आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान

प्रश्नोत्तर P23-0094 · भाग 23

गुरु जी, मुझे इसके साथ यह भी पूछना है कि हम विश्वास करें कि श्रद्धा करें? श्रद्धा और विश्वास में क्या फर्क है?

विश्वास प्रकृति की प्रथम व्यवस्था है — विश्वास आपको करना ही पड़ेगा। प्यास लगी तो किसी से गिलास पानी मांगो, या नल पर जाकर लो — नल पर तो विश्वास करना पड़ेगा। कभी नल खोलते हैं, पानी नहीं आता — तो क्या नल ने धोखा दिया? नहीं, उसमें पानी नहीं था। विश्वास सिस्टम की व्यवस्था है; अंधविश्वास आपकी कमजोरी है। दो लोग दुकान पर गए — एक अमीर, एक निर्धन; दुकानदार ने कहा कल लाऊंगा, दूसरे दिन कहता है समय नहीं मिला। अमीर कहेगा जाओ, मैं और किसी दुकान से ले लेता हूं; गरीब कहेगा भाई, कल लेते आना — यह गरीब का विश्वास नहीं, अंधविश्वास है, उसकी गरीबी की वजह से। तो अपनी कमजोरी को विश्वास का नाम मत दो; अंधविश्वास आप मजबूरी में करते हो, जब आपके पास ऑप्शन नहीं होता। और यह मत समझना कि मैं विश्वास करता हूं तो बड़ा एहसान करता हूं — विश्वास तो एक-दूसरे पर करना ही पड़ेगा। फिर श्रद्धा क्या है? जिसके लिए हम गए हैं, वह जब प्रत्यक्ष हो जाता है, तो उसके प्रति हमारी श्रद्धा हो जाती है — समर्पण और श्रद्धा। वह कार्य चाहे अच्छा हो चाहे बुरा — बुरे कार्य के लिए भी गए हो और उस व्यक्ति से कार्य हो गया, तो उसके प्रति श्रद्धा हो जाएगी; श्रद्धा अच्छे-बुरे किसी के प्रति भी हो सकती है, आपका कार्य कैसा है उस पर है। श्रद्धा मतलब उससे आपका स्नेह-लगाव हो जाएगा, एक भरोसा हो जाएगा कि यह भरोसे लायक इंसान है। विश्वास और भरोसा घुमा-फिरा के एक ही है।

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वीडियो: जीव , माया और ब्रह्म क्या है ? #livesatsangyogijika #aadhyatmik_satsang #yogijikasatsang · 2025-03-09