आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P23-0065 · भाग 23

गुरु जी, अहम को हटाना, मान की इच्छा का त्याग करना इतना कठिन है — अगर किसी परिस्थिति में वह भाव इंसान में आ भी जाता है तो क्या करें?

समझ से, समझदारी से उसे हटाओ। प्रतिक्रिया मत दो, सह लो — इसी को कहते हैं अपमान का घूंट पीना। पी लो कि नहीं, मुझे अपने आप को सुधारना है। देखिए, दो में से एक करो: या तो खुद पे अनुशासन करने की ताकत हो, या तो अनुशासन करने वाले व्यक्ति के पास रहो — लेकिन वो व्यक्ति महान होना चाहिए; अगर आपसे कमजोर का अनुशासन आप पर हो गया तो आप बर्बाद हो जाओगे। खुद पर अनुशासन करने वाले करोड़ों में एकाध होते हैं। नहीं तो आपके ऊपर कोई अनुशासन करने वाला चाहिए — फिर वहां से भागो मत। वो अनुशासन करेगा तो आपको बहुत तकलीफ होगी, फिर भी भागो मत, समझदारी से अपने आप को रोक के रखो, क्योंकि अपने आप को सुधारना है। वो तो तुरंत कहेगा "जाओ" — योग्य व्यक्ति तुम्हें रोकेगा भी नहीं, क्योंकि उसको तुम्हारी जरूरत ही नहीं है, जरूरत तुमको है। एक अच्छे शिक्षक के पास विद्यार्थी की कमी नहीं होती। बड़े सर्जन के पास देख लो — काम के अलावा कोई बात नहीं करेंगे, वहां जाने के लिए लाइन लगानी पड़ती है। सामर्थ्यवान, योग्य व्यक्ति किसी के पीछे नहीं भागते। और सफलता कोई उठा के नहीं दे देगा, यह दुकान पर नहीं बिकती — उसके लिए आपको अथाह मेहनत करनी पड़ेगी। इसलिए सोच-समझ के जीवन का फैसला लो, आवेश-जज्बात में नहीं; यह आवेश-जज्बात का मार्ग नहीं है, यह बहुत समझदारी का मार्ग है।

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वीडियो: हम एकांत को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते हैं ? #live #pratyakshgyan #yogijikasatsang · 2025-03-07