कर पाते। ऐसा क्यों होता है और अपने मन को कैसे बदलें?

P13-0075

मेरा ओवरऑल प्रश्न यह है कि मन, वचन और कर्म — तीनों से जो भी कर्म मेरे द्वारा हो रहा है, उसमें एक साधक के रूप में टोटल मिलाकर क्या भाव रखूं? क्या उसे साक्षी भाव से चेक करूं? और राग-द्वेष छोड़ने के अलावा अपने आप को क्या टारगेट दूं?

P13-0067

(उड़ीसा से आए एक साधक) बाबा जी, हम कौन हैं, यह समझना है; और रोज अपने अस्तित्व की उस स्थिति में हमेशा कंटिन्यू रहना है और गहरे ध्यान में उतरना है। ध्यान क्या है, और किस तरह करना चाहिए?

P13-0063

कहते हैं ध्यान लगाओ, ध्यान लगाओ — ध्यान लगाएं कैसे? ध्यान क्या है?

P13-0062

साक्षी ध्यान भी इसी को बोलते हैं?

P13-0060

गुरुदेव, ध्यान में ध्यान कैसे करना है? जब से मैं यहां आया हूं और आपने मुझे बताया, तब से ध्यान में ध्यान हो नहीं पा रहा; पहले विधियां करता था, उनसे कोई लाभ नहीं मिला।

P13-0050

इच्छा उठते ही मन उसी को पूरा सत्य और संसार क्यों मान लेता है, जबकि विवेक भीतर मौजूद है? उस क्षण विवेक को जागृत कैसे करें?

P13-0046

मन में बेचैनी होती है; लगता है कभी वहां घूम आऊं, कभी वहां। तो क्या हम अपने कर्म से भाग रहे हैं?

P13-0042

गुरु जी, कई बार विचार आता है कि कोई बात नहीं, धीरे-धीरे पार उतर जाएंगे। पूरी ईमानदारी से जीवन जीने में घर-परिवार का भरण-पोषण भी मुश्किल से होगा, दुनियावी तकलीफें सहनी पड़ेंगी, तो मन पीछे हो जाता है कि एक-दो-चार जन्म और लग जाएंगे; ज्ञान तो आ ही गया, ईमानदारी-सत्कर्म-सत्संग पर चलते रहेंगे, धीरे-धीरे कल्याण हो जाएगा।

P13-0005

गुरु जी, लोग टेंशन भी देते हैं, बातें मारते हैं, मन को दुखी करते हैं। मैं अकेली रहती हूं, तो सामाजिक नहीं बन सकती।

P12-0173

गुरुदेव, मन और हृदय में क्या भेद है?

P12-0141

गुरु जी, मैं कृपा की बात नहीं कर रहा, लेकिन इतने समय से मेरे अंदर बहुत तीव्र इच्छा हो रही है कि अब मैंने और जन्म नहीं लेना — मुझे यह यात्रा बहुत तेज करनी है। इसके लिए क्या करूं?

P12-0098

मेरे समाज में कोई किसी गरीब को परेशान करता है या दुख देता है, तो मेरा मन दुखी क्यों होता है?

P12-0088

आपने बताया कि मन शरीर के लिए कार्य करता है। इस मन का प्रयोग हम अच्छे से कैसे कर सकते हैं?

P12-0049

अपने अंतस में, अपने भीतर कैसे जाते हैं? इंद्रियों को अपने अंदर की तरफ कैसे मोड़ना है?

P12-0035

जिससे हम मुक्त होने वाले होते हैं, क्या वह अंत में पीड़ा देता है — चाहे कोई वस्तु हो, व्यक्ति हो, मन हो या शरीर? क्या यह बात ठीक है या मेरा भ्रम है?

P12-0032

ध्यान करते समय मन बोलता है कि यह सब करने से क्या फायदा? यह बात सुनकर भी हम ध्यान कैसे कर सकते हैं?

P12-0022

क्या आर्थिक दान के बिना आपके यहां रहना संभव है? क्या श्रमदान करके भी रह सकते हैं? मैं सरकारी नौकरी में हूं, पर नौकरी में मन नहीं लगता।

P11-0197

पहले मेरा भजन में अच्छा मन लगता था, अब भोग में मन बार-बार परास्त कर देता है; शुरू में जो वैराग्य हुआ था, वह ठंडा पड़ गया। मार्गदर्शन दीजिए।

P11-0181

शुरू में जब मेरी आत्मिक समझ बढ़ती थी तो आनंद होता था; पर जब से आपको बताया, वह होना कम हो गया, कभी-कभार ही होता है। ऐसा क्यों?

P11-0177

सही मन से भगवान से मांगने पर हर चीज मिलती है, यह होते देखा है। तो जो मिला है, उसे कैसे बचाकर रखें?

P11-0158

सत्संग से इतना समझ आ रहा है कि मैं शरीर और मन नहीं हूं — शरीर माता-पिता और पोषण से बना, मन बाहरी जानकारियों से। फिर इनके बिना भी क्या मैं कुछ हूं? इस पर अब जिज्ञासा टिक रही है।

P11-0118

(कुटिया में सेवक) मुझे अब कोई घुटन, बेचैनी नहीं; बस तब दुखी होता हूं जब मेरी वजह से आपको चिल्लाना पड़ता है — जैसे कल रात कुत्तों के लिए गेट नहीं खोला। मुझे पहले से लग रहा था कि आप बोलने वाले हैं, फिर भी नहीं उठा।

P11-0117

मन, वाणी और कर्म के शुद्धिकरण का क्या मतलब है?

P11-0098

नींद क्या है? इसमें जीव और मन की क्या अवस्था रहती है? और स्वप्न क्या है?

P11-0082

मेरा मन अचानक बहुत उद्विग्न हो जाता है, घुटन या पश्चाताप में चला जाता है, जबकि कोई घटना याद भी नहीं। क्या उस घुटन से भागूं नहीं, उसी में रहूं?

P11-0078

"मन मरा ना माया मरी, मर-मर गया शरीर; आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर" — आप अपने वक्तव्य में समझाएं।

P11-0074

कभी-कभी साधना में मन निराश होता है; तब अंदर से आवाज आती है, "चिंता मत करो, मैं यहां हूं।" इसे मैं ब्रह्म का संकेत मानता हूं। सही मार्ग दिखाइए।

P11-0029

सोचता कौन है — मन या हम? आंतरिक बात कौन करता है?

P11-0027

मैं आपको सुन रहा हूं, पर 100% वर्तमान में नहीं हूं; आपके शब्दों को दिमाग अपने हिसाब से प्रोसेस करता रहता है। जब शांत होने की कोशिश करता हूं तो एकदम जीरो हो जाता हूं, फिर काम करने में दिक्कत होती है। मन हमेशा प्रतिक्रिया मोड में ही क्यों रहता है?

P11-0017

घर पे मन नहीं लगता, यहां (कुटिया) आने का मन करता है; और यहां आकर फिर भागने का मन करता है।

P11-0012

अगर कोई हमारे अगेंस्ट कुछ कर रहा है, तो मुझे एक्शन तो लेना पड़ता है; फिर मन की प्रक्रिया बहुत स्पीड पकड़ लेती है। क्या करें?

P11-0011

हमारी जो प्रतिक्रियाएं मन में चलती हैं — कुछ नेगेटिव, कुछ बेकार — जिन्हें हम एक्शन में नहीं लेते, क्या उनसे भी कर्म बनते हैं?

P11-0006

हमारे अंदर ही परमात्मा है, आत्मा भी है और मन भी। अगर हम अपनी आत्मा को समझ गए, तो मन तो हट ही जाएगा; फिर हम और परमात्मा एक ही हो जाएंगे — क्या यह सही बात है?

P11-0003

मैं समझ गई हूं, फिर मेरा वैसा ही रहने का मन करता है, वैसे ही लोग और वैसा ही माहौल चाहिए। जब वह नहीं मिलता, तो मैं बहुत परेशान और बेचैन हो जाती हूं।

P10-0187

(कुटिया में साधक) कल मेरे मन में भाव आ रहा था कि मैं (नर्मदा) परिक्रमा कर लूं। पर लगता है यह जगह, आपका सान्निध्य छूट जाएगा।

P10-0184

गुरु जी, मैं आत्म कल्याण के लिए घर से निकल नहीं पा रहा हूं। मुझे अपने मन से डर लग रहा है कि मुझसे कोई गलत काम ना हो जाए। मार्गदर्शन करिए।

P10-0168

(एक साधक की ओर से) सत्संग समझ में आ जाने के बाद अब घर पर मन नहीं लगता। क्या करें?

P10-0148

(मन के) बेकार खर-पतवार को कैसे काट के निकालें?

P10-0115

आत्मिक चिंतन कैसे करें? मन में संसार घूमता रहता है।

P10-0114

गुरु जी, मैं जब भी कोई डिसीजन लेता हूं तो मन में हमेशा द्वंद्व चलता रहता है। आपकी तरह बिना द्वंद्व के हर डिसीजन फाइनल कैसे करूं?

P10-0073

मेरा मन पढ़ाई में लगता था। अब कुछ दिन से इधर-उधर से डिस्टर्ब हो गया हूं और पढ़ाई से मन हट गया है। अब परेशान हो गया हूं। गुरु जी, कुछ करें।

P10-0065

अगर मन में परेशान ना हो, तो क्या करें?

P10-0054

गुरु जी, जब एकांत में बैठता हूं तो मन एक क्षण में अंधकार में चला जाता है, अंतःकरण में चला जाता है। क्या करें? कृपया मार्गदर्शन करें।

P10-0042

आपका वीडियो देखता हूं, सत्संग सुनता हूं, और ज्ञानियों की वाणी, संतों के वचन, इन सबसे मन अच्छा हो जाता है, शांत हो जाता है।

P10-0029

मुझे आप जैसा मेहनती बनना है। ध्यान इधर-उधर जाएगा। क्या मन एक समय सिर्फ एक काम कर सकता है? मन पांच इंद्रियों से जुड़ा है, इसलिए क्या धारणा भी एक साथ कई हो सकती है?

P10-0015

क्या ऐसा नहीं है कि मन का धागा ढीला है, और जब उसे सीधा करो, सुलझाओ, तो उसमें मौन उतरता है? वह मौन भीड़ में भी कैसे साधे?

P10-0012

साक्षी की स्थिति सदा नहीं रहती। कभी-कभी आती है, कभी नहीं। मन चाहता है सब ओर भागना। उसे बार-बार थामने से साधना में भी ऊब पैदा होती है। यह क्या है? कैसे छुटकारा हो? एक तरफ ध्यान नहीं हो पा रहा हूं। क्या करूं?

P9-0196

प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ हो ही नहीं रहा है। मन अशांत है। योगी जी, क्या करें?

P9-0186

आपके व्यक्तित्व के बारे में मैं बोल नहीं सकती। विवेकानंद जी के व्यक्तित्व के लिए मेरे मन में बहुत प्रेम था। इतनी मुसीबतें, चौबीस-अट्ठाईस घंटे की यात्रा, एक सीट पर बैठे रहना, ये बातें लिखी कैसे जाएं? जो बाहर से देखेगा उसे लगेगा एयर कंडीशन कार से आराम से आ गए।

P9-0183

नेपाल में मेरा चित्त बहुत जाता है, पर मन इधर ही है, क्योंकि यहां बैठने से आत्मसमझ बढ़ रही है। नेपाल की याद आती है। वहां जाकर मुक्त होकर इधर आकर बैठूं, या वहीं रहकर रोज उसका सामना करूं, कौन अच्छा है? दोनों तरफ खिंचाव है, विचार बहुत आते हैं, तबीयत भी खराब होती है, फिर भी लगता है समझ बढ़ रही है।

P9-0180

जिन गुरु ने आरंभ में ध्यान का मार्गदर्शन दिया था, उन्होंने कहा था कि न आत्मा का ध्यान करना है, न परमात्मा का ध्यान करना है। यह बात क्लियर नहीं हुई। ऋषिकेश, गंगोत्री, फिर कोरोना, वेदांत श्रवण के बीच साधना बिगड़ गई। पहले तीन-तीन घंटे एक आसन में बैठ लेता था, पद्मासन भी सिद्ध हो गया, फिर मन डिस्टर्ब हो गया। ना आत्मा का ध्यान, ना परमात्मा का ध्यान, इसका क्या अर्थ है? और आसन सिद्ध करने से क्या होता है?

P9-0165

गुरु जी, घर वाले मुझे बहुत चाहते हैं, लेकिन मेरा उनसे कोई लगाव नहीं। बार-बार जिम्मेदारी छोड़कर आत्मज्ञान की खोज में भागने का मन करता है। फिर रुक जाता हूं कि घर वालों को क्यों दुख दूं। सही-गलत समझ में नहीं आता। क्या करूं?

P9-0143

महाराज जी, मैं देख पाया कि मैं विचार था ही नहीं। मन में समा गया, खाली, मैं सब अच्छे से देख पा रहा था। वह क्या है?

P9-0071

मैं अपने चारों ओर देखता हूं कि लोग दिन भर गंदी-गंदी बातें करते हैं। बचपन से इनका सामना कर रहा हूं। अब इन लोगों से कैसे बचूं? मन में कचरा आने लगता है।

P9-0060

मेरे मन में हमेशा यह प्रश्न आता है कि मैं कौन हूं। मुझे लगने लगा है कि मैं चुनी हुई आत्मा हूं, और जिन्हें परमात्मा चुनता है उनका जन्म टॉक्सिक परिवार में होता है। क्या यह सही है?

P8-0172

बुद्धि से तो आत्मा सोचती है। मन सोचने में कैसे लिप्त होता है? इसे प्रत्यक्ष समझाइए।

P8-0165

ध्यान करने का मन होता है। एक अजीब भाव रहता है। कहते हैं करो, लेकिन चुनाव करते समय कर्ता फिर खड़ा हो जाता है। कर्ता का भाव कैसे न रहे?

P8-0156

ध्यान करने का मन होता है, पर एक अजीब सा भय बना रहता है, लगता है कोई है, सर्प है। क्या करें?

P8-0150

बुद्धि और चेतन मन में क्या फर्क है? विज्ञान बुद्धि को चेतन मन का हिस्सा मानता है। दोनों का क्या उपयोग है? मुझे लगता है बुद्धि और चेतन मन एक ही हैं।

P8-0145

बुद्धि और चेतन मन में क्या फर्क होता है? क्या चेतन मन की मदद से सोचते हैं, या बुद्धि की मदद से?

P8-0126

क्या मैं सही हूं कि मन के दो हिस्से हैं, अचेतन मन और चेतन मन, चेतन मन में बुद्धि होती है, और जीवात्मा बुद्धि की मदद से सोचता है? चेतन मन और बुद्धि का इस्तेमाल बता सकते हो?

P8-0097

क्या मौन भी रास्ता है?

P8-0092

आदमी जरूरत में सोचता है, यह बात समझ में आई। लेकिन वह कौन सा उपकरण है जिसके माध्यम से वह सोच रहा है? मैं उस उपकरण का नाम चाहता हूं। क्या वह चेतन मन है?

P8-0091

शिष्य का गुरु के प्रति जितना समर्पण होता है, क्या गुरु का समय और ध्यान भी उसके प्रति उतना अधिक हो जाता है? ऐसे में अन्य साधक, जो गुरु के प्रति कम लगाव रखते हैं, उनके मन में ऐसी भावना पैदा हो जाती है।

P8-0070

मन क्या है?

P8-0068

एक प्रश्न मेरा क्लियर नहीं हुआ। मैंने पूछा था कि हम चेतन मन के माध्यम से सोचते हैं। क्या यही बात है?

P8-0065

मन को पवित्र कैसे बनाएं?

P8-0053

अचेतन मन में जो डर के विचार हैं, उनसे कैसे ठीक हों? और यह डर के विचार उसमें कैसे बैठे?

P8-0052

गुरु जी, आपने कहा था कि हम सोचते हैं। क्या हम चेतन मन की मदद से सोचते हैं?

P8-0047

आजकल कहीं मन नहीं लगता। क्या करें?

P8-0042

क्या एक योगी पुरुष को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहिए? ब्रह्मचर्य क्या है?

P8-0018

बाबूलाल को घर-परिवार की याद आ रही है। विचार तो चलते रहते हैं। कुछ यादें खींचती हैं, प्रभावित करती हैं। जब उन विचारों के साथ होता हूं तो बहुत भारी दुख होता है। क्या करूं?

P7-0193

एक साधिका कहती है कि चालाकियां इस तरीके से खत्म नहीं होतीं। यहां आने के लिए जुगाड़ किया, कई लोगों से झूठ बोला, सिर्फ पति से सच बोला कि मैं जा रही हूं। पूछती है, उस झूठ से किसी की हानि तो नहीं हुई?

P7-0183

मन बिना कारण उदास क्यों होता है?

P7-0162

संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें?

P7-0161

मैं इस कुटिया को अपनी मानता हूं। छोटी-छोटी बिगड़ने वाली चीजें, जो औरों को नहीं दिखतीं, उन पर ध्यान रखता हूं। पहले लगता था लोग मेरे तरीके से नहीं कर रहे, गलत लगता था। अब समझ आया कि सबकी समझ अपनी है। खाना बनाने में मन लगता है। सारा छोड़ दूं तो कमजोरी आ जाएगी, इसलिए अपना काम भी करता रहता हूं। बोलचाल में गलती हो जाती है। यह कुटिया किसकी है, और यहां कैसे रहें?

P7-0151

दवाई को अंतिम अवस्था तक ले जाने से पहले खरगोश, बंदर जैसे जीवों पर प्रयोग होते हैं, और उनकी मौत बड़ी दर्दनाक होती है। फिर वही दवाई बाजार में आकर हम भी खाते हैं। क्या उसका दोष हमें भी लगता है? यह आधुनिक बात है, शास्त्रों में नहीं मिलती। आदमी करे क्या?

P7-0141

आठ तारीख को जाऊँगा। जो यहाँ तीस दिन में जिया हूँ, उसे अपने जीवन में लगातार जारी रखना चाहता हूँ, पूरी तरह, कोई भूल चूक न हो। जैसे काढ़ा पीते समय चाय कॉफी नहीं ले सकते। बाहर जाकर क्या हम खुद चाय कॉफी पी सकते हैं, होटल में खा सकते हैं?

P7-0139

सुनते सुनते लगभग एक साल से प्रेरणा हुई, तभी आ पाया। परिवार के दलदल में ऐसा फँसा हूँ कि चार महीने से आना हो नहीं पा रहा था। एक बार गौतम बुद्ध की तरह बिना बताए चल जाने का मन हुआ, पर आपके वचनों से बिना बताए जाना उचित नहीं लगा। दो बच्चों की शादी करनी है, इसलिए बताकर आया। बड़ा बेटा सपोर्ट कर रहा है, बाकी पत्नी और बच्चे सब खींच रहे हैं। निकलना बहुत कठिन लग रहा था। अब क्या करूँ?

P7-0130

गुरु जी, हमें यह पता होते हुए भी कि जो कर्म कर रहे हैं वह हमारे कल्याण के लिए नहीं है, फिर भी हम अपने मन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाते। हमें क्या करना चाहिए?

P7-0109

विवेक राठौड़ पूछते हैं, गुरु जी, मैं शिक्षक हूं। तीन चार बार समझाता हूं, फिर भी कुछ बच्चे नहीं समझते। स्कूल में समय सीमित है, जिसमें बच्चों को समझाना होता है। ऐसे में क्या करूं? सरकार और सब रिजल्ट चाहते हैं, सबको सौ प्रतिशत चाहिए।

P7-0107

सत्य पूछते हैं, गुरु जी, जड़ और चेतन क्या है? शरीर, मन, बुद्धि, चित्त जड़ हैं या चेतन?

P7-0075

सुधारक अपनी पूरी जिंदगी पहले तप में लगाता है, फिर समाज के कल्याण में। जैसे वृक्ष जितना ऊंचा होता है, जड़ें उतनी गहरी होती हैं। बीज का आवरण टूटे बिना पौधा नहीं बनता, और वो टूटना हमें सहन नहीं होता, क्योंकि आगे क्या होगा, पता नहीं। हम उसी आदत में जीते रहते हैं और भीड़ का अनुसरण करते हैं। भीड़ सुंदरता का या किसी और चीज का पैमाना रख दे, तो कमी छुपा ली जाती है, जैसे टोपी लगा ली। छुपाकर न हम जिंदगी जी पाते हैं, न सच में खड़े हो पाते हैं। भीड़ का अनुसरण क्यों करते हैं? क्या मेरे अंदर कमजोरी है या खालीपन है? आवरण आखिर क्या चीज है, और हमारे अंदर ये कमजोरी क्यों है कि हम दूसरे की नजर में अपने आप को भरना चाहते हैं?

P7-0074

ऐसे लोगों को आप कैसे झेलते हो? जो ईमानदार हैं, आवेशी हैं, बात नहीं मानते, डांट भी देते हैं, उन्हें सुधारक क्यों सहता है, और उन्हें संवारने में कितना सहना पड़ता है?

P7-0063

कोई कह रहा था कि आपके पास जाने से भटक जाओगे, कुछ नहीं मिलेगा, फालतू में जा रहे हो। पाइपलाइन के विवाद और गालियों की बात भी हुई। लाइव में गालियाँ मिलती हैं, क्या करें? क्या उसकी बात सही थी?

P7-0014

आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी और सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है?

P7-0009

प्रशांत गुप्ता पूछते हैं, चेतना, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है? क्या चित्त ही आत्मा है?

P7-0004

विनायक पूछते हैं, आत्मज्ञान किसे होता है? मन को, वृत्ति को, चित्त को, या बुद्धि को? समझ की जरूरत किसको है, बुद्धि को या आत्मा को?

P6-0190

जे के डाका पूछते हैं, अफीम छोड़नी है। मन कमजोर है। कैसे छोड़ूँ? मार्गदर्शन करें।

P6-0179

जीवन में ईमानदारी और सत्कर्म हो रहा है। मन निर्मल कैसे हो? इस पर प्रकाश डालें।

P6-0153

काशी के बारे में बताइए। क्या काशी में जो मरता है उसे मोक्ष मिलता है? लोग मरने के लिए काशी जाते हैं। क्या वहाँ शंकर तारक मंत्र का उपदेश देकर मुक्त कर देते हैं?

P6-0145

हम कुछ नया बोल भी नहीं सकते, नया कर भी नहीं सकते। सारी चीजें बोली जा चुकी हैं। बस हम समझ सकते हैं। क्या यहां कुछ नया है? आत्मज्ञान, बंधन, परमात्मा के पास जाना, क्या यह हमारे लिए नया है? फिर वहां से लौटकर आना क्यों चाहते हैं?

P6-0144

मैं अपने भीतर आना चाहता हूं, लेकिन एक मिनट में बाहर चला जाता हूं और उलझ जाता हूं। सत्संग सुनने के लिए कुछ समय अंदर आया था, फिर बाहर चला जाता हूं। चाबी अपने पास रखूं या महापुरुष को दे दूं? साधक और सेवक में क्या फर्क है? जिसे चाबी देनी है, उसकी जांच कैसे करें?

P6-0138

एक दिन मुझे अच्छा लगता है और दूसरे दिन बुरा लगता है। क्या यह केवल मन की वजह से होता है, या इसमें मेरा भी योगदान रहता है?

P6-0136

जब से हम जीवात्मा बने हैं, तब से मन हमारे साथ है। मन इस शरीर में रहा है, चाहे हम इंसान में रहे हों या किसी दूसरे जीव-जानवर में। क्या मन जन्म-जन्म से हमारे साथ है?

P6-0131

क्या मन कर्म से बनता है, और उसके असर में दिक्कतें होती हैं? आंख, पलक, बीज और मकान की तरह क्या सब पहले से तैयार है? क्या सृष्टि की हर घटना पूर्व निश्चित है? मैं निश्चित करके आया, फिर योजना बदल गई और बेईमानी में फंस गया। यह फिक्स मैं ही कर रहा हूं क्या? फिक्स है तो फिर करना क्या है?

P6-0129

मन और दिमाग, या ब्रेन, में क्या फर्क है? हमें बताया गया कि ब्रेन से हम शरीर को फील करते हैं और ब्रेन में सिग्नल जाते हैं। क्या मन केवल शरीर की जरूरत बताता है या स्मृति का भी सहायक है? क्या मन नौकर है या सहायक? शरीर के इशारों के साथ साधक को क्या करना चाहिए?

P6-0127

मन संदेशवाहक है और अंग मेरे सहायक हैं, तो मैं कौन हूं? मैं इस मैं के रोले में कई रूपों में शिफ्ट हो गया हूं। आत्मा को कैसे फील करूं? क्या आत्मज्ञान में आत्मा अलग दिखेगी, तीसरा नेत्र खुलेगा, या मैं वही रहूंगा? आत्मज्ञान के बाद बाहर के झगड़ों में उलझना चाहिए या नहीं?

P6-0126

क्या मन ऐसा है जैसे पिक्चर हॉल में पर्दा दिखाई देता है? क्या मन द्वारा जीवात्मा इस संसार और शरीर को व्यक्त करती है? अंग सुन्न या पैरालाइज होने पर चेतना रहती है या मन वहां नहीं जाता, और शरीर का भान कैसे होता है?

P6-0124

इस बेचैन मन को कैसे कंट्रोल किया जाए?

P6-0101

हरियाणा से आई बहन साधना में लगातार बैठने से पैर और शरीर के दर्द में बहुत परेशान थी। कहा गया था, या तो बैठो या चली जाओ, उसके बाद दर्द चला गया। साधना में दर्द और पीड़ा को कैसे देखें? गुरु कठोर क्यों होता है? शरीर, धन और समझ की ताकत को संचित करें या कहां लगाएं?

P6-0086

आत्मज्ञान हो जाए, इसके पीछे यदि मन में यह मनसा पल रही हो कि मुझे मान और प्रतिष्ठा मिलेगी, तो क्या आत्मज्ञान होगा?

P6-0077

जो परिवार छोड़कर केवल ध्यान लगाता है, आकाशवृत्ति से रहता है, धन नहीं जोड़ता, उसे गाली और मार भी मिलती है। उसका क्या होता है? कृष्ण ने अर्जुन को आत्मभाव में टिकने के लिए भी कहा था, तो कर्म का सिद्धांत क्यों बताया? अर्जुन आत्म तत्व में कैसे स्थिर हुए? और क्या मैं शुद्ध आत्मा हूं कहना भी एक विधि है, जिससे कल्याण नहीं होता?

P6-0061

एक संसारी को फिलहाल एक ही कारण नजर आ रहा है कि मैं इसी से दुखी हूं, प्रपंच नजर नहीं आता। जैसे पड़ोसी पसंद नहीं और मन में आता है कि यह मर जाए, आज यह मर जाए, कल वो मर जाए। उस कारण तक चला भी जाऊं तो अपने स्वभाव को कैसे सुधारूं? वह भाव गंदी आदत लगता ही नहीं, मैं यही जानना चाहता हूं। अगर अपनी स्थिति बुरी लगती ही नहीं तो कैसे चेक करूं? परिवार से जानकारी मिली कि उनसे रंजिश है, दुश्मनी है, उन्होंने हमारे किसी को मारा, मैंने खुद नहीं देखा, फिर भी भाव बन गया कि यह मर जाना चाहिए, मैं ही उड़ा दूं, जबकि वो भी योजना बना रहे होंगे। गली में रेड़ी वाले का रेट ना भाए तो बद्दुआ, गाली और अपमान तक निकल आता है। मैं खुद परेशान हूं और वो अड़चन भी डाल रहे हैं। ऐसे में अपनी स्थिति कैसे जानूं, यह भाव क्यों उठ रहा है, और मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं?

P6-0057

गुरु जी प्रणाम। गड धरत बाटी से। आपका सत्संग बराबर सुनता हूं और आदत में सुधार भी हो रहा है। अब हमारा शरीर और मन सुस्त होने लगा है। यह किस तरह का लक्षण है?

P6-0054

योगी जी नमन। पंजाब से एक बहन है, छह महीने पहले शादी हुई। डेढ़ साल पहले भाई को वीडियो मिली, उनकी रुचि थी, बहन का यह मार्ग नहीं था। कुटिया आने से पहले बहन कहती थी कि मैं बहुत बातें करती हूं, मैं यहां रह नहीं पाऊंगी। फिर भी नियम ऐसे सहज स्वीकार हो गए कि नियम लगे ही नहीं। बैठने का कोई काम नहीं, फिर भी पूरे समय सहज बैठी रहती है, किसी को देखती नहीं। भाई की ओवरथिंकिंग छूट गई, बहन वीडियो कम सुनती है, और दोनों निरंतर नियम में हैं। जिज्ञासा यह है कि एक जीवात्मा अपनी यात्रा के लिए इतनी उत्सुक कैसे हो जाती है? किस मोड़ से अपने आप को निकालना चाहती है? प्रत्यक्ष ज्ञान निमित्त बना, शादी हुई, और ऐसी जगह आना जैसे यह बहुत आवश्यक हो। यह संभव कैसे हो पाया? क्या वह कोरे कागज की तरह समझ रही है? और जो पहले कुछ पढ़कर या कोई प्रक्रिया करके आता है, उसका मन तुलना में लग जाता है, यहां ऐसा क्यों नहीं, वैसा क्यों नहीं, कुछ हो नहीं रहा, इतने दिन हो गए, तो क्या पिछला छोड़कर यहीं समझना चाहिए?

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मन और चित्त क्या है?

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प्रश्न पूछते पूछते जब उत्तर मिल चुके तो ध्यान एक पत्ते पर चला गया। हाथ पत्ता छूने लगा। लगा कि प्रकृति ने यह उदाहरण खुद खड़ा कर दिया, नहीं तो यह समझ पैदा ही नहीं होती। उस समय विचार नहीं उठा, आंख ने देखा और हाथ उधर चला गया। प्रतिदिन खाना खाते समय भी हाथ का निवाला अपने आप मुंह तक चला जाता है, शरीर से अपने आप। क्या बिना विचार के यह क्रिया हो जाती है?

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भरोसे की जो बात कही, उसी भरोसे पर अब तक चलते आए हैं। आप भरोसे और विश्वास की बात नहीं करते, और स्वप्न आता है या नहीं, इसका सीधा उत्तर भी नहीं देते। मन भविष्य के जो प्रश्न उठा रहा है, जो वास्तविक नहीं, उन्हें हटा दें? आत्मज्ञान के बाद स्वप्न आते हैं या नहीं, इस उत्तर से लाभ या हानि कुछ नहीं, केवल मन की संतुष्टि है। ऐसे प्रश्न पूछना बंद कैसे समझें? पेड़ यहां क्यों है, यह कौन बताएगा?

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आपने एक संकल्प कहा है कि निर्विकार होना है। निर्विकार कैसे होऊंगा, और विकार बन कैसे रहे हैं? बेईमानी छोड़ दूं तो आगे बनना बंद होगा, पर पिछला जो जमा किया है वह कैसे खटेगा? बेईमानी से श्राप मिला, तो सत्कर्म और जरूरतमंद की सेवा से क्या मिलेगा? प्रतिदिन जो विकार हो रहे हैं, उन पर हर क्षण कैसे ध्यान रखूं? प्रश्न पर प्रश्न मन उठाता रहता है, उन्हें ज्यादा नहीं उठने देना है या नहीं?

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समाज में अलग अलग स्तर पर जो बताया जा रहा है, क्या वह केवल बॉर्डर तक पहुंचाने की कोशिश है, और बॉर्डर पर जो अवस्था घटेगी उस दिन सब छूट जाएगा? कौन सा मार्ग लूं, यह कैसे देखूं? एक समय ऐसा भी आता है जब मन में बहुत दुविधाएं उठती हैं और प्रश्न बहुत से उठने लगते हैं। उस समय क्या किया जाए?

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निर्विकार बहुत ऊंची अवस्था है। विकार है, तो कभी निर्विकार भी रहे होंगे, तभी विकार हटाने का प्रयास है। स्वप्न की बात हो चुकी। उसके बाद कारण अवस्था आती है, जिसमें शरीर को विश्राम मिलता है और मन को विश्राम मिलता है। वह अवस्था क्या है? उसमें जाकर इंसान सब कुछ भूल जाता है, ऐसा लगता है। हम भी उतनी ही जानकारी तक जाकर खड़े हो जाते हैं, जैसे रोबोट मेमोरी के बिंदु तक छूकर लौट आता है। कहने को जागृत है, पर जागृत भी धोखा लगता है। मैं प्रकृति का ही हिस्सा हूं, फिर अपने को और प्रकृति को अलग क्यों समझें? फूल का एक पत्ता समझ में आ जाए तो फूल समझ में आ जाए, पर इसी को समझ नहीं पा रहे। समझ शरीर के माध्यम से ही हुई, जहां जहां गए ज्ञान होता गया, अपनाते गए, सानिध्य में काम किया, समझ भीतर विकसित होती गई। फिर भी कारण अवस्था का उत्तर नहीं मिला, जब ऐसा हो जाता है कि कुछ रहा ही नहीं। क्या कारण से मुक्त होना निर्विकार है?

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जब एक मिनट के लिए चुपचाप बैठ जाता हूं और शरीर से कोई कर्म नहीं कर रहा, तब भी विचार अपने आप अतीत में चले जाते हैं या भविष्य की कल्पना में। किसी ने गुस्सा दिलाया या चोट पहुंचाने की कोशिश की, एक मिनट में वह अतीत हो गया, और विचार अपने आप बनते चले जाते हैं। मैं कुछ नहीं कर रहा, मन क्रिया कर रहा है। अगर मैं कहूं कि मैं इसका दृष्टा हूं, तो यह भी धोखा लगता है, क्योंकि प्रश्न भी मन उठा रहा है और उत्तर भी मन दे रहा है। मन निमित्त है, तो प्रश्न कौन उठा रहा है? कई बार साइलेंट में बैठने पर अनुभव सा होने लगता है, फिर लगता है यह भी धोखा है, मन बार बार धोखा देता है। सृष्टि में आने के बाद से हम अपने आप को भूल गए, ऐसा लगता है। बोलने को शब्द नहीं मिलते। क्या शब्दों का सहारा लिया जाए, और बोला क्या जाए?

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मन की परिभाषाएं अलग-अलग — राग-द्वेष पिंडों में कैसे अलर्ट रहें?

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एक्ट नहीं करूं फिर भी याद/विचार आते हैं — क्या करें?

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इच्छा आएगी ही — सामने नंगा/कपड़े वाले को सेम नजर से देखना चाहिए?

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आत्मज्ञान और आहार का संबंध क्या है?

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अध्यात्म की तरफ इतने कम लोग क्यों हैं? मन की कामना कैसे समाप्त करें?

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पवित्र कैसे करें?

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मन को एकाग्र कैसे करें?

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बुरी आदत (जैसे गुटका) छोड़नी है लेकिन छोड़ नहीं पा रहे — क्या करें?

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अचेतन मन क्या है कैसे साफ करें? साधना क्या है?

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कार्य शुरू करने का भय कैसे दूर करें? मन साधना में लगता है पर पारिवारिक कर्तव्य रुकावट — क्या करें?

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मन कंट्रोल नहीं कर सकते कहते हो, फिर बेईमानी छोड़ो-सत्कर्म करो मन पवित्र होगा — कौन पवित्र?

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ध्यान में धारणा किसकी? ईमानदारी विस्तृत में क्या है?

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मन पर नियंत्रण कैसे हो?

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जब शरीर मरता है तब मनुष्य की क्या स्थिति होनी चाहिए? मन क्या है?

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कुटिया के नियम क्या हैं — मोबाइल, भोजन, साधना?

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ईमानदारी से चल रहे हैं पर अड़चनें आती हैं, मन अशांत — क्या करें? निगेटिव थॉट्स आते रहते हैं।

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मलिन विचार आते हैं, साधना-पूजा में तकलीफ — क्या करें? डर का सामना, क्रोध निवारण, प्रेम कैसे आए?

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जब घुटन-बेचैनी हो और कुछ करने का मन न हो — रुकना है; पर काम करना ही पड़ता है तो क्या?

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वेदांत में कालातीत, भावातीत, गुणातीत — भावातीत का क्या अर्थ/असर है?

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असली सवाल क्या होता है? मौन में बैठूं तो मन में क्या रखूं?

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परिवार में रहकर पहले ईमानदार कैसे बनूं? ईमानदारी का परिणाम नुकसान भी हो सकता है तो क्या करें?

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ध्यान में ध्यान का क्या मतलब? मंदबुद्धि को कैसे समझाएँ?

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कर्म सेटलमेंट नहीं भी हुआ तो क्या आत्मज्ञान हो सकता है? पेंडिंग कर्म बाद में?

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क्या आपको कोई आत्मज्ञानी मिला? तीन अद्भुत लोगों की घटना क्या है?

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