प्रश्नोत्तर P23-0104 · भाग 23
गुरु जी, मालिकपन से सेवक बनना है — तो किनका सेवक बनना है? सेवकपन का भाव कैसे लाएं?
व्यक्तिगत किसी का नहीं — बस सेवकपन के भाव में जीना है, वह भी ईमानदारी-सत्कर्म से, जरूरतमंद के लिए। अभी मेरा कहना है कि अपने आप को कैसे निकालो, उसके लिए काम करो। अहंकार कब आता है, पता है? जब आप अपने से ज्यादा योग्य वाले की सेवा करते हो, तब आपको अहंकार आता है — यह ध्यान रखना। जरूरतमंद की सेवा करोगे तो अहंकार आएगा ही नहीं। तो जरूरतमंद की सेवा करो, ईमानदारी के साथ — अपने स्व तक पहुंचने के लिए यही सबसे आसान, सरल रास्ता है। फिर उसके बाद परमात्मा की यात्रा होगी; अभी उसकी बात करने का कोई मतलब ही नहीं है, इसलिए मैं नहीं करता — वह सारे विषयों से परे है, शब्द-दृश्य-गंध-रस-स्पर्श से परे है, फिर क्या बताना? आप पहुंचो ना। मैं तो बस इतना कहता हूं कि आप अपने आप में कैसे हो जाएं। आपको लग रहा है कि मेरा जीवन ठीक है, तो लगे रहो; लग रहा है कि ठीक नहीं है, तो इसे छोड़ो, मूल में आओ — छोड़ने का तरीका मैं बता रहा हूं। कोई कहे मैं खुश हूं, तो मैं बोलूंगा जाओ खुश रहो; कोई परेशान है, तो उसे बताऊंगा इस परेशानी से कैसे निकलो। इसलिए निर्विकार कैसे हो जाओ, उसके लिए काम करो — उसके लिए मैंने सबसे सरल देखा ईमानदारी-सत्कर्म।
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