आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P23-0127 · भाग 23

गुरु जी, यात्रा में बाहर तो सब दिखता है, पर अंदर कुछ दिखता नहीं कि कहां पहुंचे, कितना बाकी है, इसलिए लोग भाग जाते हैं। लेकिन गुरु तो देख रहा है — जब कोई एक कदम बाकी रहते भागता है तो गुरु उसे रोकता क्यों नहीं? क्या आप जीवात्मा की स्वतंत्रता नहीं छीनना चाहते?

एक होता है — मैं क्या करूं? जैसे आप कहते कि मेरी तबीयत खराब है, इस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए, तो मैं आपको आपके हित के लिए सलाह देता। लेकिन जब व्यक्ति कह रहा है कि मैं जा रहा हूं, तो फिर वहां क्या बोला जा सकता है? गुरु हमेशा यह देखता है कि यह आंतरिक क्या चाहता है, इसकी क्या इच्छा है; क्योंकि इसकी इच्छा हम मार नहीं सकते, इसकी इच्छा यही मार सकता है। तो वह देखता है कि शब्दों से आप क्या कह रहे हो और आंतरिक क्या चाहते हो, और उसी हिसाब से आपको निर्णय देता है। हमें कभी भागना नहीं चाहिए; और कोई भी परिस्थिति हो तो जिसके साथ मैं हूं उसके सामने बात को रखूं, निर्णय नहीं। निर्णय रखोगे तो गड़बड़ हो जाएगी, फिर वह कुछ नहीं बोलेगा, कहेगा ठीक है — क्योंकि उसको मेरे से कुछ चाहिए नहीं। घर पे मां-बाप को कहोगे कि हम यह कर रहे हैं, तो वे फटाक से रोक देंगे; लेकिन गुरु को तो कुछ चाहिए ही नहीं, तो वह कहेगा — तू पहले अपनी इच्छाएं पूरी कर ले, बहुत लोग हैं। यह काम रुकने वाला नहीं है, इसका वेग ही ऐसा है। तुम रुक गए तो तुम्हारा ही नुकसान है, क्योंकि आपकी जगह कोई और ले लेगा; जैसे ही आप गए, जगह भर गई, फिर दूसरे दिन भी आओ तो नहीं मिलेगी। प्रकृति का नियम है, कोई जगह खाली नहीं छोड़ती।

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वीडियो: यह दर्द कभी तेरा भी था... #योगी · 2026-10-20