प्रश्नोत्तर P23-0101 · भाग 23
गुरुदेव, शरीर, मन और बुद्धि की बात हुई — कुछ लोग इसके पार भाव की बात कहते हैं, कुछ उसे आत्मा का अभिन्न स्वभाव भी बोलते हैं। क्या भाव भी मन-बुद्धि के इसी कार्यक्रम से जुड़ी हुई चीज है?
भाव तो जैसा आप कर्म करते हो वैसा बनता है — कर्म के पहले, कर्म के बाद एक भाव बनता है, उससे फल का निर्णय होता है। जैसी वस्तु आपके सामने आएगी — मान लीजिए आप बैठे हो, कुछ भी भाव चल रहा है, कुछ सड़ा हुआ आपकी नाक पर रख दिया जाए, तो तुरंत भाव बदल जाएगा। जैसा आप पांच इंद्रियों द्वारा — देख के, सुन के, सूंघ के, स्वाद से, स्पर्श से — ग्रहण करते हो, या जैसा अंदर है, वैसा ही भाव बनता है। "भाव विद्यते देवा" — भाव में ईश्वर का वास है। जैसा आप करते हो, वैसा बनने लगते हो, वैसा आपका भाव बनने लगता है। तो मूल आपका कर्म है — आपके द्वारा क्या किया जा रहा है, किस भाव से किया जा रहा है। भाव के बाद कर्म, कर्म के बाद भाव — सब एक-दूसरे के पूरक हैं, अंतर-संबंधित हैं। मेन आपकी समझ है, मेन आप हो — सीधी सी बात है। बुद्धि के चक्कर में, मन के चक्कर में मत पड़ो; जिसको जीवन में कुछ नहीं करना है, वह कहेगा क्या करें मन भटकता है — उसे रसपान करके पड़े रहना है।
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वीडियो: जीव , माया और ब्रह्म क्या है ? #livesatsangyogijika #aadhyatmik_satsang #yogijikasatsang · 2025-03-09