प्रश्नोत्तर P24-0001 · भाग 24
गुरु जी, किताबों और अनुभव से मैंने यह समझा कि जो वह सर्वशक्तिमान सत्ता है वही मैं हूं — मैं उसका अंश नहीं, खुद ही वह हूं; उसके टुकड़े नहीं हो सकते। क्या यह सही है?
अगर वो मैं हूं और मैं वो हूं, तो मुझे यह क्यों कहना पड़ रहा है कि वही मैं हूं? अगर वही मैं हूं तब तो बात ही खत्म हो गई, तब तो यह भी बोलने की जरूरत नहीं। और अगर आपके अलावा कुछ है ही नहीं, तो ज्ञान किसको देना? सब में अगर मैं हूं तो मुझे ज्ञान हो गया मतलब सबको हो गया, फिर ज्ञान किसे देना — वह तो मौन हो जाएगा। और अगर मैं किसी और को कुछ समझा रहा हूं और कोई कामना लेकर घूम रहा हूं, तो इसका मतलब यह सिर्फ एक भ्रम है, किताबी ज्ञान है कि मैं वही हूं, वो मैं हूं। यह जाल है — जैसे मकड़ी दूसरों को फंसाने के लिए जाल बनाती है और आखिर में उसी में फंस के खत्म हो जाती है, तो यह शब्दों का जाल है, इस जाल में मत फंसो।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: साधना में ध्यान रखने योग्य विशेष ज्ञान / #योगीजी_का_सत्संग #साधना #ध्यान #ज्ञान · 2024-08-01