प्रश्नोत्तर P23-0168 · भाग 23
गुरु जी, शारीरिक, आर्थिक और मानसिक — तीनों पीड़ा हमारे पास रहती हैं। शरीर ठीक हो तो पैसे से पीड़ित होते हैं, शरीर और पैसा दोनों सही हों तो भी मानसिक पीड़ा तो रहती है। इन तीनों के बारे में बताइए।
बस पीड़ा वहीं है जहां से आप रसपान कर रहे हो — और कुछ नहीं। मानसिक पीड़ा क्यों? कहीं से रसपान कर रहे थे, उसमें कुछ हो गया — या तो जिसके द्वारा रसपान कर रहे थे, उन इंद्रियों को कुछ हो गया, या जिसका रसपान कर रहे थे, उसको कुछ हो गया — तो मानसिक पीड़ा हो जाएगी। पीड़ा है नहीं; पीड़ा आपने अपने तरीके से चाहिए में पैदा किया है। न सुख है, न दुख है, न पीड़ा है। देखिए, कोई व्यक्ति शादी करता है, एक-दूसरे को कुछ हो जाए तो पीड़ा होती है; लेकिन खटपट हुई, तलाक हुआ, फिर एक-दूसरे को कुछ हो जाए तो पीड़ा नहीं, खुशी होगी। आपके घर में कोई पशु है, दूध दे रही है, उसे कुछ हो जाए तो पीड़ा होगी; लेकिन आपने बेच दिया और एक घंटे बाद वह खत्म हो गई, तो आप बड़े खुश होंगे कि मैं बच गया। बात बस मेरा के भाव की है — जहां मेरा का भाव है। पशु पहले मेरा था, पैसा मिल गया तो तेरा हो गया। मेरा में दुख है, तेरा में नहीं। घर करोड़ों में बेचा और दूसरे दिन भूकंप में बैठ गया — कहोगे अच्छा हुआ, मैं बच गया। यह मैं कौन है जो बच गया? बस यही अहम है; अहम मेरा के द्वारा खड़ा हुआ है, और इसका मूल शरीर ही है। शुरुआत जरूरत से होती है — देखो बच्चे, एक बिस्किट मिल जाता है तो खुश हो जाते हैं; और यही बच्चे कुछ समय बाद बिस्किट लेने नहीं आएंगे, लालच में चले जाएंगे, अहम भाव — सब आ जाता है। यह कब आता है? जब आपको योग्यता से ज्यादा चाहिए, तभी आएगा।
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