आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P23-0086 · भाग 23

गुरु जी, एकांत में शांति से अपनी चटाई लेकर बैठते हैं; अभी तक तो हम ध्यान करते थे — अब ध्यान नहीं करना है, तो अब क्या करें? केवल चुपचाप बैठें? अपने आप में ही आनंद है, तो अपने आप को कैसे सोचें?

कुछ नहीं — यही तो गलती करते हो तुम लोग। आप अपने आप में रहो ना, आप में ही तो आनंद है — उसे निकलने तो दो। आप निकलने ही नहीं देते — जैसे ही अपने आप में हो रहे हो, कुछ ना कुछ पकड़ना चाहते हो। अपने आप में हो जाओ, आनंद को निकलने तो दो। चुप ही तो होना है, मौन होना है, अपने आप में होना है — पांचों इंद्रियों से मौन हो जाना है, और मन को बहने दो, जहां जा रहा है जाने दो। आप बैठे हो, बाल उड़ रहा है, तो क्या कहोगे कि मैं बाल पकड़ के बैठूंगा, एक भी बाल उड़ना नहीं चाहिए? आपका एक रोएं पे कंट्रोल नहीं है। मन शरीर के लिए काम करता है — भूख लगी, इंगित करेगा; बाथरूम लगी, इंगित करेगा। मन को नहीं रोकना है, मन जरूरत में जाता है। ध्यान नहीं करना, कुछ नहीं करना — ना करने में आ जाना है, बस बात खत्म; क्योंकि ना करने में आप होते हो, और आप हो तो वह है। अब ध्यान का नाम ही मत दो — चुपचाप बैठ जाओ, बस।

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वीडियो: अभेद होते हुए भी भेद क्यों लगता है ? #livesatsang #livesatsangyogijika · 2025-03-07