प्रश्नोत्तर — भाग 24
योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 16 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।
गुरु जी, किताबों और अनुभव से मैंने यह समझा कि जो वह सर्वशक्तिमान सत्ता है वही मैं हूं — मैं उसका अंश नहीं, खुद ही वह हूं; उसके टुकड़े नहीं हो सकते। क्या यह सही है?
अगर वो मैं हूं और मैं वो हूं, तो मुझे यह क्यों कहना पड़ रहा है कि वही मैं हूं? अगर वही मैं हूं तब तो बात ही खत्म हो गई, तब तो यह भी बोलने की जरूरत नहीं। और अगर आपके अलावा कुछ है ही नहीं, तो ज्ञान किसको देना? सब में अगर मैं हूं तो मुझे ज्ञान हो गया मतलब सबको हो गया, फिर ज्ञान किसे देना — वह तो मौन हो जाएगा। और अगर मैं किसी और को कुछ समझा रहा हूं और कोई कामना लेकर घूम रहा हूं, तो इसका मतलब यह सिर्फ एक भ्रम है, किताबी ज्ञान है कि मैं वही हूं, वो मैं हूं। यह जाल है — जैसे मकड़ी दूसरों को फंसाने के लिए जाल बनाती है और आखिर में उसी में फंस के खत्म हो जाती है, तो यह शब्दों का जाल है, इस जाल में मत फंसो।
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गुरु जी, इस शब्दों के जाल से आदमी निकलेगा कैसे? और क्या किसी को समझाना भी कामना है?
जैसे बनाए हो, जाल को काट दो। काटते-काटते आखिर में कुछ नहीं बचेगा। जहां पहुंचे हो वहां नहीं पहुंचे — वह आपकी बुद्धि का स्तर पहुंचा होगा; जहां भी कामनाओं से पहुंचे हो, उस जाल को काटना है। किसी को ज्ञान देना भी कामना है। प्रयास करना कि इसे समझना ही है — वह कामना है। अगर आप व्यक्तिगत किसी को समझा रहे हो तो वह कामना हो सकती है; सार्वजनिक समझा रहे हो तो कामना नहीं। लेकिन जैसा आपने बताया कि मैं वही हूं और सब में मैं हूं, तब तो किसी से कुछ बोलने की, किसी को समझाने की जरूरत ही नहीं, क्योंकि सब में मैं हूं तो समझाऊं किसको? तो जो स्थिति बनाई है उससे निकलना है — आपकी स्थिति का निर्णय आप ही को करना है।
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गुरु जी, जब सब में मैं ही हूं, तो हो सकता है वह खुद का खुद ही सुन रहा हो, खुद ही सुना रहा हो?
जरूरत क्या है? जरूरत क्यों पड़ रही है? जरूरत के पीछे कामना है। हम एक-दूसरे से तभी बात करते हैं जब कुछ चाहिए; बिना मतलब के कोई नहीं बोलेगा। बात करने के लिए कोई अलग चाहिए, विपरीत कोई होगा तभी बात होगी; सब एक जैसे हैं तो कौन सुनने वाला रहेगा, कौन सुनाने वाला। अपने आप में जैसे ही आप हो जाओगे, आपके प्रश्न खत्म हो जाएंगे, उत्तर हो जाएंगे — बाहरी रास्ता, यह गांव आगे कहां पड़ेगा, वह पूछ सकते हो, लेकिन आंतरिक यात्रा का किसी से पूछ ही नहीं पाओगे, क्योंकि उसका पता चल ही गया। तो जांचो अपने आप को कि मेरी स्थिति क्या है — किसी की स्थिति का निर्णय कोई और नहीं कर सकता।
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गुरु जी, बोलने वाला तो वह एक ही है, वह शरीर के माध्यम से बोल रहा है — फिर द्वंद कहां है?
शरीर में हूं नहीं, मन में हूं नहीं, तो बोल किससे रहा है? बोलने के लिए दो चाहिए ना, अकेले कैसे बोलेगा आदमी — बहुत गहराई से समझो। अगर एक ही है तो फिर किसको समझाना; समझाने के लिए दो चाहिए, एक समझने वाला एक समझाने वाला। अर्जुन को समझाया गया, विराट रूप दिखाया गया, लेकिन देखने के बाद भी जब अभिमन्यु मारे गए तो अर्जुन बोले कि मैं होता तो मेरा पुत्र मारा नहीं जाता — मतलब ज्ञान होने के बाद भी पुत्र मोह में अपने को अलग समझे, पुत्र को अलग समझे। इतना आसान नहीं है इससे निकलना। इसीलिए अपनी किताबों को पढ़ के अपनी स्थिति मत मान लो — जिन्होंने बोला कि एक ही है, उन्होंने पहुंच के बोला, और तुम यहीं से, द्वैत में होके कह रहे हो कि एक ही है।
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लेकिन महाराज जी, जिन्होंने वह बात कही, वे भी तो बोले थे, तभी तो सारा लिखा गया — फिर वे किसके लिए बोले?
यही तो बात है भाई — उस स्थिति में जाने के बाद बोलना नहीं पड़ता। आदि गुरु शंकराचार्य ने अद्वैत का प्रचार किया, ठीक है, लेकिन किया तो द्वैत में — दूसरा था तभी तो लोगों को समझाने निकले। जब अभेद था तो किसी को समझाना क्यों; किसी को समझा रहे हो तो फिर द्वैत है। मैं तो कह रहा हूं — एक से अनेक है, अनंत है, अनंत आत्माएं हैं, और इच्छा-अपेक्षा में वे जीवात्माएं हो गईं। हमें बस इच्छा-अपेक्षा से मुक्त कराना है और अपने घर चले जाना है।
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गुरु जी, तो आपके कहने का मतलब है कि एक सत्ता है और उसके सब अंश हो गए?
अंश नहीं — अंश अलग हो जाता है। यह अलग नहीं है, उससे है। जैसे लाइट से प्रकाश है, उजाला है — क्या यह उजाला लाइट से अलग है? इसमें बल्ब नहीं है, लेकिन उजाला उसी से है। वैसे ही उससे सब है, उससे अनंत आत्माएं हैं। वे टुकड़े नहीं हैं — टुकड़े हम मान बैठे हैं, हम अलग-अलग मान गए इसलिए तो भटक रहे हैं; और सबका कर्मों का काउंट अलग है, कर्म के हिसाब से सब भोग रहे हैं।
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गुरु जी, जब सब एक ही है, जैसे बल्ब की रोशनी सब जगह एक जैसी है, तो सब अलग-अलग कर्म क्यों भोग रहे हैं?
एक ही मां के अनेक बच्चे होते हैं, सबको एक ही मां-बाप ने शिक्षा दी, पर उनमें कोई बहुत फालतू निकल जाता है, कोई बहुत सज्जन निकल जाता है — क्यों? आपने तो एक ही तरीके से सबको पाला होगा, तो एक जैसे क्यों नहीं हुए? वो कर्मों का हिसाब-किताब है। पाला तो एक ही जैसा, लेकिन उठना-बैठना-बोलना-चलना सबका अलग है।
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गुरु जी, फिर कर्म लागू किसके हुए — उस आत्मा के?
जो मेन चीज आत्मा है, उसके थोड़ी लागू होते हैं कर्म; आत्मा पर असर नहीं पड़ता, वह भुगतने थोड़ी आती है। भोग आप यहीं पे रहे हो — इच्छा-अपेक्षा में। मेरा में दुख है, नहीं तो दुख-सुख नहीं है। आपने मेरा मान लिया, तो आत्मा जीवात्मा हो गई, जैसे पानी बर्फ हो गया — जब भी टूटेगा, जब भी कुछ होगा, तो बर्फ को होगा, पानी को कुछ भी नहीं होगा। कोई भी वस्तु लो, जब तक वह आपकी है तभी तक दुख है; जैसे उसे बेच दो, न दुख है न सुख। मेरा का भाव जहां-जहां है वहां सुख-दुख है, और मेरा का निर्माण आपके द्वारा हुआ है। इसलिए धीरे-धीरे मेरा के भाव से अपने आप को छुड़ाओ; बस मान मत लो कि एक ही है, तब कुछ कर नहीं पाओगे।
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गुरु जी, जो अज्ञानता में है, वही तो फिर ब्रह्म हो जाता है ना?
वह ब्रह्म समान हो जाता है, ब्रह्म नहीं होता। नर्मदा बह रही है, गंगा बह रही है, उसमें गटर का पानी मिला, तो देव भी उसकी वंदना करने लगते हैं — लेकिन वह अब गटर नहीं रहा, गटर मिट गया, नर्मदा में, गंगा में हो गया। हमें उसके पास जाना है, इसीलिए तो कह रहा हूं कि अपने घर का पता लगाओ — कहां से आए हो, कहां जाना है — और यह आप ही के अंदर है।
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गुरु जी, रामकृष्ण परमहंस उपलब्धि के बाद भी माता की पूजा करते थे — अद्वैत में जाने के बाद वे द्वैत में कैसे आए, जब एक ही है तो किसकी पूजा?
वही तो समझना है। आप लोग अद्वैत का मतलब बस एक ही समझते हो कि एक के अलावा कुछ नहीं है। जब कुछ होता ही नहीं तो इतना भटकाव, इतनी पीड़ा, इतनी परेशानियां क्यों होतीं, क्यों प्रयास करते कि अपने आप को निर्विकार करो? और सब में वही होता तो सबको बैठे-बैठे मुक्त करा देता, जाकर समझाता क्यों। अद्वैत में अगर कोई पहुंच गया, ब्रह्म समान हो गया, और घर-घर जाकर प्रयास कर रहा है कि लोग निर्विकार हों — तो इस इच्छा में कामना नहीं है, जगत कल्याण है; लेकिन इच्छा तो है कि यह भी मुक्ति की तरफ, मोक्ष की तरफ बढ़ जाए, तो अपने से अलग समझ रहा है। वह ब्रह्म हो जाता तो एक ही जगह से सबको मुक्त करा देता; गांव-गांव मेहनत कर रहा है, समझा रहा है — इसलिए वह ब्रह्म नहीं, ब्रह्म के समान हुआ है। अद्वैत का मतलब यह न समझो कि एक ही है — अनंत आत्माएं हैं, और उसके बाद अनंत जीवात्माएं; इसे समझने का प्रयास करिए।
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गुरु जी, दुर्योधन है तो उसी का हिस्सा — फिर वह अलग किस वजह से हुआ?
कृष्ण भगवान को क्या जरूरत थी दुर्योधन के पास जा-जाकर बार-बार समझाना कि मत युद्ध करो, अगर एक ही था? दुर्योधन अलग था तभी समझा रहे थे। है उसी का, लेकिन अलग अपने कर्मों से हुआ — बुराइयां धारण कीं। जैसे पानी ने किसी को शुद्ध किया, कहीं कचड़े में मिला, कहीं कचड़ा धोया, तब जाकर वह गटर हो गया; फिर नर्मदा से मिला तो नर्मदा में हो गया। फिर मिटेगा तो गटर ही मिटेगा, क्योंकि गटर बना है — बड़ी चीज के अंदर छोटी चीज समा जाती है।
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गुरु जी, जो गटर नर्मदा में मिल गया, वह फिर क्या कहेगा — कि मैं नर्मदा हो गया?
वह यह नहीं कह सकता कि मैं नर्मदा हो गया; उनकी वजह से तो वह पवित्र हुआ — बस यही कहेगा कि मैं भी पवित्र हो गया। और मिलने के बाद वह बोलेगा भी नहीं, मिट जाएगा, फिर बोलने के लिए कुछ रहेगा ही नहीं। इसीलिए पहुंचो, तब पता चल जाएगा क्या है। हम आधी-अधूरी बात समझ पाते हैं — अध्ययन करते हैं, अनुसरण नहीं कर पाते। एक बालक को शिक्षक अच्छा पढ़ाए और एक बालक गाइड लेकर कमरे में पढ़े, तो समाज में काम वही कर पाएगा जिसने शिक्षक के सानिध्य में सीखा; गाइड वाले के पास उदाहरण खूब होंगे लेकिन काम नहीं कर पाएगा। किताबों में सब लिखा है, बस तरीका नहीं लिखा। जिसने किताब का अध्ययन किया और किसी गुरु के शरण में रहकर अनुसरण नहीं किया, वह अहम भाव धारण करके कि मैं ब्रह्म हूं, बैठ जाता है, और उसकी यात्रा अधूरी रह जाती है।
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गुरु जी, 20 साल किताबें पढ़ते-पढ़ते और भटकते-भटकते मैंने मान लिया कि मैं स्वयं ब्रह्म हूं; पर मन में यही रहता है कि ऐसा क्या रह गया, क्या छूट रहा है कि जो मैं हूं वह नहीं हो पा रहा?
किताबें पढ़कर बहुत लोग भटक रहे हैं — किसी गुरु के शरण में जाकर अनुसरण करना पड़ेगा। जब उसके साथ जियोगे, जीवंत गुरु होगा, तो आपको जीने का तरीका बताएगा, उस तरीके में समझाएगा जिसमें आप समझ सकते हो — और वह किताबों में नहीं लिखा जाता। किताबों में सीधा लिखा है कि ब्रह्म एक ही है, उसके अलावा कुछ भी नहीं; तो फिर किताबें क्यों, कोई अज्ञानी क्यों, कोई ज्ञानी क्यों, किसी को ऋषि, किसी को महात्मा क्यों बोला जा रहा है? उनके कर्मों के कारण। और कर्म करने के लिए दो चाहिए — यह शरीर और मन उससे अलग हैं; शरीर पंचतत्व से आया, पंचतत्व परमात्मा से — तो दो तो वहीं हो गए।
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गुरु जी, शरीर में मन और आत्मा दोनों रहते हैं — क्या मन और शरीर का नाश हो जाएगा?
रूप का नाश हो जाएगा, तत्व का नहीं। रूप का नाश बोल सकते हो, क्योंकि रूप को नाश होते हुए आपने देखा है; मन का तो आता-पता ही नहीं — शरीर में बताओ मन कहां है, कब आता है, कब पैदा हो जाता है। मन चाहिए में बड़ा होता है, चाहिए में काम करता है। फिर इसको चाहिए छुड़ाना होता है — धीरे-धीरे जैसे यह बड़ा हुआ है वैसे उसे छोटा करना पड़ता है, वापस छोटा होके फिर शायद यह विलय हो जाता होगा। जो भी हो, बस अपने को साधना है, अपने आप को चाहिए से मुक्त करना है।
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गुरु जी, तो फिर अद्वैत का मतलब अनेक हो गया — द्वैत और अद्वैत का सही अर्थ क्या है?
द्वैत मतलब अनेक इच्छाएं हैं हमारी, तो द्वैत हो गया; और हम इन इच्छाओं से मुक्त हो गए तो सब एक जैसे हो गए। जैसे आपने दूर से फल की दुकान देखी, पूछा जाए क्या है, तो बोलोगे फल — यह अद्वैत है, क्योंकि आपको चाहिए नहीं। अब फल चाहिए, दुकान पर गए, तो कहोगे यह नहीं, यह छोटा है, यह कच्चा है, यह सड़ा है, अच्छे-अच्छे दे दो — एक के प्रति लगाव हो गया, एक के प्रति द्वेष हो गया, यह द्वैत है। नहीं चाहिए में आ गए तो सब वैसा का वैसा है — वह अवस्था अद्वैत है। जैसे एक स्त्री-पुरुष की शादी हुई तो दोनों के लिए सारे रिश्ते बदल गए — जुड़े एक से, बदल सब गए, और किसी को बताना नहीं पड़ा कि कौन ससुर है, कौन सास; पहले कितना भी प्रयास करते तो नहीं बनता। वैसे ही जब आप अपने आप से मिलोगे, पूरी सृष्टि आपके लिए बदल जाएगी, पूरा दृष्टिकोण बदल जाएगा। अद्वैत का मतलब यह मत समझिए कि बस एक ही है और वही मैं — यह अहंकार बहुत लोग पाल के अपनी यात्रा रोक के बैठ गए।
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गुरु जी, मेरी सोच में तो यह है कि मंदिर जाने वालों को, गुरु-चेला बनाने वालों को ज्ञान नहीं है, तो वे क्या करें?
आखिर जब सब एक ही है, तो फिर अज्ञानी आपके लिए दूसरा कैसे हो गया? आप तो कह दिए सर्व मैं हूं, सब जगह मैं हूं, दूसरा है ही नहीं — तो मंदिर में जाने वाला आपसे अलग कैसे हो गया? एक ज्ञानी हो गया, एक अज्ञानी हो गया, मंदिर भी अलग हो गया — किताबी ज्ञान आदमी को भटकाता है। बहुत लोग किताबी ज्ञान से अपने आप को ब्रह्म मान के बैठ गए, यात्रा ही रोक दी, और बैठ के बोलते हैं देखो मंदिर जाने वाले क्या कर रहे हैं। अगर सर्वत्र मैं ही हूं तो कुछ बोलने की आवश्यकता ही नहीं, और फिर भी उठ रहा है कि यह गलत है यह सही — वही राग-द्वेष है। इसलिए लोगों ने कहा, जीवंत गुरु की शरण में रहोगे तो वह आपके सारे भ्रम को तोड़ेगा। समझने का प्रयास करो, और समझ के अपने आत्मिक स्तर को उठाओ, अपनी कामनाओं से अपने आप को मुक्त कराओ, इस पर काम करो।
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